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उत्तरकाण्ड · सर्ग 32

कार्तवीर्य अर्जुन द्वारा रावण-बन्धन

सर्ग 31सर्ग-सूचीसर्ग 33

श्लोक 1 (uttara.32.1)

नर्मदापुलिने यत्र राक्षसेन्द्रः सुदारुणः । पुष्पोपहारं कुरुते तस्माद्देशाददूरतः ॥ 32.1 ॥

narmadāpuline yatra rākṣasendraḥ sudāruṇaḥ | puṣpopahāraṃ kurute tasmāddeśādadūrataḥ || 32.1 ||

नर्मदा के जिस बालुका-तट पर वह अत्यन्त भयंकर राक्षसराज पुष्पोपहार अर्पित कर रहा था, उससे दूर नहीं —

श्लोक 2 (uttara.32.2)

अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो माहिष्मत्याः पतिः प्रभुः । क्रीडते सह नारीभिर्नर्मदातोयमाश्रितः ॥ 32.2 ॥

arjuno jayatāṃ śreṣṭho māhiṣmatyāḥ patiḥ prabhuḥ | krīḍate saha nārībhirnarmadātoyamāśritaḥ || 32.2 ||

— वहाँ विजयियों में श्रेष्ठ, माहिष्मती का स्वामी अर्जुन, नर्मदा के जल में प्रवेश करके अपनी स्त्रियों के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था।

श्लोक 3 (uttara.32.3)

तासां मध्यगतो राजा रराज च तदार्जुनः । करेणूनां सहस्रस्य मध्यस्थ इव कुञ्जरः ॥ 32.3 ॥

tāsāṃ madhyagato rājā rarāja ca tadārjunaḥ | kareṇūnāṃ sahasrasya madhyastha iva kuñjaraḥ || 32.3 ||

उनके मध्य बैठा हुआ राजा अर्जुन उस समय ऐसे शोभित हो रहा था, जैसे सहस्र हथिनियों के बीच खड़ा कोई गजराज।

श्लोक 4 (uttara.32.4)

जिज्ञासुः स तु बाहूनां सहस्रस्योत्तमं बलम् । रुरोध नर्मदावेगं बाहुभिर्बहुभिर्वृतः ॥ 32.4 ॥

jijñāsuḥ sa tu bāhūnāṃ sahasrasyottamaṃ balam | rurodha narmadāvegaṃ bāhubhirbahubhirvṛtaḥ || 32.4 ||

अपनी सहस्र भुजाओं के उत्तम बल को परखने की इच्छा से, अनेक भुजाओं से घिरा हुआ उसने नर्मदा के वेग को रोक दिया।

श्लोक 5 (uttara.32.5)

कार्तवीर्यभुजासक्तं तज्जलं प्राप्य निर्मलम् । कूलोपहारं कुर्वाणं प्रतिस्रोतः प्रधावति ॥ 32.5 ॥

kārtavīryabhujāsaktaṃ tajjalaṃ prāpya nirmalam | kūlopahāraṃ kurvāṇaṃ pratisrotaḥ pradhāvati || 32.5 ||

कार्तवीर्य की भुजाओं से अवरुद्ध वह निर्मल जल तटों को लाँघकर उलटी धारा में बहने लगा।

श्लोक 6 (uttara.32.6)

समीननक्रमकरः सपुष्पकुशसंस्तरः । स नर्मदाम्भसो वेगः प्रावृट्काल इवाबभौ ॥ 32.6 ॥

samīnanakramakaraḥ sapuṣpakuśasaṃstaraḥ | sa narmadāmbhaso vegaḥ prāvṛṭkāla ivābabhau || 32.6 ||

मछलियों और मगरमच्छों सहित, बिखरे हुए पुष्पों और कुशों से युक्त नर्मदा के जल का वह प्रतिस्रोत वेग वर्षाकाल की बाढ़ के समान दिखाई देने लगा।

श्लोक 7 (uttara.32.7)

स वेगः कार्तवीर्येण सम्प्रेषित इवाम्भसः । पुष्पोपहारं सकलं रावणस्य जहार ह ॥ 32.7 ॥

sa vegaḥ kārtavīryeṇa sampreṣita ivāmbhasaḥ | puṣpopahāraṃ sakalaṃ rāvaṇasya jahāra ha || 32.7 ||

मानो कार्तवीर्य ने ही भेजा हो, ऐसा वह जलवेग रावण के सम्पूर्ण पुष्पोपहार को बहा ले गया।

श्लोक 8 (uttara.32.8)

रावणो ऽर्धसमाप्तं तमुत्सृज्य नियमं तदा । नर्मदां पश्यते कान्तां प्रतिकूलां यथा प्रियाम् ॥ 32.8 ॥

rāvaṇo 'rdhasamāptaṃ tamutsṛjya niyamaṃ tadā | narmadāṃ paśyate kāntāṃ pratikūlāṃ yathā priyām || 32.8 ||

रावण ने अपना अधूरा व्रत छोड़कर उस प्रिय नर्मदा को ऐसे देखा, मानो कोई प्रियतमा अकस्मात् प्रतिकूल हो गई हो।

श्लोक 9 (uttara.32.9)

पश्चिमेन तु तं दृष्ट्वा सागरोद्गारसन्निभम् । वर्धन्तमम्भसो वेगं पूर्वामाशां प्रविश्य तु ॥ 32.9 ॥

paścimena tu taṃ dṛṣṭvā sāgarodgārasannibham | vardhantamambhaso vegaṃ pūrvāmāśāṃ praviśya tu || 32.9 ||

पश्चिम दिशा से समुद्र के उद्गार के समान बढ़ते हुए उस जलवेग को पूर्व दिशा की ओर बढ़ता देखकर,

