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उत्तरकाण्ड · सर्ग 20

यम को चुनौती

सर्ग 19सर्ग-सूचीसर्ग 21

श्लोक 1 (uttara.20.1)

ततो वित्रासयन्मर्त्यान्पृथिव्यां राक्षसाधिपः । आससाद घने तस्मिन्नारदं मुनिपुङ्गवम् ॥ 20.1 ॥

tato vitrāsayanmartyānpṛthivyāṃ rākṣasādhipaḥ | āsasāda ghane tasminnāradaṃ munipuṅgavam || 20.1 ||

तब मनुष्यों को त्रस्त करता हुआ वह राक्षसाधिप पृथ्वी पर घूमते-घूमते आकाश में उस मुनिश्रेष्ठ नारद के पास जा पहुँचा।

श्लोक 2 (uttara.20.2)

तस्याभिवादनं कृत्वा दशग्रीवो निशाचरः । अब्रवीत्कुशलं पृष्ट्वा हेतुमागमनस्य च ॥ 20.2 ॥

tasyābhivādanaṃ kṛtvā daśagrīvo niśācaraḥ | abravītkuśalaṃ pṛṣṭvā hetumāgamanasya ca || 20.2 ||

उन्हें प्रणाम करके, निशाचर दशग्रीव ने उनका कुशल-क्षेम पूछा और उनके आगमन का कारण जानना चाहा।

श्लोक 3 (uttara.20.3)

नारदस्तु महातेजा देवर्षिरमितप्रभः । अब्रवीन्मेघपृष्ठस्थो रावणं पुष्पके स्थितम् ॥ 20.3 ॥

nāradastu mahātejā devarṣiramitaprabhaḥ | abravīnmeghapṛṣṭhastho rāvaṇaṃ puṣpake sthitam || 20.3 ||

अमित तेजस्वी देवर्षि नारद ने मेघ की पीठ पर खड़े होकर, पुष्पक पर स्थित रावण से कहा -

श्लोक 4 (uttara.20.4)

राक्षसाधिपते सौम्य तिष्ठ विश्रवसः सुत । प्रीतो ऽस्म्यभिजनोपेतविक्रमैरूर्जितैस्तव ॥ 20.4 ॥

rākṣasādhipate saumya tiṣṭha viśravasaḥ suta | prīto 'smyabhijanopetavikramairūrjitaistava || 20.4 ||

"हे राक्षसाधिपते, हे विश्रवा-पुत्र, कुछ ठहरो। तुम्हारे कुलोचित, प्रबल पराक्रमों से मैं प्रसन्न हूँ -"

श्लोक 5 (uttara.20.5)

विष्णुना दैत्यघातैश्च गन्धर्वोरगधर्षणैः । त्वया समं विमर्दैश्च भृशं हि परितोषितः ॥ 20.5 ॥

viṣṇunā daityaghātaiśca gandharvoragadharṣaṇaiḥ | tvayā samaṃ vimardaiśca bhṛśaṃ hi paritoṣitaḥ || 20.5 ||

"- विष्णु के साथ तुम्हारे संघर्ष से, दैत्यों के वध से, गन्धर्वों और नागों के दमन से, तथा तुम्हारे समकक्षों के साथ तुम्हारे संग्रामों से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ।"

श्लोक 6 (uttara.20.6)

किंचिद्वक्ष्यामि तावत्ते श्रोतव्यं श्रोष्यसे यदि । श्रुत्वा चानन्तरं कार्यं त्वया राक्षससत्तम । तन्मे निगदतस्तात समाधिं श्रवणे कुरु ॥ 20.6 ॥

kiṃcidvakṣyāmi tāvatte śrotavyaṃ śroṣyase yadi | śrutvā cānantaraṃ kāryaṃ tvayā rākṣasasattama | tanme nigadatastāta samādhiṃ śravaṇe kuru || 20.6 ||

"अब मैं कुछ कहूँगा, यदि तुम सुनना चाहो तो सुनो; और सुनकर, हे राक्षससत्तम, आगे जो करणीय हो वह करना। हे तात, मेरे कहते समय पूरा ध्यान देना।"

श्लोक 7 (uttara.20.7)

किमयं वध्यते तात त्वया ऽवध्येन दैवतैः । हत एव ह्ययं लोको यदा मृत्युवशं गतः ॥ 20.7 ॥

kimayaṃ vadhyate tāta tvayā 'vadhyena daivataiḥ | hata eva hyayaṃ loko yadā mṛtyuvaśaṃ gataḥ || 20.7 ||

"हे तात, यह मर्त्यलोक तो देवताओं के लिए भी अवध्य तुम्हारे द्वारा क्यों मारा जा रहा है, जबकि यह पहले से ही मृत्यु के वशीभूत होकर मृतवत् है?"

