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उत्तरकाण्ड · सर्ग 27

सुमाली-वध

सर्ग 26सर्ग-सूचीसर्ग 28

श्लोक 1 (uttara.27.1)

कैलासं लङ्घयित्वाथ दशग्रीवः स रावणः। आससाद महातेजा इन्द्रलोकं निशाचरः ॥ 27.1 ॥

kailāsaṃ laṅghayitvātha daśagrīvaḥ sa rāvaṇaḥ| āsasāda mahātejā indralokaṃ niśācaraḥ || 27.1 ||

तब कैलास को लाँघकर वह महातेजस्वी निशाचर दशग्रीव रावण इन्द्रलोक में जा पहुँचा।

श्लोक 2 (uttara.27.2)

तस्य राक्षससैन्यस्य समन्तादुपयास्यतः। देवलोकं ययौ शब्दो मथ्यमानार्णवोपमः ॥ 27.2 ॥

tasya rākṣasasainyasya samantādupayāsyataḥ| devalokaṃ yayau śabdo mathyamānārṇavopamaḥ || 27.2 ||

उसकी राक्षस-सेना के चारों ओर से आगे बढ़ने पर, मथे जाते हुए समुद्र के समान वह ध्वनि देवलोक तक जा पहुँची।

श्लोक 3 (uttara.27.3)

श्रुत्वा तु रावणं प्राप्तमिन्द्रश्चलित आसनात्। अब्रवीत्तत्र तान् देवान् सर्वानेव समागतान् ॥ 27.3 ॥

śrutvā tu rāvaṇaṃ prāptamindraścalita āsanāt| abravīttatra tān devān sarvāneva samāgatān || 27.3 ||

रावण के आगमन की बात सुनकर इन्द्र अपने आसन से उछल पड़े, और वहाँ एकत्र हुए समस्त देवताओं से कहने लगे —

श्लोक 4 (uttara.27.4)

आदित्यान्सवसून्रुद्रान्विश्वान्साध्यान्मरुद्गणान्। सज्जीभवत युद्धार्थं रावणस्य दुरात्मनः ॥ 27.4 ॥

ādityānsavasūnrudrānviśvānsādhyānmarudgaṇān| sajjībhavata yuddhārthaṃ rāvaṇasya durātmanaḥ || 27.4 ||

"हे आदित्यो, वसुओ, रुद्रो, विश्वेदेवो, साध्यो और मरुद्गणो! दुरात्मा रावण के विरुद्ध युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जाओ।"

श्लोक 5 (uttara.27.5)

एवमुक्तास्तु शक्रेण देवाः शक्रसमा युधि। सन्नह्य सुमहासत्त्वा युद्धश्रद्धासमन्विताः ॥ 27.5 ॥

evamuktāstu śakreṇa devāḥ śakrasamā yudhi| sannahya sumahāsattvā yuddhaśraddhāsamanvitāḥ || 27.5 ||

शक्र (इन्द्र) द्वारा ऐसा कहे जाने पर, युद्ध में शक्र के समान वे महाबली देवता, युद्ध की उत्कण्ठा से भरकर, सन्नद्ध हो गए।

श्लोक 6 (uttara.27.6)

स तु दीनः परित्रस्तो महेन्द्रो रावणं प्रति। विष्णोः समीपमागत्य वाक्यमेतदुवाच ह ॥ 27.6 ॥

sa tu dīnaḥ paritrasto mahendro rāvaṇaṃ prati| viṣṇoḥ samīpamāgatya vākyametaduvāca ha || 27.6 ||

फिर भी महेन्द्र, रावण के भय से दीन और अत्यन्त भयभीत होकर, विष्णु के पास जाकर यह वचन बोले —

श्लोक 7 (uttara.27.7)

विष्णो कथं करिष्यामि महावीर्यपराक्रमः। असौ हि बलवद्रक्षो युद्धार्थमभिवर्तते ॥ 27.7 ॥

viṣṇo kathaṃ kariṣyāmi mahāvīryaparākramaḥ| asau hi balavadrakṣo yuddhārthamabhivartate || 27.7 ||

"हे विष्णो! मैं क्या करूँ? यह महापराक्रमी, बलवान् राक्षस युद्ध के लिए हमारी ओर बढ़ा आ रहा है।

श्लोक 8 (uttara.27.8)