श्लोक 10 (uttara.32.10)

ततो ऽनुभ्रान्तशकुनां स्वभावोपरमे स्थिताम् । निर्विकाराङ्गनाभासामपश्यद्रावणो नदीम् ॥ 32.10 ॥

tato 'nubhrāntaśakunāṃ svabhāvoparame sthitām | nirvikārāṅganābhāsāmapaśyadrāvaṇo nadīm || 32.10 ||

रावण ने नर्मदा को देखा — उसके पक्षी भ्रमित होकर उड़ रहे थे, उसकी स्वाभाविक गति रुक गई थी, और वह किसी क्षुब्ध स्त्री के समान स्थिर खड़ी थी।

श्लोक 11 (uttara.32.11)

सव्येतरकराङ्गुल्या सशब्दं च दशाननः । वेगप्रभावमन्वेष्टुं सो ऽदिशच्छुकसारणौ ॥ 32.11 ॥

savyetarakarāṅgulyā saśabdaṃ ca daśānanaḥ | vegaprabhāvamanveṣṭuṃ so 'diśacchukasāraṇau || 32.11 ||

दशानन ने अपने दाहिने हाथ की उँगलियाँ चटकाते हुए शुक और सारण को उस वेग का कारण जानने के लिए भेजा।

श्लोक 12 (uttara.32.12)

तौ तु रावणसन्दिष्टौ भ्रातरौ शुकसारणौ । व्योमान्तरगतौ वीरौ प्रस्थितौ पश्चिमामुखौ ॥ 32.12 ॥

tau tu rāvaṇasandiṣṭau bhrātarau śukasāraṇau | vyomāntaragatau vīrau prasthitau paścimāmukhau || 32.12 ||

रावण की इस आज्ञा से वे दोनों वीर भ्राता शुक और सारण आकाश-मार्ग से पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े।

श्लोक 13 (uttara.32.13)

अर्धयोजनमात्रं तु गत्वा तौ रजनीचरौ । पश्येतां पुरुषं तोये क्रीडन्तं सहयोषितम् ॥ 32.13 ॥

ardhayojanamātraṃ tu gatvā tau rajanīcarau | paśyetāṃ puruṣaṃ toye krīḍantaṃ sahayoṣitam || 32.13 ||

आधा योजन मात्र जाकर उन दोनों निशाचरों ने जल में स्त्रियों सहित क्रीड़ा करते हुए एक पुरुष को देखा।

श्लोक 14 (uttara.32.14)

बृहत्सालप्रतीकाशं तोयव्याकुलमूर्धजम् । मदरक्तान्तनयनं मदव्याकुलतेजसम् ॥ 32.14 ॥

bṛhatsālapratīkāśaṃ toyavyākulamūrdhajam | madaraktāntanayanaṃ madavyākulatejasam || 32.14 ||

वह विशाल शाल वृक्ष के समान था, उसके केश जल से बिखरे हुए थे, मद से उसके नेत्रों के कोने लाल थे, और मद से ही उसका तेज कुछ अस्थिर हो रहा था।

श्लोक 15 (uttara.32.15)

नदीं बाहुसहस्रेण रुन्धन्तमरिमर्दनम् । गिरिं पादसहस्रेण रुन्धन्तमिव मेदिनीम् ॥ 32.15 ॥

nadīṃ bāhusahasreṇa rundhantamarimardanam | giriṃ pādasahasreṇa rundhantamiva medinīm || 32.15 ||

वह शत्रुओं का मर्दन करने वाला अपनी सहस्र भुजाओं से नदी को वैसे ही रोके हुए था, जैसे कोई पर्वत सहस्र पैरों से पृथ्वी को रोक ले।

श्लोक 16 (uttara.32.16)

बालानां वरनारीणां सहस्रेण समावृतम् । समदानां करेणूनां सहस्रेणेव कुञ्जरम् ॥ 32.16 ॥

bālānāṃ varanārīṇāṃ sahasreṇa samāvṛtam | samadānāṃ kareṇūnāṃ sahasreṇeva kuñjaram || 32.16 ||

वह सहस्र सुन्दर युवा स्त्रियों से घिरा हुआ था, जैसे कोई मत्त गजराज सहस्र हथिनियों से घिरा हो।

श्लोक 17 (uttara.32.17)

तमद्भुततमं दृष्ट्वा राक्षसौ शुकसारणौ । सन्निवृत्तावुपागम्य रावणं तमथोचतुः ॥ 32.17 ॥

tamadbhutatamaṃ dṛṣṭvā rākṣasau śukasāraṇau | sannivṛttāvupāgamya rāvaṇaṃ tamathocatuḥ || 32.17 ||

उस अत्यन्त अद्भुत दृश्य को देखकर वे दोनों राक्षस शुक और सारण लौट आए और रावण के पास जाकर बोले —

श्लोक 18 (uttara.32.18)

बृहत्सालप्रतीकाशः को ऽप्यसौ राक्षसेश्वर । नर्मदां रोधवद्रुद्ध्वा क्रीडापयति योषितः ॥ 32.18 ॥

bṛhatsālapratīkāśaḥ ko 'pyasau rākṣaseśvara | narmadāṃ rodhavadruddhvā krīḍāpayati yoṣitaḥ || 32.18 ||

"हे राक्षसेश्वर, विशाल शाल वृक्ष के समान कोई महापुरुष नर्मदा को बाँध की भाँति रोककर स्त्रियों को क्रीड़ा करा रहा है।

श्लोक 19 (uttara.32.19)