श्लोक 8 (uttara.20.8)

देवदानवदैत्यानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । अवध्येन त्वया लोकः क्लेष्टुं युक्तो न मानुषः ॥ 20.8 ॥

devadānavadaityānāṃ yakṣagandharvarakṣasām | avadhyena tvayā lokaḥ kleṣṭuṃ yukto na mānuṣaḥ || 20.8 ||

"देव, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व और राक्षसों तक के लिए अवध्य तुम्हें, इस मनुष्य-लोक को कष्ट देना शोभा नहीं देता।"

श्लोक 9 (uttara.20.9)

नित्यं श्रेयसि सम्मूढं महद्भिर्व्यसनैर्वृतम् । हन्यात्कस्तादृशं लोकं जराव्याधिशतैर्युतम् ॥ 20.9 ॥

nityaṃ śreyasi sammūḍhaṃ mahadbhirvyasanairvṛtam | hanyātkastādṛśaṃ lokaṃ jarāvyādhiśatairyutam || 20.9 ||

"जो लोक सदा अपने ही कल्याण के विषय में मोहग्रस्त रहता है, महान विपत्तियों से घिरा है, और वृद्धावस्था तथा रोगों की सैकड़ों व्याधियों से युक्त है, ऐसे लोक को कौन मारेगा?"

श्लोक 10 (uttara.20.10)

तैस्तैरनिष्टोपगमैरजस्रं यत्र कुत्र कः । मतिमान्मानुषे लोके युद्धेन प्रणयी भवेत् ॥ 20.10 ॥

taistairaniṣṭopagamairajasraṃ yatra kutra kaḥ | matimānmānuṣe loke yuddhena praṇayī bhavet || 20.10 ||

"नाना प्रकार के अनिष्टों से निरन्तर घिरा हुआ, जहाँ-तहाँ कोई बुद्धिमान व्यक्ति भला मनुष्य-लोक में युद्ध का इच्छुक कैसे हो सकता है?"

श्लोक 11 (uttara.20.11)

क्षीयमाणं दैवहतं श्रुत्पिपासाजरादिभिः । विषादशोकसम्मूढं लोकं त्वं क्षपयस्व मा ॥ 20.11 ॥

kṣīyamāṇaṃ daivahataṃ śrutpipāsājarādibhiḥ | viṣādaśokasammūḍhaṃ lokaṃ tvaṃ kṣapayasva mā || 20.11 ||

"भाग्य से आहत, भूख-प्यास और बुढ़ापे आदि से क्षीण होते, विषाद और शोक से मोहग्रस्त इस लोक को अब और मत सताओ।"

श्लोक 12 (uttara.20.12)

पश्य तावन्महाबाहो राक्षसेश्वर मानुषम् । मूढमेवं विचित्रार्थं यस्य न ज्ञायते गतिः ॥ 20.12 ॥

paśya tāvanmahābāho rākṣaseśvara mānuṣam | mūḍhamevaṃ vicitrārthaṃ yasya na jñāyate gatiḥ || 20.12 ||

"हे महाबाहु राक्षसेश्वर, इस मनुष्य-लोक को तो देखो - इतना मोहग्रस्त, इतने विचित्र उद्देश्यों वाला, जिसकी गति कोई नहीं जानता।"

श्लोक 13 (uttara.20.13)

क्वचिद्वादित्रनृत्यादि सेव्यते मुदितैर्जनैः । रुद्यते चापरैरार्तैर्धाराश्रुनयनाननैः ॥ 20.13 ॥

kvacidvāditranṛtyādi sevyate muditairjanaiḥ | rudyate cāparairārtairdhārāśrunayanānanaiḥ || 20.13 ||