वरप्रदानाद्बलवान्न खल्वन्येन हेतुना। तत्तु सत्यवचः कार्यं यदुक्तं पद्मयोनिना ॥ 27.8 ॥

varapradānādbalavānna khalvanyena hetunā| tattu satyavacaḥ kāryaṃ yaduktaṃ padmayoninā || 27.8 ||

वह वर के प्रदान से ही बलवान् है, किसी अन्य कारण से नहीं; और कमल से उत्पन्न ब्रह्मा द्वारा कहा गया वह वचन सत्य ही सिद्ध होना चाहिए।

श्लोक 9 (uttara.27.9)

तद्यथा नमुचिर्वृत्रो बलिर्नरकशम्बरौ। त्वद्बलं समवष्टभ्य मया दग्धास्तथा कुरु ॥ 27.9 ॥

tadyathā namucirvṛtro balirnarakaśambarau| tvadbalaṃ samavaṣṭabhya mayā dagdhāstathā kuru || 27.9 ||

जिस प्रकार नमुचि, वृत्र, बलि, नरक और शम्बर को मैंने आपके बल का सहारा लेकर भस्म किया था, वैसे ही अब भी कीजिए।

श्लोक 10 (uttara.27.10)

नह्यन्यो देवदेवेश त्वामृते मधुसूदन। गतिः परायणं नास्ति त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ 27.10 ॥

nahyanyo devadeveśa tvāmṛte madhusūdana| gatiḥ parāyaṇaṃ nāsti trailokye sacarācare || 27.10 ||

हे देवाधिदेव, मधुसूदन! आपके अतिरिक्त चराचर त्रैलोक्य में और कोई गति और परम आश्रय नहीं है।

श्लोक 11 (uttara.27.11)

त्वं हि नारायणः श्रीमान्पद्मनाभः सनातनः। त्वयेमे स्थापिता लोकाः शक्रश्चाहं सुरेश्वरः ॥ 27.11 ॥

tvaṃ hi nārāyaṇaḥ śrīmānpadmanābhaḥ sanātanaḥ| tvayeme sthāpitā lokāḥ śakraścāhaṃ sureśvaraḥ || 27.11 ||

क्योंकि आप ही श्रीमान्, पद्मनाभ, सनातन नारायण हैं; आपने ही इन लोकों की स्थापना की, और आपने ही मुझे भी देवेश्वर शक्र बनाया।

श्लोक 12 (uttara.27.12)

त्वया सृष्टमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्। त्वामेव भगवन्सर्वे प्रविशन्ति युगक्षये ॥ 27.12 ॥

tvayā sṛṣṭamidaṃ sarvaṃ trailokyaṃ sacarācaram| tvāmeva bhagavansarve praviśanti yugakṣaye || 27.12 ||

आपके ही द्वारा यह सम्पूर्ण चराचर त्रैलोक्य रचा गया है; और हे भगवन्! युग के क्षय होने पर सब कुछ आप में ही समा जाता है।

श्लोक 13 (uttara.27.13)

तदाचक्ष्व यथा तत्त्वं देवदेव मम स्वयम्। अपि चक्रसहायस्त्वं योत्स्यसे रावणं प्रभो ॥ 27.13 ॥

tadācakṣva yathā tattvaṃ devadeva mama svayam| api cakrasahāyastvaṃ yotsyase rāvaṇaṃ prabho || 27.13 ||

अतः हे देवदेव! अब आप स्वयं मुझे यह यथार्थ बताइए — क्या हे प्रभो, आप स्वयं अपने चक्र सहित रावण से युद्ध करेंगे?"

श्लोक 14 (uttara.27.14)

एवमुक्तः स शक्रेण देवो नारायणः प्रभुः। अब्रवीन्न परित्रासः कर्तव्यः श्रूयतां च मे ॥ 27.14 ॥

evamuktaḥ sa śakreṇa devo nārāyaṇaḥ prabhuḥ| abravīnna paritrāsaḥ kartavyaḥ śrūyatāṃ ca me || 27.14 ||

शक्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर प्रभु देव नारायण ने कहा — "भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है; मेरी बात सुनो।

श्लोक 15 (uttara.27.15)

न तावदेष दुष्टात्मा शक्यो जेतुं सुरासुरैः। हन्तुं चापि समासाद्य वरदानेन दुर्जयः ॥ 27.15 ॥

na tāvadeṣa duṣṭātmā śakyo jetuṃ surāsuraiḥ| hantuṃ cāpi samāsādya varadānena durjayaḥ || 27.15 ||

