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उत्तरकाण्ड · सर्ग 37

अभिषेक के पश्चात् का प्रभात

सर्ग 36सर्ग-सूचीसर्ग 38

श्लोक 1 (uttara.37.1)

अभिषिक्ते तु काकुत्स्थे धर्मेण विदितात्मनि । व्यतीता या निशा पूर्वा पौराणां हर्षवर्धिनी ।। 37.1 ।।

abhiṣikte tu kākutsthe dharmeṇa viditātmani | vyatītā yā niśā pūrvā paurāṇāṃ harṣavardhinī || 37.1 ||

धर्मपरायण एवं आत्मज्ञानी काकुत्स्थ (राम) के अभिषिक्त होने पर, नगरवासियों के हर्ष को बढ़ाने वाली वह पहली रात्रि बीत गई।

श्लोक 2 (uttara.37.2)

तस्यां रजन्यां व्युष्टायां प्रातर्नृपतिबोधकाः । वन्दिनः समुपातिष्ठन्सौम्या नृपतिवेश्मनि ।। 37.2 ।।

tasyāṃ rajanyāṃ vyuṣṭāyāṃ prātarnṛpatibodhakāḥ | vandinaḥ samupātiṣṭhansaumyā nṛpativeśmani || 37.2 ||

उस रात्रि के व्यतीत होने पर, प्रातःकाल राजा को जगाने वाले सौम्य स्वभाव के वन्दीजन राजभवन में उपस्थित हुए।

श्लोक 3 (uttara.37.3)

ते रक्तकण्ठिनः सर्वे किन्नरा इव शिक्षिताः । तुष्टुवुर्नपतिं वीरं यथावत् सम्प्रहर्षिणः ।। 37.3 ।।

te raktakaṇṭhinaḥ sarve kinnarā iva śikṣitāḥ | tuṣṭuvurnapatiṃ vīraṃ yathāvat sampraharṣiṇaḥ || 37.3 ||

वे सभी मधुर-कण्ठ, किन्नरों के समान प्रशिक्षित वन्दीजन हर्षपूर्वक यथोचित रीति से उस वीर नरेश की स्तुति करने लगे।

श्लोक 4 (uttara.37.4)

वीर सौम्य प्रबुध्यस्व कौसल्याप्रीतिवर्धन । जगद्धि सर्वं स्वपिति त्वयि सुप्ते नराधिप ।। 37.4 ।।

vīra saumya prabudhyasva kausalyāprītivardhana | jagaddhi sarvaṃ svapiti tvayi supte narādhipa || 37.4 ||

"हे वीर! हे सौम्य! हे कौसल्या के प्रीतिवर्धक! जागिए। हे नराधिप! आपके सोने पर तो मानो सम्पूर्ण जगत् ही सो जाता है।

श्लोक 5 (uttara.37.5)

विक्रमस्ते यथा विष्णो रूपं चैवाश्विनोरिव । बुद्ध्या बृहस्पतेस्तुल्यः प्रजापतिसमो ह्यसि ।। 37.5 ।।

vikramaste yathā viṣṇo rūpaṃ caivāśvinoriva | buddhyā bṛhaspatestulyaḥ prajāpatisamo hyasi || 37.5 ||

आपका पराक्रम विष्णु के समान है, आपका रूप अश्विनीकुमारों के समान है; बुद्धि में आप बृहस्पति के तुल्य हैं, और आप प्रजापति के समान हैं।

श्लोक 6 (uttara.37.6)

क्षमा ते पृथिवीतुल्या तेजसा भास्करोपमः । वेगस्ते वायुना तुल्यो गाम्भीर्यमुदधेरिव ।। 37.6 ।।

kṣamā te pṛthivītulyā tejasā bhāskaropamaḥ | vegaste vāyunā tulyo gāmbhīryamudadheriva || 37.6 ||

आपकी क्षमा पृथ्वी के समान है, तेज में आप सूर्य के समान हैं; आपका वेग वायु के तुल्य है, और गाम्भीर्य समुद्र के समान है।

श्लोक 7 (uttara.37.7)

अप्रकम्प्यो यता स्थाणुश्चन्द्रे सौम्यत्वमीदृशम् । नेदृशाः पार्थिवाः पूर्वं भवितारो नराधिप ।। 37.7 ।।

aprakampyo yatā sthāṇuścandre saumyatvamīdṛśam | nedṛśāḥ pārthivāḥ pūrvaṃ bhavitāro narādhipa || 37.7 ||

स्थाणु के समान अकम्पनीय, तथा चन्द्रमा जैसी सौम्यता लिए हुए - हे नराधिप! न तो पहले ऐसे राजा हुए हैं, और न आगे होंगे।

श्लोक 8 (uttara.37.8)

यथा त्वमतिदुर्धर्षो धर्मनित्यः प्रजाहितः । न त्वां जहाति कीर्तिश्च लक्ष्मीश्च पुरुषर्षभ ।। 37.8 ।।

yathā tvamatidurdharṣo dharmanityaḥ prajāhitaḥ | na tvāṃ jahāti kīrtiśca lakṣmīśca puruṣarṣabha || 37.8 ||