"कहीं आनन्दित लोग वाद्य और नृत्य आदि का आनन्द ले रहे हैं, तो कहीं दूसरे दुखी लोग आँसुओं की धाराओं से भरे मुख लिए रो रहे हैं।"

श्लोक 14 (uttara.20.14)

मातापितृसुतस्नेहैर्भार्याबन्धुमनोरमैः । मोहितो ऽयं जनो ध्वस्तः क्लेशं स्वं नावबुध्यते ॥ 20.14 ॥

mātāpitṛsutasnehairbhāryābandhumanoramaiḥ | mohito 'yaṃ jano dhvastaḥ kleśaṃ svaṃ nāvabudhyate || 20.14 ||

"माता-पिता-पुत्र के स्नेह से, तथा प्रिय पत्नी और बन्धुओं के मोह से भ्रमित यह प्रजा, स्वयं नष्ट होकर भी अपने ही दुःख को नहीं पहचानती।"

श्लोक 15 (uttara.20.15)

अलमेनं परिक्लिश्य लोकं मोहनिराकृतम् । जित एव त्वया सौम्य मर्त्यलोको न संशयः ॥ 20.15 ॥

alamenaṃ parikliśya lokaṃ mohanirākṛtam | jita eva tvayā saumya martyaloko na saṃśayaḥ || 20.15 ||

"मोह से पहले ही गिरे हुए इस लोक को कष्ट देना बन्द करो। हे सौम्य, मर्त्यलोक तो तुमसे पहले ही जीता जा चुका है - इसमें संशय नहीं।"

श्लोक 16 (uttara.20.16)

अवश्यमेभिः सर्वैश्च गन्तव्यं यमसादनम् । तन्निगृह्णीष्व पौलस्त्य यमं परपुरञ्जय ॥ 20.16 ॥

avaśyamebhiḥ sarvaiśca gantavyaṃ yamasādanam | tannigṛhṇīṣva paulastya yamaṃ parapurañjaya || 20.16 ||

"इन सबको अवश्य ही यमलोक जाना है। इसके बजाय, हे पौलस्त्य, हे शत्रुनगर-विजेता, स्वयं यम को ही जीत लो।"

श्लोक 17 (uttara.20.17)

तस्मिञ्जिते जितं सर्वं भवत्येव न संशयः । एवमुक्तस्तु लङ्केशो दीप्यमानं स्वतेजसा । अब्रवीन्नारदं तत्र सम्प्रहस्याभिवाद्य च ॥ 20.17 ॥

tasmiñjite jitaṃ sarvaṃ bhavatyeva na saṃśayaḥ | evamuktastu laṅkeśo dīpyamānaṃ svatejasā | abravīnnāradaṃ tatra samprahasyābhivādya ca || 20.17 ||

"उसे जीत लेने पर तो सब कुछ ही जीता हुआ हो जाता है - इसमें कोई संशय नहीं।" इस प्रकार कहे जाने पर, लंकेश ने अपने ही तेज से दीप्तिमान नारद को हँसते हुए प्रणाम करके कहा -

श्लोक 18 (uttara.20.18)

महर्षे देवगन्धर्वविहार समरप्रिय । अहं समुद्यतो गन्तुं विजयार्थं रसातलम् ॥ 20.18 ॥

maharṣe devagandharvavihāra samarapriya | ahaṃ samudyato gantuṃ vijayārthaṃ rasātalam || 20.18 ||

"हे महर्षि, देवगन्धर्वों के साथ विहार करने वाले, युद्धप्रिय! मैं विजय के लिए रसातल जाने को उद्यत हूँ।"

श्लोक 19 (uttara.20.19)

ततो लोकत्रयं जित्वा स्थाप्य नागान्सुरान्वशे । समुद्रममृतार्थं च मथिष्यामि रसालयम् ॥ 20.19 ॥

tato lokatrayaṃ jitvā sthāpya nāgānsurānvaśe | samudramamṛtārthaṃ ca mathiṣyāmi rasālayam || 20.19 ||

"फिर तीनों लोकों को जीतकर, नागों और देवताओं को वश में करके, अमृत के लिए रसाश्रय समुद्र का मन्थन करूँगा।"

श्लोक 20 (uttara.20.20)

अथाब्रवीदृशग्रीवं नारदो भगवानृषिः । क्व खल्विदानीं मार्गेण त्वया ह्यन्येन गम्यते ॥ 20.20 ॥

athābravīdṛśagrīvaṃ nārado bhagavānṛṣiḥ | kva khalvidānīṃ mārgeṇa tvayā hyanyena gamyate || 20.20 ||

तब भगवान् ऋषि नारद ने दशग्रीव से कहा, "परन्तु अब तुम किस दूसरे मार्ग से जाओगे?"