यह दुष्टात्मा अभी देवताओं और असुरों द्वारा जीता नहीं जा सकता; उससे भिड़कर उसे मार पाना भी सम्भव नहीं है, क्योंकि वरदान के कारण वह अजेय है।

श्लोक 16 (uttara.27.16)

सर्वथा तु महत्कर्म करिष्यति बलोत्कटः। राक्षसः पुत्रसहितो दृष्टमेतन्निसर्गतः ॥ 27.16 ॥

sarvathā tu mahatkarma kariṣyati balotkaṭaḥ| rākṣasaḥ putrasahito dṛṣṭametannisargataḥ || 27.16 ||

यह अत्यन्त बलशाली राक्षस अपने पुत्र सहित हर प्रकार से एक बड़ा कार्य करेगा — यह तो स्वभाव से ही निश्चित देखा जाता है।

श्लोक 17 (uttara.27.17)

यत्तु मां त्वमभाषिष्ठ युद्ध्यस्वेति सुरेश्वर। नाहं तं प्रतियोत्स्यामि रावणं राक्षसं युधि ॥ 27.17 ॥

yattu māṃ tvamabhāṣiṣṭha yuddhyasveti sureśvara| nāhaṃ taṃ pratiyotsyāmi rāvaṇaṃ rākṣasaṃ yudhi || 27.17 ||

किन्तु हे सुरेश्वर! तुमने जो मुझसे कहा कि 'युद्ध करो', मैं उस राक्षस रावण से युद्ध में नहीं लड़ूँगा।

श्लोक 18 (uttara.27.18)

नाहत्वा समरे शत्रुं विष्णुः प्रतिनिवर्तते। दुर्लभश्चैव कामो ऽद्य वरगुप्ताद्धि रावणात् ॥ 27.18 ॥

nāhatvā samare śatruṃ viṣṇuḥ pratinivartate| durlabhaścaiva kāmo 'dya varaguptāddhi rāvaṇāt || 27.18 ||

क्योंकि विष्णु युद्ध में शत्रु का वध किए बिना कभी नहीं लौटता; और आज वरदान से सुरक्षित रावण पर विजय पाना अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 19 (uttara.27.19)

प्रतिजाने च देवेन्द्र त्वत्समीपे शतक्रतो। भविता ऽस्मि यथा ऽस्याहं रक्षसो मृत्युकारणम् ॥ 27.19 ॥

pratijāne ca devendra tvatsamīpe śatakrato| bhavitā 'smi yathā 'syāhaṃ rakṣaso mṛtyukāraṇam || 27.19 ||

किन्तु हे देवेन्द्र, हे शतक्रतु! मैं तुम्हारे समक्ष यह प्रतिज्ञा करता हूँ, कि मैं ही इस राक्षस की मृत्यु का कारण बनूँगा।

श्लोक 20 (uttara.27.20)

अहमेव निहन्ता ऽस्मि रावणं सपुरःसरम्। देवता नन्दयिष्यामि ज्ञात्वा कालमुपागतम्। एतत्ते कथितं तत्त्वं देवराज शचीपते ॥ 27.20 ॥

ahameva nihantā 'smi rāvaṇaṃ sapuraḥsaram| devatā nandayiṣyāmi jñātvā kālamupāgatam| etatte kathitaṃ tattvaṃ devarāja śacīpate || 27.20 ||

मैं ही उसके अनुयायियों सहित रावण का वध करने वाला हूँगा; उचित काल जानकर मैं देवताओं को आनन्दित करूँगा। हे देवराज, हे शचीपते! यह सत्य मैंने तुम्हें बता दिया।

श्लोक 21 (uttara.27.21)

युद्ध्यस्व विगतत्रासः सर्वैः सार्धं महाबल ॥ 27.21 ॥

yuddhyasva vigatatrāsaḥ sarvaiḥ sārdhaṃ mahābala || 27.21 ||

हे महाबल! अब भय त्यागकर सबके साथ युद्ध करो।"

श्लोक 22 (uttara.27.22)

ततो रुद्राः सहादित्या वसवो मरुतो ऽश्वनौ। सन्नद्धा निर्ययुस्तूर्णं राक्षसानभितः पुरात् ॥ 27.22 ॥

tato rudrāḥ sahādityā vasavo maruto 'śvanau| sannaddhā niryayustūrṇaṃ rākṣasānabhitaḥ purāt || 27.22 ||