तेन बाहुसहस्रेण सन्निरुद्धजला नदी । सागरोद्गारसङ्काशानुद्गारान्सृजते मुहुः ॥ 32.19 ॥

tena bāhusahasreṇa sanniruddhajalā nadī | sāgarodgārasaṅkāśānudgārānsṛjate muhuḥ || 32.19 ||

"उसकी सहस्र भुजाओं से रुका हुआ नदी का जल बार-बार समुद्र के उद्गार जैसी लहरें उठा रहा है।"

श्लोक 20 (uttara.32.20)

इत्येवं भाषमाणौ तौ निशाम्य शुकसारणौ । रावणो ऽर्जुन इत्युक्त्वा प्रययौ युद्धलालसः ॥ 32.20 ॥

ityevaṃ bhāṣamāṇau tau niśāmya śukasāraṇau | rāvaṇo 'rjuna ityuktvā prayayau yuddhalālasaḥ || 32.20 ||

शुक और सारण की यह बात सुनकर रावण ने कहा — "यह तो अर्जुन है" — और युद्ध की लालसा में चल पड़ा।

श्लोक 21 (uttara.32.21)

अर्जुनाभिमुखे तस्मिन्रावणे राक्षसाधिपे । चण्डः प्रवाति पवनः सनादः सुरजास्तथा ॥ 32.21 ॥

arjunābhimukhe tasminrāvaṇe rākṣasādhipe | caṇḍaḥ pravāti pavanaḥ sanādaḥ surajāstathā || 32.21 ||

जब राक्षसराज रावण अर्जुन के सम्मुख जा रहा था, तभी प्रचण्ड वायु गर्जन के साथ बहने लगी और धूल के बवण्डर उठने लगे।

श्लोक 22 (uttara.32.22)

सकृदेव कृतो रावः सरक्तः प्रेषितो घनैः । महोदरमहापार्श्वधूम्राक्षशुकसारणैः ॥ 32.22 ॥

sakṛdeva kṛto rāvaḥ saraktaḥ preṣito ghanaiḥ | mahodaramahāpārśvadhūmrākṣaśukasāraṇaiḥ || 32.22 ||

महोदर, महापार्श्व, धूम्राक्ष, शुक और सारण द्वारा एक साथ क्रोधपूर्ण गर्जना की गई।

श्लोक 23 (uttara.32.23)

संवृतो राक्षसेन्द्रस्तु तत्रागाद्यत्र चार्जुनः । अदीर्घेणैव कालेन स तदा राक्षसो बली । तं नर्मदाह्रदं भीममाजगामाञ्जनप्रभः ॥ 32.23 ॥

saṃvṛto rākṣasendrastu tatrāgādyatra cārjunaḥ | adīrgheṇaiva kālena sa tadā rākṣaso balī | taṃ narmadāhradaṃ bhīmamājagāmāñjanaprabhaḥ || 32.23 ||

उनसे घिरा हुआ राक्षसराज वहाँ पहुँचा जहाँ अर्जुन था; अत्यल्प समय में ही अंजन के समान श्यामवर्ण वह महाबली राक्षस उस भयंकर नर्मदा-ह्रद तक जा पहुँचा।

श्लोक 24 (uttara.32.24)

स तत्र स्त्रीपरिवृतं वाशिताभिरिव द्विपम् । नरेन्द्रं पश्यते राजा राक्षसानां तदार्जुनम् ॥ 32.24 ॥

sa tatra strīparivṛtaṃ vāśitābhiriva dvipam | narendraṃ paśyate rājā rākṣasānāṃ tadārjunam || 32.24 ||

वहाँ राक्षसराज ने राजा अर्जुन को स्त्रियों से घिरा देखा, जैसे कोई गजराज मदमत्त हथिनियों से घिरा हो।

श्लोक 25 (uttara.32.25)

स रोषाद्रक्तनयनो राक्षसेन्द्रो बलोद्धतः ॥ 32.25 ॥

sa roṣādraktanayano rākṣasendro baloddhataḥ || 32.25 ||

क्रोध से रक्त-नेत्र और बल से उन्मत्त उस राक्षसराज ने अर्जुन के मन्त्री से गम्भीर वाणी में कहा —

श्लोक 26 (uttara.32.26)

इत्येवमर्जुनामात्यनाह गम्भीरया गिरा । अमात्याः क्षिप्रमाख्यात हैहयस्य नृपस्य वै ॥ 32.26 ॥

ityevamarjunāmātyanāha gambhīrayā girā | amātyāḥ kṣipramākhyāta haihayasya nṛpasya vai || 32.26 ||

"हे मन्त्रियो, हैहयराज को शीघ्र जाकर सूचित करो कि रावण नामक राक्षस युद्ध की इच्छा से यहाँ आ पहुँचा है।"

श्लोक 27 (uttara.32.27)

युद्धार्थी समनुप्राप्तो रावणो नाम राक्षसः । रावणस्य वचः श्रुत्वा मन्त्रिणो ऽथार्जुनस्य ते । उत्तस्थुः सायुधास्त्राश्च रावणं वाक्यमब्रुवन् ॥ 32.27 ॥

yuddhārthī samanuprāpto rāvaṇo nāma rākṣasaḥ | rāvaṇasya vacaḥ śrutvā mantriṇo 'thārjunasya te | uttasthuḥ sāyudhāstrāśca rāvaṇaṃ vākyamabruvan || 32.27 ||

रावण के इन वचनों को सुनकर अर्जुन के वे मन्त्री तुरन्त शस्त्रास्त्र लेकर उठ खड़े हुए और रावण से यह बोले —

श्लोक 28 (uttara.32.28)