श्लोक 21 (uttara.20.21)

अयं खलु सुदुर्गम्यः प्रेतराजपुरं प्रति । मार्गो गच्छति दुर्धर्षो यमस्यामित्रकर्शन ॥ 20.21 ॥

ayaṃ khalu sudurgamyaḥ pretarājapuraṃ prati | mārgo gacchati durdharṣo yamasyāmitrakarśana || 20.21 ||

"हे शत्रुदमन, प्रेतराज के नगर की ओर जाने वाला यह मार्ग अत्यंत दुर्गम और दुर्धर्ष है - यह यम का मार्ग है।"

श्लोक 22 (uttara.20.22)

स तु शारदमेघाभं हासं मुक्त्वा दशाननः । उवाच कृतमित्येव वचनं चेदमब्रवीत् ॥ 20.22 ॥

sa tu śāradameghābhaṃ hāsaṃ muktvā daśānanaḥ | uvāca kṛtamityeva vacanaṃ cedamabravīt || 20.22 ||

तब दशानन ने शरद्-ऋतु के मेघ के समान हास्य छोड़ते हुए कहा, "ठीक है!" और यह वचन आगे कहा -

श्लोक 23 (uttara.20.23)

तस्मादेवमहं ब्रह्मन् वैवस्वतवधोद्यतः । गच्छामि दक्षिणामाशां यत्र सूर्यात्मजो नृपः ॥ 20.23 ॥

tasmādevamahaṃ brahman vaivasvatavadhodyataḥ | gacchāmi dakṣiṇāmāśāṃ yatra sūryātmajo nṛpaḥ || 20.23 ||

"हे ब्रह्मन्, इसलिए मैं वैवस्वत (यम) का वध करने के लिए उद्यत होकर, उस दक्षिण दिशा की ओर जाता हूँ, जहाँ वह सूर्यपुत्र राजा रहता है।"

श्लोक 24 (uttara.20.24)

मया हि भगवन्क्रोधात्प्रतिज्ञातं रणार्थिना । अवजेष्यामि चतुरो लोकपालानिति प्रभो ॥ 20.24 ॥

mayā hi bhagavankrodhātpratijñātaṃ raṇārthinā | avajeṣyāmi caturo lokapālāniti prabho || 20.24 ||

"हे भगवन्, क्योंकि मैंने क्रोधवश युद्ध चाहते हुए यह प्रतिज्ञा की है, हे प्रभो, कि मैं चारों लोकपालों को पराजित करूँगा।"

श्लोक 25 (uttara.20.25)

तदिह प्रस्थितो ऽहं वै प्रेतराजपुरं प्रति । प्राणिसङ्क्लेशकर्तारं योजयिष्यामि मृत्युना ॥ 20.25 ॥

tadiha prasthito 'haṃ vai pretarājapuraṃ prati | prāṇisaṅkleśakartāraṃ yojayiṣyāmi mṛtyunā || 20.25 ||

"इसीलिए मैं अब प्रेतराज के नगर की ओर चल पड़ा हूँ; प्राणियों को कष्ट देने वाले उस यम को ही मैं मृत्यु से युक्त करूँगा।"

श्लोक 26 (uttara.20.26)

एवमुक्त्वा दशग्रीवो मुनिं तमभिवाद्य च । प्रययौ दक्षिणामाशां प्रविष्टः सह मन्त्रिभिः ॥ 20.26 ॥

evamuktvā daśagrīvo muniṃ tamabhivādya ca | prayayau dakṣiṇāmāśāṃ praviṣṭaḥ saha mantribhiḥ || 20.26 ||

यह कहकर दशग्रीव ने उस मुनि को प्रणाम किया और अपने मंत्रियों सहित दक्षिण दिशा की ओर प्रस्थान किया।