तब रुद्र, आदित्यों सहित, वसु, मरुद्गण और दोनों अश्विनीकुमार, कवच धारण कर, शीघ्र ही नगर से राक्षसों की ओर निकल पड़े।

श्लोक 23 (uttara.27.23)

एतस्मिन्नन्तरे नादः शुश्रुवे रजनीक्षये। तस्य रावणसैन्यस्य प्रयुद्धस्य समन्ततः ॥ 27.23 ॥

etasminnantare nādaḥ śuśruve rajanīkṣaye| tasya rāvaṇasainyasya prayuddhasya samantataḥ || 27.23 ||

इसी बीच, रात्रि के अन्त होते-होते, चारों ओर रावण की उस युद्धरत सेना का महान् घोष सुनाई देने लगा।

श्लोक 24 (uttara.27.24)

ते प्रयुद्धा महावीर्या ह्यन्योन्यमभिवीक्ष्य वै। सङ्ग्राममेवाभिमुखा ह्यभवर्तन्त हृष्टवत् ॥ 27.24 ॥

te prayuddhā mahāvīryā hyanyonyamabhivīkṣya vai| saṅgrāmamevābhimukhā hyabhavartanta hṛṣṭavat || 27.24 ||

वे महापराक्रमी योद्धा, परस्पर एक-दूसरे को देखकर, हर्षित-से होकर संग्राम की ओर आगे बढ़े और युद्ध में जुट गए।

श्लोक 25 (uttara.27.25)

ततो दैवतसैन्यनां सङ्क्षोभः समजायत। तदक्षयं महासैन्यं दृष्ट्वा समरमूर्धनि ॥ 27.25 ॥

tato daivatasainyanāṃ saṅkṣobhaḥ samajāyata| tadakṣayaṃ mahāsainyaṃ dṛṣṭvā samaramūrdhani || 27.25 ||

तब देवताओं की सेना में हलचल मच गई, युद्ध के मोर्चे पर उस अक्षय महासेना को देखकर।

श्लोक 26 (uttara.27.26)

ततो युद्धं समभवेद्देवदानवरक्षसाम्। घोरं तुमुलनिर्ह्रादं नानाप्रहरणोद्यतम् ॥ 27.26 ॥

tato yuddhaṃ samabhaveddevadānavarakṣasām| ghoraṃ tumulanirhrādaṃ nānāpraharaṇodyatam || 27.26 ||

तब देवताओं, दानवों और राक्षसों के बीच भयंकर, कोलाहलपूर्ण, नाना प्रकार के शस्त्रों से युक्त युद्ध छिड़ गया।

श्लोक 27 (uttara.27.27)

एतस्मिन्नन्तरे शूरा राक्षसा घोरदर्शनाः। युद्धार्थं समवर्तन्त सचिवा रावणस्य ते ॥ 27.27 ॥

etasminnantare śūrā rākṣasā ghoradarśanāḥ| yuddhārthaṃ samavartanta sacivā rāvaṇasya te || 27.27 ||

इसी बीच रावण के वे वीर, भयानक-दर्शन मन्त्री राक्षस युद्ध के लिए एकत्र होकर आगे बढ़े।

श्लोक 28 (uttara.27.28)

मारीचश्च प्रहस्तश्च महापार्श्वमहोदरौ। अकम्पनो निकुम्भश्च शुकः सारण एव च ॥ 27.28 ॥

mārīcaśca prahastaśca mahāpārśvamahodarau| akampano nikumbhaśca śukaḥ sāraṇa eva ca || 27.28 ||

मारीच, प्रहस्त, महापार्श्व और महोदर, अकम्पन, निकुम्भ, शुक और सारण भी,

श्लोक 29 (uttara.27.29)

संह्लादो धूमकेतुश्च महादंष्ट्रो घटोदरः। जम्बुमाली महाह्रादो विरूपाक्षश्च राक्षसः ॥ 27.29 ॥

saṃhlādo dhūmaketuśca mahādaṃṣṭro ghaṭodaraḥ| jambumālī mahāhrādo virūpākṣaśca rākṣasaḥ || 27.29 ||

संह्लाद, धूमकेतु, महादंष्ट्र, घटोदर, जम्बुमाली, महाह्राद, तथा राक्षस विरूपाक्ष,

श्लोक 30 (uttara.27.30)