युद्धस्य कालो विज्ञेयः साधु भोः साधु रावण । यः क्षीबं स्त्रीवृतं चैव योद्धुमुत्सहते नृपम् ॥ 32.28 ॥

yuddhasya kālo vijñeyaḥ sādhu bhoḥ sādhu rāvaṇa | yaḥ kṣībaṃ strīvṛtaṃ caiva yoddhumutsahate nṛpam || 32.28 ||

"युद्ध का उचित समय जानना चाहिए, साधु रावण, साधु — तुम जो मत्त और स्त्रियों से घिरे हुए राजा से युद्ध करना चाहते हो —

श्लोक 29 (uttara.32.29)

स्त्रीसमक्षं कथं यत्तद्योद्धुमुत्सहसे ऽर्जुनम् । वाशितामध्यगं मत्तं शार्दूल इव कुञ्जरम् ॥ 32.29 ॥

strīsamakṣaṃ kathaṃ yattadyoddhumutsahase 'rjunam | vāśitāmadhyagaṃ mattaṃ śārdūla iva kuñjaram || 32.29 ||

— स्त्रियों के समक्ष, मत्त और अपनी रानियों के बीच खड़े अर्जुन से युद्ध करने का साहस तुम कैसे कर रहे हो, जैसे कोई व्याघ्र किसी गजराज पर आक्रमण करने का साहस करे?"

श्लोक 30 (uttara.32.30)

क्षमस्वाद्य दशग्रीव चोष्यतां रजनी त्वया । युद्धे श्रद्धा च यद्यस्ति श्वस्तात समरे ऽर्जुनम् ॥ 32.30 ॥

kṣamasvādya daśagrīva coṣyatāṃ rajanī tvayā | yuddhe śraddhā ca yadyasti śvastāta samare 'rjunam || 32.30 ||

"हे दशग्रीव, आज क्षमा करो और यह रात्रि यहीं व्यतीत करो; यदि युद्ध की सच्ची श्रद्धा है, तो कल अर्जुन से युद्ध करना।

श्लोक 31 (uttara.32.31)

यद्यद्यास्ति मतिर्योद्धुं युद्धतृष्णासमावृता । निहत्यास्मांस्ततो युद्धमर्जुनेनोपयास्यसि ॥ 32.31 ॥

yadyadyāsti matiryoddhuṃ yuddhatṛṣṇāsamāvṛtā | nihatyāsmāṃstato yuddhamarjunenopayāsyasi || 32.31 ||

और यदि युद्ध-तृष्णा से भरा तुम्हारा मन अब भी युद्ध करने पर ही आतुर है, तो पहले हमें मारकर ही तुम अर्जुन के साथ युद्ध करने आ सकोगे।"

श्लोक 32 (uttara.32.32)

ततस्ते रावणामात्यैरमात्याः पार्थिवस्य तु । सूदिताश्चापि ते युद्धे भक्षिताश्च बुभुक्षितैः ॥ 32.32 ॥

tataste rāvaṇāmātyairamātyāḥ pārthivasya tu | sūditāścāpi te yuddhe bhakṣitāśca bubhukṣitaiḥ || 32.32 ||

तत्पश्चात् राजा अर्जुन के वे मन्त्री रावण के मन्त्रियों द्वारा युद्ध में मार डाले गए, और भूखे राक्षसों ने उन्हें खा भी लिया।

श्लोक 33 (uttara.32.33)

ततो हलहलाशब्दो नर्मदातीर आबभौ । अर्जुनस्यानुयात्राणां रावणस्य च मन्त्रिणाम् ॥ 32.33 ॥

tato halahalāśabdo narmadātīra ābabhau | arjunasyānuyātrāṇāṃ rāvaṇasya ca mantriṇām || 32.33 ||

तब नर्मदा के तट पर अर्जुन के अनुयायियों और रावण के मन्त्रियों का महान् कोलाहल गूँज उठा।

श्लोक 34 (uttara.32.34)

इषुभिस्तोमरैः शूलैस्त्रिशूलैर्वज्रकर्षणैः । सरावणानर्दयन्तः समन्तात्समभिद्रुताः ॥ 32.34 ॥

iṣubhistomaraiḥ śūlaistriśūlairvajrakarṣaṇaiḥ | sarāvaṇānardayantaḥ samantātsamabhidrutāḥ || 32.34 ||

बाणों, तोमरों, शूलों, त्रिशूलों तथा वज्र-सम गदाओं से रावण-पक्ष के साथ गरजते हुए वे चारों ओर से एक-दूसरे पर टूट पड़े।

श्लोक 35 (uttara.32.35)

हैहयाधिपयोधानां वेग आसीत्सुदारुणः । सनक्रमीनमकरसमुद्रस्येव निःस्वनः ॥ 32.35 ॥

haihayādhipayodhānāṃ vega āsītsudāruṇaḥ | sanakramīnamakarasamudrasyeva niḥsvanaḥ || 32.35 ||

हैहयराज के योद्धाओं का वेग अत्यन्त भयंकर था, जैसे मगरमच्छों, मछलियों और जलजन्तुओं से भरे समुद्र की गर्जना।

श्लोक 36 (uttara.32.36)

रावणस्य तु ते ऽमात्याः प्रहस्तशुकसारणाः । कार्तवीर्यबलं क्रुद्धा निर्दहन्ति स्म तेजसा ॥ 32.36 ॥

rāvaṇasya tu te 'mātyāḥ prahastaśukasāraṇāḥ | kārtavīryabalaṃ kruddhā nirdahanti sma tejasā || 32.36 ||

रावण के मन्त्री प्रहस्त, शुक और सारण, क्रुद्ध होकर अपने तेज से कार्तवीर्य की सेना को दग्ध करने लगे।

श्लोक 37 (uttara.32.37)