हे पुरुषर्षभ! जिस प्रकार आप अत्यन्त दुर्धर्ष, सदा धर्मपरायण और प्रजाहितैषी हैं, उसी प्रकार कीर्ति और लक्ष्मी भी आपका साथ कभी नहीं छोड़तीं।

श्लोक 9 (uttara.37.9)

श्रीश्च धर्मश्च काकुत्स्थ त्वयि नित्यं प्रतिष्ठितौ । एताश्चान्याश्च मधुरा वन्दिभिः परिकीर्तिताः ।। 37.9 ।।

śrīśca dharmaśca kākutstha tvayi nityaṃ pratiṣṭhitau | etāścānyāśca madhurā vandibhiḥ parikīrtitāḥ || 37.9 ||

"हे काकुत्स्थ! श्री और धर्म दोनों सदा आप में ही प्रतिष्ठित हैं।" इस प्रकार वन्दीजनों ने इन तथा अन्य मधुर स्तुतियों का बखान किया।

श्लोक 10 (uttara.37.10)

सूताश्च संस्तवैर्दिव्यैर्बोधयन्ति स्म राघवम् । स्तुतिभिः स्तूयमानाभिः प्रत्यबुध्यत राघवः ।। 37.10 ।।

sūtāśca saṃstavairdivyairbodhayanti sma rāghavam | stutibhiḥ stūyamānābhiḥ pratyabudhyata rāghavaḥ || 37.10 ||

सूतगण भी दिव्य स्तुतियों से राघव को जगाते रहे; इस प्रकार गाई जाती हुई स्तुतियों से राघव जाग उठे।

श्लोक 11 (uttara.37.11)

स तद्विहाय शयनं पाण्डराच्छादनास्तृतम् । उत्तस्थौ नागशयनाद्धरिर्नारायणो यथा ।। 37.11 ।।

sa tadvihāya śayanaṃ pāṇḍarācchādanāstṛtam | uttasthau nāgaśayanāddharirnārāyaṇo yathā || 37.11 ||

श्वेत चादरों से आच्छादित उस शय्या को त्यागकर वे उठ खड़े हुए, जैसे भगवान् नारायण शेषशय्या से उठते हैं।

श्लोक 12 (uttara.37.12)

तमुत्थितं महात्मानं प्रह्वाः प्राञ्जलयो नराः । सलिलं भाजनैः शुभ्रैरुपतस्थुः सहस्रशः ।। 37.12 ।।

tamutthitaṃ mahātmānaṃ prahvāḥ prāñjalayo narāḥ | salilaṃ bhājanaiḥ śubhrairupatasthuḥ sahasraśaḥ || 37.12 ||

उन उठे हुए महात्मा के समक्ष विनम्र, हाथ जोड़े हुए सहस्रों पुरुष उज्ज्वल पात्रों में जल लेकर उपस्थित हुए।

श्लोक 13 (uttara.37.13)

कृतोदकशुचिर्भूत्वा काले हुतहुताशनः । देवागारं जगामाशु पुण्यमिक्ष्वाकुसेवितम् ।। 37.13 ।।

kṛtodakaśucirbhūtvā kāle hutahutāśanaḥ | devāgāraṃ jagāmāśu puṇyamikṣvākusevitam || 37.13 ||

जल से शुद्ध होकर, समय पर अग्नि में हवन करके, वे तुरन्त इक्ष्वाकुवंशियों द्वारा सेवित उस पवित्र देवालय में गए।

श्लोक 14 (uttara.37.14)

तत्र देवान्पितऽन्विप्रानर्चयित्वा यथाविधि । बाह्यकक्षान्तरं रामो निर्जगाम जनैर्वृतः ।। 37.14 ।।

tatra devānpita'nviprānarcayitvā yathāvidhi | bāhyakakṣāntaraṃ rāmo nirjagāma janairvṛtaḥ || 37.14 ||

वहाँ विधिपूर्वक देवताओं, पितरों और ब्राह्मणों की पूजा करके, राम जनसमूह से घिरे हुए बाह्य कक्ष में आए।

श्लोक 15 (uttara.37.15)

उपतस्थुर्महात्मानो मन्त्रिणः सपुरोहिताः । वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे दीप्यमाना इवाग्नयः ।। 37.15 ।।

upatasthurmahātmāno mantriṇaḥ sapurohitāḥ | vasiṣṭhapramukhāḥ sarve dīpyamānā ivāgnayaḥ || 37.15 ||

महात्मा मन्त्रीगण, पुरोहितों सहित, वसिष्ठ आदि सभी अग्नि के समान देदीप्यमान होकर वहाँ उपस्थित हुए।

श्लोक 16 (uttara.37.16)

क्षत्रियाश्च महात्मानो नानाजनपदेश्वराः । रामस्योपाविशन्पार्श्वे शक्रस्येव यथा ऽमराः ।। 37.16 ।।

kṣatriyāśca mahātmāno nānājanapadeśvarāḥ | rāmasyopāviśanpārśve śakrasyeva yathā 'marāḥ || 37.16 ||