सुप्तघ्नो यज्ञकोपश्च दुर्मुखो दूषणः खरः। त्रिशिराः करवीराक्षः सूर्यशत्रुश्च राक्षसः ॥ 27.30 ॥

suptaghno yajñakopaśca durmukho dūṣaṇaḥ kharaḥ| triśirāḥ karavīrākṣaḥ sūryaśatruśca rākṣasaḥ || 27.30 ||

सुप्तघ्न, यज्ञकोप, दुर्मुख, दूषण, खर, त्रिशिरा, करवीराक्ष, तथा राक्षस सूर्यशत्रु,

श्लोक 31 (uttara.27.31)

महाकायो ऽतिकायश्च देवान्तकनरान्तकौ। एतैः सर्वैः परिवृतो महावीर्यो महाबलः ॥ 27.31 ॥

mahākāyo 'tikāyaśca devāntakanarāntakau| etaiḥ sarvaiḥ parivṛto mahāvīryo mahābalaḥ || 27.31 ||

महाकाय, अतिकाय, तथा देवान्तक और नरान्तक — इन सबसे घिरे हुए वे महापराक्रमी, महाबली...

श्लोक 32 (uttara.27.32)

रावणस्यार्यकः सैन्यं सुमाली प्रविवेश ह। स दैवतगणान्सर्वान्नानाप्रहरणैः शितैः। व्यध्वंसयत्सुसङ्क्रुद्धो वायुर्जलधरानिव ॥ 27.32 ॥

rāvaṇasyāryakaḥ sainyaṃ sumālī praviveśa ha| sa daivatagaṇānsarvānnānāpraharaṇaiḥ śitaiḥ| vyadhvaṃsayatsusaṅkruddho vāyurjaladharāniva || 27.32 ||

...रावण के पितामह (आर्यक) सुमाली सेना में प्रविष्ट हुए; और अत्यन्त क्रुद्ध होकर, नाना प्रकार के तीक्ष्ण शस्त्रों से उन्होंने देवताओं के समस्त समूहों को छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे वायु मेघों को छिन्न-भिन्न कर देती है।

श्लोक 33 (uttara.27.33)

तद्दैवतबलं राम हन्यमानं निशाचरैः। प्रणुन्नं सर्वतो दिग्भ्यः सिंहनुन्ना मृगा इव ॥ 27.33 ॥

taddaivatabalaṃ rāma hanyamānaṃ niśācaraiḥ| praṇunnaṃ sarvato digbhyaḥ siṃhanunnā mṛgā iva || 27.33 ||

हे राम! रात्रिचर राक्षसों द्वारा प्रहार की गई वह देव-सेना चारों दिशाओं से इस प्रकार खदेड़ी गई, जैसे सिंह द्वारा खदेड़े गए मृग।

श्लोक 34 (uttara.27.34)

एतस्मिन्नन्तरे शूरो वसूनामष्टमो वसुः। सावित्र इति विख्यातः प्रविवेश रणाजिरम् ॥ 27.34 ॥

etasminnantare śūro vasūnāmaṣṭamo vasuḥ| sāvitra iti vikhyātaḥ praviveśa raṇājiram || 27.34 ||

इसी बीच वसुओं में आठवें, सावित्र नाम से विख्यात, वीर वसु रणभूमि में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 35 (uttara.27.35)

तथादित्यौ महावीर्यौ त्वष्टा पूषा च दंशितौ। निर्भयौ सह सैन्येन तदा प्राविशतां रणे ॥ 27.35 ॥

tathādityau mahāvīryau tvaṣṭā pūṣā ca daṃśitau| nirbhayau saha sainyena tadā prāviśatāṃ raṇe || 27.35 ||

और तब महापराक्रमी दोनों आदित्य — त्वष्टा और पूषा भी, कवच धारण किए हुए, निर्भय होकर, अपनी सेना सहित युद्ध में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 36 (uttara.27.36)

ततो युद्धं समभवत्सुराणां सह राक्षसैः। क्रुद्धानां रक्षसां कीर्तिं समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥ 27.36 ॥

tato yuddhaṃ samabhavatsurāṇāṃ saha rākṣasaiḥ| kruddhānāṃ rakṣasāṃ kīrtiṃ samareṣvanivartinām || 27.36 ||

तब देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध हुआ — उन क्रुद्ध राक्षसों की कीर्ति के अनुरूप, जो समरों में कभी पीठ नहीं दिखाते थे।