अर्जुनाय तु तत्कर्म रावणस्य समन्त्रिणः । क्रीडमानाय कथितं पुरुषैर्द्वाररक्षिभिः ॥ 32.37 ॥

arjunāya tu tatkarma rāvaṇasya samantriṇaḥ | krīḍamānāya kathitaṃ puruṣairdvārarakṣibhiḥ || 32.37 ||

क्रीडा में लीन अर्जुन को द्वारपालों ने आकर रावण और उसके मन्त्रियों के इस कृत्य की सूचना दी।

श्लोक 38 (uttara.32.38)

श्रुत्वा न भेतव्यमिति स्त्रीजनं तं ततो ऽर्जुनः । उत्ततार जलात्तस्माद्गङ्गातोयादिवाञ्जनः ॥ 32.38 ॥

śrutvā na bhetavyamiti strījanaṃ taṃ tato 'rjunaḥ | uttatāra jalāttasmādgaṅgātoyādivāñjanaḥ || 32.38 ||

यह सुनकर अर्जुन ने स्त्रियों से "डरो मत" कहकर उस जल से वैसे ही बाहर निकला, जैसे गजराज अंजन गंगा के जल से बाहर निकलता हो।

श्लोक 39 (uttara.32.39)

क्रोधदूषितनेत्रस्तु स ततो ऽर्जुनपावकः । प्रजज्वाल महाघोरो युगान्त इव पावकः ॥ 32.39 ॥

krodhadūṣitanetrastu sa tato 'rjunapāvakaḥ | prajajvāla mahāghoro yugānta iva pāvakaḥ || 32.39 ||

तब क्रोध से लाल नेत्रों वाला वह अर्जुन-रूपी अग्नि प्रलयकाल की अग्नि के समान भयंकर रूप से प्रज्वलित हो उठा।

श्लोक 40 (uttara.32.40)

स तूर्णतरमादाय वरहेमाङ्गदो गदाम् । अभिदुद्राव रक्षांसि तमांसीव दिवाकरः ॥ 32.40 ॥

sa tūrṇataramādāya varahemāṅgado gadām | abhidudrāva rakṣāṃsi tamāṃsīva divākaraḥ || 32.40 ||

सुन्दर स्वर्ण-अंगदों से सुशोभित वह तुरन्त गदा उठाकर राक्षसों पर वैसे ही टूट पड़ा, जैसे सूर्य अन्धकार पर टूट पड़ता है।

श्लोक 41 (uttara.32.41)

बाहुविक्षेपकरणां समुद्यम्य महागदाम् । गारुडं वेगमास्थाय चापपातैव सो ऽर्जुनः ॥ 32.41 ॥

bāhuvikṣepakaraṇāṃ samudyamya mahāgadām | gāruḍaṃ vegamāsthāya cāpapātaiva so 'rjunaḥ || 32.41 ||

भुजाओं से घुमाने योग्य विशाल गदा उठाकर, गरुड़ के समान वेग धारण करके, अर्जुन उन पर झपटा।

श्लोक 42 (uttara.32.42)

तस्य मार्गं समारुद्ध्य विन्ध्यो ऽर्कस्येव पर्वतः । स्थितो विन्ध्य इवाकम्प्यः प्रहस्तो मुसलायुधः ॥ 32.42 ॥

tasya mārgaṃ samāruddhya vindhyo 'rkasyeva parvataḥ | sthito vindhya ivākampyaḥ prahasto musalāyudhaḥ || 32.42 ||

उसका मार्ग रोकते हुए, जैसे विन्ध्य पर्वत सूर्य का मार्ग रोकता है, मूसल धारण किए प्रहस्त विन्ध्य के समान अटल खड़ा हो गया।

श्लोक 43 (uttara.32.43)

ततो ऽस्य मुसलं घोरं लोहबद्धं महोद्धतः । प्रहस्तः प्रेषयन्क्रुद्धो ररास च यथाम्बुदः ॥ 32.43 ॥

tato 'sya musalaṃ ghoraṃ lohabaddhaṃ mahoddhataḥ | prahastaḥ preṣayankruddho rarāsa ca yathāmbudaḥ || 32.43 ||

तब क्रुद्ध और अत्यन्त उद्धत प्रहस्त ने लोहे से जड़ा हुआ वह भयंकर मूसल उस पर फेंका, और मेघ के समान गरज उठा।

श्लोक 44 (uttara.32.44)

तस्याग्रे मुसलस्याग्निरशोकापीडसन्निभः । प्रहस्तकरमुक्तस्य बभूव प्रदहन्निव ॥ 32.44 ॥

tasyāgre musalasyāgniraśokāpīḍasannibhaḥ | prahastakaramuktasya babhūva pradahanniva || 32.44 ||

प्रहस्त के हाथ से छूटे उस मूसल के अग्रभाग पर अशोक-पुष्प के मुकुट के समान अग्नि प्रकट हुई, मानो सब कुछ भस्म कर देगी।

श्लोक 45 (uttara.32.45)

अथायान्तं तु मुसलं कार्तवीर्यस्तदार्जुनः । निपुणं वञ्चयामास सगदो ऽगदविक्रमः ॥ 32.45 ॥

athāyāntaṃ tu musalaṃ kārtavīryastadārjunaḥ | nipuṇaṃ vañcayāmāsa sagado 'gadavikramaḥ || 32.45 ||

तब गदाधारी, अपराजित पराक्रम वाला कार्तवीर्य अर्जुन आते हुए उस मूसल को कुशलतापूर्वक बचा गया।

श्लोक 46 (uttara.32.46)

ततस्तमभिदुद्राव प्रहस्तं हैहयाधिपः । भ्रामयानो गदां गुर्वीं पञ्चबाहुशतोच्छ्रयाम् ॥ 32.46 ॥

tatastamabhidudrāva prahastaṃ haihayādhipaḥ | bhrāmayāno gadāṃ gurvīṃ pañcabāhuśatocchrayām || 32.46 ||