श्लोक 27 (uttara.20.27)

नारदस्तु महातेजा मुहूर्तं ध्यानमास्थितः । चिन्तयामास विप्रेन्द्रो विधूम इव पावकः ॥ 20.27 ॥

nāradastu mahātejā muhūrtaṃ dhyānamāsthitaḥ | cintayāmāsa viprendro vidhūma iva pāvakaḥ || 20.27 ||

किन्तु महातेजस्वी नारद कुछ क्षण ध्यानमग्न रहे; वे विप्रेन्द्र धुआँरहित अग्नि के समान यह विचार करने लगे -

श्लोक 28 (uttara.20.28)

येन लोकास्त्रयः सेन्द्राः क्लिश्यन्ते सचराचराः । क्षीणे चायुषि धर्मेण स कालो जेष्यते कथम् ॥ 20.28 ॥

yena lokāstrayaḥ sendrāḥ kliśyante sacarācarāḥ | kṣīṇe cāyuṣi dharmeṇa sa kālo jeṣyate katham || 20.28 ||

"जिससे इन्द्र सहित तीनों लोक, चर और अचर सभी प्राणी, आयु धर्मानुसार क्षीण होने पर पीड़ित होते हैं, उस काल (यम) को भला कोई कैसे जीत सकता है?"

श्लोक 29 (uttara.20.29)

स्वदत्तकृतसाक्षी यो द्वितीय इव पावकः । लब्धसञ्ज्ञा विजेष्यन्ते लोका यस्य महात्मनः ॥ 20.29 ॥

svadattakṛtasākṣī yo dvitīya iva pāvakaḥ | labdhasañjñā vijeṣyante lokā yasya mahātmanaḥ || 20.29 ||

"जो प्रत्येक किए और दिए हुए कर्म का साक्षी है, जो दूसरी अग्नि के समान है, जिस महात्मा की चेतना से ही लोक पहचाने जाते हैं - उसे कैसे जीता जाएगा?"

श्लोक 30 (uttara.20.30)

यस्य नित्यं त्रयो लोका विद्रवन्ति भयार्दिताः । तं कथं राक्षसेन्द्रो ऽसौ स्वयमेव गमिष्यति ॥ 20.30 ॥

yasya nityaṃ trayo lokā vidravanti bhayārditāḥ | taṃ kathaṃ rākṣasendro 'sau svayameva gamiṣyati || 20.30 ||

"जिससे भयभीत होकर तीनों लोक सदा भाग खड़े होते हैं, वह राक्षसेन्द्र स्वयं उसके पास कैसे जाएगा?"

श्लोक 31 (uttara.20.31)

यो विधाता च धाता च सुकृतं दुष्कृतं तथा । त्रैलोक्यं विजितं येन तं कथं विजयिष्यते ॥ 20.31 ॥

yo vidhātā ca dhātā ca sukṛtaṃ duṣkṛtaṃ tathā | trailokyaṃ vijitaṃ yena taṃ kathaṃ vijayiṣyate || 20.31 ||

"जो विधाता भी है और धाता भी, जो सुकृत और दुष्कृत दोनों का निर्णायक है, जिसके द्वारा तीनों लोक पहले से ही जीते हुए हैं - उसे वह कैसे जीत पाएगा?"

श्लोक 32 (uttara.20.32)

अपरं किन्तु कृत्वायं विधानं संविधास्यति । कौतूहलसमुत्पन्नो यास्यामि यमसादनम् ॥ 20.32 ॥

aparaṃ kintu kṛtvāyaṃ vidhānaṃ saṃvidhāsyati | kautūhalasamutpanno yāsyāmi yamasādanam || 20.32 ||

"परन्तु अब आगे यह क्या व्यवस्था करने वाला है? कुतूहलवश मैं स्वयं यमलोक जाऊँगा -"

श्लोक 33 (uttara.20.33)

विमर्दं द्रष्टुमनयोर्यमराक्षसयोः स्वयम् ॥ 20.33 ॥

vimardaṃ draṣṭumanayoryamarākṣasayoḥ svayam || 20.33 ||

- यम और उस राक्षस के बीच होने वाले इस संघर्ष को अपनी आँखों से देखने के लिए।

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