श्लोक 37 (uttara.27.37)

ततस्ते राक्षसाः सर्वे विबुधान्समरे स्थितान्। नानाप्रहरणैर्घोरैर्जघ्नुः शतसहस्रशः ॥ 27.37 ॥

tataste rākṣasāḥ sarve vibudhānsamare sthitān| nānāpraharaṇairghorairjaghnuḥ śatasahasraśaḥ || 27.37 ||

तब उन समस्त राक्षसों ने युद्धरत देवताओं को नाना प्रकार के भयानक शस्त्रों से सैकड़ों-हजारों की संख्या में मार गिराया।

श्लोक 38 (uttara.27.38)

देवाश्च राक्षसान्घोरान्महाबलपराक्रमान्। समरे विमलैः शस्त्रैरुपनिन्युर्यमक्षयम् ॥ 27.38 ॥

devāśca rākṣasānghorānmahābalaparākramān| samare vimalaiḥ śastrairupaninyuryamakṣayam || 27.38 ||

और देवताओं ने भी अपने निर्मल शस्त्रों से उन महाबली, पराक्रमी भयानक राक्षसों को युद्ध में यमलोक भेज दिया।

श्लोक 39 (uttara.27.39)

एतस्मिन्नन्तरे राम सुमाली नाम राक्षसः। नानाप्रहरणैः क्रुद्धस्तत्सैन्यं सो ऽभ्यवर्तत ॥ 27.39 ॥

etasminnantare rāma sumālī nāma rākṣasaḥ| nānāpraharaṇaiḥ kruddhastatsainyaṃ so 'bhyavartata || 27.39 ||

हे राम! इसी बीच सुमाली नामक राक्षस, क्रुद्ध होकर, नाना शस्त्रों के साथ उस सेना की ओर बढ़ा।

श्लोक 40 (uttara.27.40)

स दैवतबलं सर्वं नानाप्रहणैः शितैः। व्यध्वंसयत सङ्क्रुद्धो वायुर्जलधरं यथा ॥ 27.40 ॥

sa daivatabalaṃ sarvaṃ nānāprahaṇaiḥ śitaiḥ| vyadhvaṃsayata saṅkruddho vāyurjaladharaṃ yathā || 27.40 ||

उसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर नाना प्रकार के तीक्ष्ण शस्त्रों से देवताओं की सम्पूर्ण सेना को उसी प्रकार छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे वायु मेघ को छिन्न-भिन्न कर देती है।

श्लोक 41 (uttara.27.41)

ते महाबाणवर्षैश्च शूलप्रासैः सुदारुणैः। हन्यमानाः सुराः सर्वे न व्यतिष्ठन्त संहताः ॥ 27.41 ॥

te mahābāṇavarṣaiśca śūlaprāsaiḥ sudāruṇaiḥ| hanyamānāḥ surāḥ sarve na vyatiṣṭhanta saṃhatāḥ || 27.41 ||

उसकी बाणों की भारी वर्षा से तथा अत्यन्त भयंकर शूलों और भालों के प्रहार से आहत होकर, समस्त देवता संगठित होकर टिक न सके।

श्लोक 42 (uttara.27.42)

ततो विद्राव्यमाणेषु दैवतेषु सुमालिना। वसूनामष्टमः क्रुद्धः सावित्रो वै व्यवस्थितः ॥ 27.42 ॥

tato vidrāvyamāṇeṣu daivateṣu sumālinā| vasūnāmaṣṭamaḥ kruddhaḥ sāvitro vai vyavasthitaḥ || 27.42 ||

तब जब सुमाली द्वारा देवता खदेड़े जा रहे थे, तब वसुओं में आठवें, क्रुद्ध सावित्र दृढ़तापूर्वक डटे रहे।

श्लोक 43 (uttara.27.43)

संवृतः स्वैरथानीकैः प्रहरन्तं निशाचरम्। विक्रमेण महातेजा वारयामास संयुगे ॥ 27.43 ॥

saṃvṛtaḥ svairathānīkaiḥ praharantaṃ niśācaram| vikrameṇa mahātejā vārayāmāsa saṃyuge || 27.43 ||

अपने रथ-सेना समूहों से घिरे हुए वे महातेजस्वी सावित्र, अपने पराक्रम से प्रहार करते हुए उस निशाचर को युद्ध में रोकने लगे।