फिर हैहयराज ने पाँच सौ भुजाओं जितनी ऊँची भारी गदा घुमाते हुए प्रहस्त पर आक्रमण किया।

श्लोक 47 (uttara.32.47)

तथा हतो ऽतिवेगेन प्रहस्तो गदया तदा । निपपात स्थितः शैलो वज्रिवज्रहतो यथा ॥ 32.47 ॥

tathā hato 'tivegena prahasto gadayā tadā | nipapāta sthitaḥ śailo vajrivajrahato yathā || 32.47 ||

उस अत्यन्त वेगवती गदा से आहत होकर प्रहस्त वहीं गिर पड़ा, जैसे वज्र से आहत कोई खड़ा पर्वत गिर पड़े।

श्लोक 48 (uttara.32.48)

प्रहस्तं पतितं दृष्ट्वा मारीचशुकसारणाः । समहोदरधूम्राक्षा ह्यपसृष्टा रणाजिरात् ॥ 32.48 ॥

prahastaṃ patitaṃ dṛṣṭvā mārīcaśukasāraṇāḥ | samahodaradhūmrākṣā hyapasṛṣṭā raṇājirāt || 32.48 ||

प्रहस्त को गिरा हुआ देखकर मारीच, शुक, सारण, महोदर और धूम्राक्ष रणभूमि से हट गए।

श्लोक 49 (uttara.32.49)

अपक्रान्तेष्वमात्येषु प्रहस्ते वै निपातिते । रावणो ऽभ्यद्रवत्तूर्णमर्जुनं नृपसत्तमम् ॥ 32.49 ॥

apakrānteṣvamātyeṣu prahaste vai nipātite | rāvaṇo 'bhyadravattūrṇamarjunaṃ nṛpasattamam || 32.49 ||

मन्त्रियों के पलायन कर जाने और प्रहस्त के गिर जाने पर, रावण स्वयं शीघ्रता से राजश्रेष्ठ अर्जुन पर टूट पड़ा।

श्लोक 50 (uttara.32.50)

सहस्रबाहोस्तद्युद्धं विंशद्बाहोश्च दारुणम् । नृपराक्षसयोस्तत्र चारब्धं रोमहर्षणम् ॥ 32.50 ॥

sahasrabāhostadyuddhaṃ viṃśadbāhośca dāruṇam | nṛparākṣasayostatra cārabdhaṃ romaharṣaṇam || 32.50 ||

तब सहस्रबाहु राजा और बीस-भुजाधारी राक्षस के बीच वह रोमांचकारी, भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ।

श्लोक 51 (uttara.32.51)

सागराविव संरब्धौ चलन्मूलाविवाचलौ । तेजोयुक्ताविवादित्यौ प्रदहन्ताविवानलौ ॥ 32.51 ॥

sāgarāviva saṃrabdhau calanmūlāvivācalau | tejoyuktāvivādityau pradahantāvivānalau || 32.51 ||

क्रोध से भरे वे दोनों मानो दो समुद्र हों, मानो जड़ों से हिलते दो पर्वत हों, मानो तेज से युक्त दो सूर्य हों, मानो जलती हुई दो अग्नियाँ हों।

श्लोक 52 (uttara.32.52)

बलोद्धतौ यथा नागौ वाशितार्थे यथा वृषौ । मेघाविव विनर्दन्तौ सिंहाविव बलोत्कटौ ॥ 32.52 ॥

baloddhatau yathā nāgau vāśitārthe yathā vṛṣau | meghāviva vinardantau siṃhāviva balotkaṭau || 32.52 ||

वे बल से उन्मत्त दो गजराजों के समान, गाय के लिए लड़ते दो साँडों के समान, दो मेघों के समान गरजते, और बल में उत्कट दो सिंहों के समान थे।

श्लोक 53 (uttara.32.53)

रुद्रकालाविव क्रुद्धौ तदा तौ राक्षसार्जुनौ । परस्परं गदाभ्यां तौ ताडयामासतुर्भृशम् ॥ 32.53 ॥

rudrakālāviva kruddhau tadā tau rākṣasārjunau | parasparaṃ gadābhyāṃ tau tāḍayāmāsaturbhṛśam || 32.53 ||

उस समय रुद्र और काल के समान क्रुद्ध वे राक्षस और अर्जुन एक-दूसरे को अपनी गदाओं से अत्यन्त प्रहार करने लगे।

श्लोक 54 (uttara.32.54)

वज्रप्रहारानचला यथा घोरान्विषेहिरे । गदाप्रहारांस्तौ तत्र सेहाते नरराक्षसौ ॥ 32.54 ॥

vajraprahārānacalā yathā ghorānviṣehire | gadāprahārāṃstau tatra sehāte nararākṣasau || 32.54 ||

जैसे पर्वत वज्र के भयंकर प्रहारों को सहन करते हैं, वैसे ही वे मनुष्य और राक्षस वहाँ एक-दूसरे के गदा-प्रहारों को सहन करते रहे।

श्लोक 55 (uttara.32.55)

यथाशनिरवेभ्यस्तु जायते वै प्रतिश्रुतिः । तथा तयोर्गदापोथैर्दिशः सर्वाः प्रतिश्रुताः ॥ 32.55 ॥

yathāśaniravebhyastu jāyate vai pratiśrutiḥ | tathā tayorgadāpothairdiśaḥ sarvāḥ pratiśrutāḥ || 32.55 ||

जैसे मेघों की गर्जना से प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है, वैसे ही उनकी गदाओं की टक्कर से सभी दिशाएँ गूँज उठीं।