विभिन्न देशों के अधिपति महात्मा क्षत्रियगण राम के समीप उसी प्रकार बैठे, जैसे देवगण इन्द्र के समीप बैठते हैं।

श्लोक 17 (uttara.37.17)

भरतो लक्ष्मणश्चात्र शत्रुघ्नश्च महायशाः । उपासाञ्चक्रिरे हृष्टा वेदास्त्रय इवाध्वरम् ।। 37.17 ।।

bharato lakṣmaṇaścātra śatrughnaśca mahāyaśāḥ | upāsāñcakrire hṛṣṭā vedāstraya ivādhvaram || 37.17 ||

भरत, लक्ष्मण और महायशस्वी शत्रुघ्न वहाँ हर्षपूर्वक उनकी सेवा में उसी प्रकार उपस्थित रहे, जैसे तीनों वेद किसी यज्ञ की सेवा करते हैं।

श्लोक 18 (uttara.37.18)

याताः प्राञ्जलयो भूत्वा किङ्करा मुदिताननाः । मुदिता नाम पार्श्वस्था बहवः समुपाविशन् ।। 37.18 ।।

yātāḥ prāñjalayo bhūtvā kiṅkarā muditānanāḥ | muditā nāma pārśvasthā bahavaḥ samupāviśan || 37.18 ||

सेवकगण भी हाथ जोड़कर, प्रसन्नमुख होकर वहाँ आए, और अनेक हर्षित जन उनके समीप बैठ गए।

श्लोक 19 (uttara.37.19)

वानराश्च महावीर्या विंशतिः कामरूपिणः । सुग्रीवप्रमुखा राममुपासन्ते महौजसः ।। 37.19 ।।

vānarāśca mahāvīryā viṃśatiḥ kāmarūpiṇaḥ | sugrīvapramukhā rāmamupāsante mahaujasaḥ || 37.19 ||

इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, महापराक्रमी, सुग्रीव आदि बीस महातेजस्वी वानर राम की सेवा में उपस्थित हुए।

श्लोक 20 (uttara.37.20)

विभीषणश्च रक्षोभिश्चतुर्भिः परिवारितः । उपासते महात्मानं धनेशमिव गुह्यकाः ।। 37.20 ।।

vibhīṣaṇaśca rakṣobhiścaturbhiḥ parivāritaḥ | upāsate mahātmānaṃ dhaneśamiva guhyakāḥ || 37.20 ||

विभीषण भी चार राक्षसों से घिरे हुए उन महात्मा की सेवा में उसी प्रकार उपस्थित रहे, जैसे गुह्यक धनपति कुबेर की सेवा करते हैं।

श्लोक 21 (uttara.37.21)

तथा निगमवृद्धाश्च कुलीना ये च मानवाः । शिरसा ऽ ऽवन्द्य राजानमुपासन्ते विचक्षणाः ।। 37.21 ।।

tathā nigamavṛddhāśca kulīnā ye ca mānavāḥ | śirasā ' 'vandya rājānamupāsante vicakṣaṇāḥ || 37.21 ||

इसी प्रकार वेदवृद्ध और कुलीन विचक्षण पुरुष भी राजा को सिर झुकाकर प्रणाम कर उनकी सेवा में उपस्थित हुए।

श्लोक 22 (uttara.37.22)

तथा परिवृतो राजा श्रीमद्भिर्ऋषिभिर्वृतः । राजभिश्च महावीर्यैर्वानरैश्च सराक्षसैः ।। 37.22 ।।

tathā parivṛto rājā śrīmadbhirṛṣibhirvṛtaḥ | rājabhiśca mahāvīryairvānaraiśca sarākṣasaiḥ || 37.22 ||

इस प्रकार श्रीमान् ऋषियों, महापराक्रमी राजाओं, वानरों और राक्षसों से घिरे हुए वह राजा...

श्लोक 23 (uttara.37.23)

यथा देवेश्वरो नित्यमृषिभिः समुपास्यते । अधिकस्तेन रूपेण सहस्राक्षाद्विरोचते ।। 37.23 ।।

yathā deveśvaro nityamṛṣibhiḥ samupāsyate | adhikastena rūpeṇa sahasrākṣādvirocate || 37.23 ||

...उसी प्रकार शोभायमान हो रहे थे, जैसे देवराज इन्द्र सदा ऋषियों द्वारा सेवित होते हैं; और उस शोभा से वे सहस्राक्ष इन्द्र से भी अधिक देदीप्यमान हो रहे थे।

श्लोक 24 (uttara.37.24)

तेषां समुपविष्टानां तास्ताः सुमधुराः कथाः । कथ्यन्ते धर्मसंयुक्ताः पुराणज्ञैर्महात्मभिः ।। 37.24 ।।

teṣāṃ samupaviṣṭānāṃ tāstāḥ sumadhurāḥ kathāḥ | kathyante dharmasaṃyuktāḥ purāṇajñairmahātmabhiḥ || 37.24 ||

इस प्रकार सब एकत्र बैठे हुए, पुराणों के ज्ञाता महात्माजन धर्म से युक्त अनेक मधुर कथाएँ कहने लगे।

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