श्लोक 44 (uttara.27.44)

ततस्तयोर्महायुद्धमभवद्रोमहर्षणम् ॥ 27.44 ॥

tatastayormahāyuddhamabhavadromaharṣaṇam || 27.44 ||

तब उन दोनों के बीच रोमांचकारी महायुद्ध छिड़ गया।

श्लोक 45 (uttara.27.45)

सुमालिनो वसोश्चैव समरेष्वनिवर्तिनोः। ततस्तस्य महाबाणैर्वसुना सुमहात्मना। निहतः पन्नगरथः क्षणेन विनिपातितः ॥ 27.45 ॥

sumālino vasoścaiva samareṣvanivartinoḥ| tatastasya mahābāṇairvasunā sumahātmanā| nihataḥ pannagarathaḥ kṣaṇena vinipātitaḥ || 27.45 ||

— सुमाली और वसु के बीच, जो दोनों ही युद्ध में कभी पीछे नहीं हटते थे। तब उस महात्मा वसु के महान् बाणों से सुमाली का सर्प-रथ आहत होकर क्षणभर में ही गिरा दिया गया।

श्लोक 46 (uttara.27.46)

हत्वा तु संयुगे तस्य रथं बाणशतैश्चितम्। गदां तस्य वधार्थाय वसुर्जग्राह पाणिना ॥ 27.46 ॥

hatvā tu saṃyuge tasya rathaṃ bāṇaśataiścitam| gadāṃ tasya vadhārthāya vasurjagrāha pāṇinā || 27.46 ||

युद्ध में सैकड़ों बाणों से बिंधे हुए उसके रथ को नष्ट कर, वसु ने उसके वध के लिए अपने हाथ में गदा उठा ली।

श्लोक 47 (uttara.27.47)

ततः प्रगृह्य दीप्ताग्रां कालदण्डोपमां गदाम्। तां मूर्ध्नि पातयामास सावित्रो वै सुमालिनः ॥ 27.47 ॥

tataḥ pragṛhya dīptāgrāṃ kāladaṇḍopamāṃ gadām| tāṃ mūrdhni pātayāmāsa sāvitro vai sumālinaḥ || 27.47 ||

तब उस प्रज्वलित अग्रभाग वाली, कालदण्ड के समान गदा को उठाकर, सावित्र ने उसे सुमाली के मस्तक पर दे मारा।

श्लोक 48 (uttara.27.48)

सा तस्योपरि चोल्काभा पतन्तीव बभौ गदा। इन्द्रप्रमुक्ता गर्जन्ती गिराविव महाशनिः ॥ 27.48 ॥

sā tasyopari colkābhā patantīva babhau gadā| indrapramuktā garjantī girāviva mahāśaniḥ || 27.48 ||

वह गदा उसके ऊपर उल्का के समान गिरती हुई ऐसी शोभित हुई, जैसे इन्द्र द्वारा पर्वत पर छोड़ी गई गरजती हुई महान् वज्र।

श्लोक 49 (uttara.27.49)

तस्य नैवास्थि न शिरो न मांसं ददृशे तदा। गदया भस्मतां नीतं निहतस्य रणाजिरे ॥ 27.49 ॥

tasya naivāsthi na śiro na māṃsaṃ dadṛśe tadā| gadayā bhasmatāṃ nītaṃ nihatasya raṇājire || 27.49 ||

तब उसकी न तो हड्डी, न मस्तक, न ही मांस ही दिखाई दिया — रणभूमि में मारे गए उस सुमाली को गदा ने भस्म कर दिया था।

श्लोक 50 (uttara.27.50)

तं दृष्ट्वा निहतं सङ्ख्ये राक्षसास्ते समन्ततः। व्यद्रवन्सहिताः सर्वे क्रोशमानाः परस्परम्। विद्राव्यमाणा वसुना राक्षसा नावतस्थिरे ॥ 27.50 ॥

taṃ dṛṣṭvā nihataṃ saṅkhye rākṣasāste samantataḥ| vyadravansahitāḥ sarve krośamānāḥ parasparam| vidrāvyamāṇā vasunā rākṣasā nāvatasthire || 27.50 ||

उसे युद्ध में मारा गया देखकर, वे राक्षस चारों ओर से, परस्पर पुकारते हुए, सब मिलकर भाग खड़े हुए; वसु द्वारा खदेड़े जाने पर राक्षस टिक न सके।

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