श्लोक 56 (uttara.32.56)

अर्जुनस्य गदा सा तु पात्यमानाहितोरसि । काञ्चनाभं नभश्चक्रे विद्युत्सौदामिनी यथा ॥ 32.56 ॥

arjunasya gadā sā tu pātyamānāhitorasi | kāñcanābhaṃ nabhaścakre vidyutsaudāminī yathā || 32.56 ||

अर्जुन की गदा जब शत्रु की छाती पर गिरती थी, तो वह आकाश को बिजली की तड़प के समान स्वर्णाभ बना देती थी।

श्लोक 57 (uttara.32.57)

तथैव रावणेनापि पात्यमाना मुहुर्मुहुः । अर्जुनोरसि निर्भाति गदोल्केव महागिरौ ॥ 32.57 ॥

tathaiva rāvaṇenāpi pātyamānā muhurmuhuḥ | arjunorasi nirbhāti gadolkeva mahāgirau || 32.57 ||

उसी प्रकार रावण द्वारा बार-बार फेंकी गई गदा भी अर्जुन की छाती पर वैसे ही चमकती थी, जैसे किसी विशाल पर्वत पर गिरती हुई अग्नि-उल्का।

श्लोक 58 (uttara.32.58)

नार्जुनः खेदमायाति न राक्षसगणेश्वरः । इदमासीत्तयोर्युद्धं यथा पूर्वं बलीन्द्रयोः ॥ 32.58 ॥

nārjunaḥ khedamāyāti na rākṣasagaṇeśvaraḥ | idamāsīttayoryuddhaṃ yathā pūrvaṃ balīndrayoḥ || 32.58 ||

न अर्जुन थका, न राक्षसगणों का स्वामी; उन दोनों का वह युद्ध पूर्वकाल में बलि और इन्द्र के युद्ध के समान था।

श्लोक 59 (uttara.32.59)

शृङ्गैरिव वृषायुध्यन्दन्ताग्रैरिव कुञ्जरौ । परस्परं तौ निघ्नन्तौ नरराक्षससत्तमौ ॥ 32.59 ॥

śṛṅgairiva vṛṣāyudhyandantāgrairiva kuñjarau | parasparaṃ tau nighnantau nararākṣasasattamau || 32.59 ||

वे नरश्रेष्ठ और राक्षसश्रेष्ठ एक-दूसरे पर वैसे प्रहार करते रहे, जैसे साँड सींगों से और गजराज दाँतों के अग्रभाग से लड़ते हैं।

श्लोक 60 (uttara.32.60)

ततो ऽर्जुनेन क्रुद्धेन सर्वप्राणेन सा गदा । स्तनयोरन्तरे मुक्ता रावणस्य महोरसि ॥ 32.60 ॥

tato 'rjunena kruddhena sarvaprāṇena sā gadā | stanayorantare muktā rāvaṇasya mahorasi || 32.60 ||

तब क्रुद्ध अर्जुन ने अपने सम्पूर्ण बल से वह गदा रावण की विशाल छाती के दोनों स्तनों के मध्य फेंकी।

श्लोक 61 (uttara.32.61)

वरदानकृतत्राणे सा गदा रावणोरसि । दुर्बलेव यथावेगं द्विधाभूत्वा ऽपतत्क्षितौ ॥ 32.61 ॥

varadānakṛtatrāṇe sā gadā rāvaṇorasi | durbaleva yathāvegaṃ dvidhābhūtvā 'patatkṣitau || 32.61 ||

वरदान से सुरक्षित रावण की छाती पर लगकर वह गदा, मानो निर्बल होकर, वेगपूर्वक दो टुकड़ों में टूटकर पृथ्वी पर गिर पड़ी।

श्लोक 62 (uttara.32.62)

स त्वर्जुनप्रमुक्तेन गदापातेन रावणः । अपासर्पद्धनुर्मात्रं निषसाद च निष्टनन् ॥ 32.62 ॥

sa tvarjunapramuktena gadāpātena rāvaṇaḥ | apāsarpaddhanurmātraṃ niṣasāda ca niṣṭanan || 32.62 ||

अर्जुन द्वारा फेंकी गई उस गदा के आघात से रावण डगमगाकर एक धनुष जितना पीछे हट गया, बैठ गया और कराहने लगा।

श्लोक 63 (uttara.32.63)

स विह्वलं तदालक्ष्य दशग्रीवं ततो ऽर्जुनः । सहसोत्पत्य जग्राह गरुत्मानिव पन्नगम् ॥ 32.63 ॥

sa vihvalaṃ tadālakṣya daśagrīvaṃ tato 'rjunaḥ | sahasotpatya jagrāha garutmāniva pannagam || 32.63 ||

उस विह्वल दशग्रीव को देखकर अर्जुन ने तुरन्त छलाँग लगाकर उसे ऐसे पकड़ लिया, जैसे गरुड़ किसी सर्प को पकड़ लेता है।

श्लोक 64 (uttara.32.64)

स तु बाहुसहस्रेण बलाद्गृह्य दशाननम् । बबन्ध बलवान्राजा बलिं नारायणो यथा ॥ 32.64 ॥

sa tu bāhusahasreṇa balādgṛhya daśānanam | babandha balavānrājā baliṃ nārāyaṇo yathā || 32.64 ||

उस बलवान राजा ने अपनी सहस्र भुजाओं से बलपूर्वक दशानन को पकड़कर बाँध लिया, जैसे नारायण ने बलि को बाँधा था।

श्लोक 65 (uttara.32.65)

बध्यमाने दशग्रीवे सिद्धचारणदेवताः । साध्वीतिवादिनः पुष्पैः किरन्त्यर्जुनमूर्धनि ॥ 32.65 ॥

badhyamāne daśagrīve siddhacāraṇadevatāḥ | sādhvītivādinaḥ puṣpaiḥ kirantyarjunamūrdhani || 32.65 ||

दशग्रीव के बँधते ही सिद्ध, चारण और देवता "साधु, साधु" कहते हुए अर्जुन के सिर पर पुष्पों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 66 (uttara.32.66)

व्याघ्रो मृगमिवादाय मृगराडिव दन्तिनम् । ननाद हैहयो राजा हर्षादम्बुदवन्मुहुः ॥ 32.66 ॥

vyāghro mṛgamivādāya mṛgarāḍiva dantinam | nanāda haihayo rājā harṣādambudavanmuhuḥ || 32.66 ||

जैसे व्याघ्र हिरण को पकड़ ले, या सिंह गजराज को, वैसे ही हैहयराज हर्ष से बार-बार मेघ के समान गरज उठा।

श्लोक 67 (uttara.32.67)

प्रहस्तस्तु समाश्वस्तो दृष्ट्वा बद्धं दशाननम् । सह तै राक्षसैः क्रुद्धश्चाभिदुद्राव पार्थिवम् ॥ 32.67 ॥

prahastastu samāśvasto dṛṣṭvā baddhaṃ daśānanam | saha tai rākṣasaiḥ kruddhaścābhidudrāva pārthivam || 32.67 ||

रावण को बँधा हुआ देखकर होश में आया प्रहस्त उन राक्षसों सहित क्रुद्ध होकर राजा अर्जुन पर टूट पड़ा।

श्लोक 68 (uttara.32.68)

नक्तञ्चराणां वेगस्तु तेषामापततां बभौ । उद्भूत आतपापाये पयोदानामिवाम्बुधौ ॥ 32.68 ॥

naktañcarāṇāṃ vegastu teṣāmāpatatāṃ babhau | udbhūta ātapāpāye payodānāmivāmbudhau || 32.68 ||

उन आक्रमणकारी निशाचरों का वेग वैसा दिखाई दिया, जैसे गर्मी के अन्त में समुद्र पर मेघों का समूह उमड़ आया हो।

श्लोक 69 (uttara.32.69)

मुञ्च मुञ्चेति भाषन्तस्तिष्ठतिष्ठेति चासकृत् । मुसलानि सशूलानि सोत्ससर्ज तदार्जुने ॥ 32.69 ॥

muñca muñceti bhāṣantastiṣṭhatiṣṭheti cāsakṛt | musalāni saśūlāni sotsasarja tadārjune || 32.69 ||

"छोड़ो, छोड़ो" और "रुको, रुको" बार-बार पुकारते हुए उन्होंने मूसल और शूल अर्जुन पर बरसा दिए।

श्लोक 70 (uttara.32.70)

अप्राप्तान्येव तान्याशु असम्भ्रान्तस्तदार्जुनः । आयुधान्यमरारीणां जग्राहारिनिषूदनः ॥ 32.70 ॥

aprāptānyeva tānyāśu asambhrāntastadārjunaḥ | āyudhānyamarārīṇāṃ jagrāhāriniṣūdanaḥ || 32.70 ||

उन शत्रुओं के अस्त्र उस तक पहुँचने से पहले ही, निर्भीक अरिमर्दन अर्जुन ने उन्हें तुरन्त पकड़ लिया।

श्लोक 71 (uttara.32.71)

ततस्तैरेव रक्षांसि दुर्धरैः प्रवरायुधैः । भित्त्वा विद्रावयामास वायुरम्बुधरानिव ॥ 32.71 ॥

tatastaireva rakṣāṃsi durdharaiḥ pravarāyudhaiḥ | bhittvā vidrāvayāmāsa vāyurambudharāniva || 32.71 ||

फिर उन्हीं दुर्धर श्रेष्ठ अस्त्रों से उसने राक्षसों को भेदकर तितर-बितर कर दिया, जैसे वायु मेघों को तितर-बितर कर देती है।

श्लोक 72 (uttara.32.72)

राक्षसांस्त्रासयित्वा तु कार्तवीर्यो ऽर्जुनस्तदा । रावणं गृह्य नगरं प्रविवेश सुहृद्वृतः ॥ 32.72 ॥

rākṣasāṃstrāsayitvā tu kārtavīryo 'rjunastadā | rāvaṇaṃ gṛhya nagaraṃ praviveśa suhṛdvṛtaḥ || 32.72 ||

इस प्रकार राक्षसों को भयभीत करके कार्तवीर्य अर्जुन रावण को साथ लेकर अपने मित्रों से घिरा हुआ नगर में प्रविष्ट हुआ।

श्लोक 73 (uttara.32.73)

स कीर्यमाणः कुसुमाक्षतोत्करैर्द्विजैः सपौरैः पुरुहूतसन्निभः । तदा ऽर्जुनः सम्प्रविवेश तां पुरीं बलिं निगृह्येव सहस्रलोचनः ॥ 32.73 ॥

sa kīryamāṇaḥ kusumākṣatotkarairdvijaiḥ sapauraiḥ puruhūtasannibhaḥ | tadā 'rjunaḥ sampraviveśa tāṃ purīṃ baliṃ nigṛhyeva sahasralocanaḥ || 32.73 ||

ब्राह्मणों और नगरवासियों द्वारा बरसाए गए पुष्पों और अक्षतों के ढेरों से आच्छादित, इन्द्र के समान तेजस्वी अर्जुन उस नगरी में वैसे ही प्रविष्ट हुआ, मानो सहस्रनेत्र इन्द्र स्वयं बलि को बाँधकर ले जा रहा हो।

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