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उत्तरकाण्ड · सर्ग 38

जनक तथा समागत राजाओं की विदाई

सर्ग 37सर्ग-सूचीसर्ग 39

श्लोक 1 (uttara.38.1)

एवमास्ते महाबाहुरहन्यहनि राघवः । प्रशासत्सर्वकार्याणि पौरजानपदेषु च ।। 38.1 ।।

evamāste mahābāhurahanyahani rāghavaḥ | praśāsatsarvakāryāṇi paurajānapadeṣu ca || 38.1 ||

इस प्रकार महाबाहु राघव प्रतिदिन नगरवासियों और ग्रामवासियों के समस्त कार्यों का शासन करते हुए रहने लगे।

श्लोक 2 (uttara.38.2)

ततः कतिपयाहःसु वैदेहं मिथिलाधिपम् । राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ।। 38.2 ।।

tataḥ katipayāhaḥsu vaidehaṃ mithilādhipam | rāghavaḥ prāñjalirbhūtvā vākyametaduvāca ha || 38.2 ||

तत्पश्चात् कुछ दिनों के बाद राघव ने हाथ जोड़कर वैदेह मिथिलाधिपति (जनक) से यह वचन कहा।

श्लोक 3 (uttara.38.3)

भवान्हि गतिरव्यग्रा भवता पालिता वयम् । भवतस्तेजसोग्रेण रावणो निहतो मया ।। 38.3 ।।

bhavānhi gatiravyagrā bhavatā pālitā vayam | bhavatastejasogreṇa rāvaṇo nihato mayā || 38.3 ||

"आप ही हमारी अविचल गति हैं, आपने ही हमारा पालन किया है; आपके ही उग्र तेज से मैंने रावण का वध किया है।

श्लोक 4 (uttara.38.4)

इक्ष्वाकूणां च सर्वेषां मैथिलानां च सर्वशः । अतुलाः प्रीतयो राजन्सम्बन्धकपुरोगमाः ।। 38.4 ।।

ikṣvākūṇāṃ ca sarveṣāṃ maithilānāṃ ca sarvaśaḥ | atulāḥ prītayo rājansambandhakapurogamāḥ || 38.4 ||

हे राजन्! समस्त इक्ष्वाकुवंशियों और मैथिलों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध के कारण अतुलनीय प्रेम है।

श्लोक 5 (uttara.38.5)

तद्भवान्स्वपुरं यातु रत्नान्यादाय पार्थिव । भरतश्च सहायार्थं पृष्ठतस्ते ऽनुयास्यति ।। 38.5 ।।

tadbhavānsvapuraṃ yātu ratnānyādāya pārthiva | bharataśca sahāyārthaṃ pṛṣṭhataste 'nuyāsyati || 38.5 ||

अतः हे पार्थिव! आप रत्न लेकर अपनी नगरी को प्रस्थान करें; और भरत सहायतार्थ आपके पीछे-पीछे चलेंगे।

श्लोक 6 (uttara.38.6)

स तथेति नृपः कृत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् । प्रीतो ऽस्मि भवतो राजन्दर्शनेन नयेन च ।। 38.6 ।।

sa tatheti nṛpaḥ kṛtvā rāghavaṃ vākyamabravīt | prīto 'smi bhavato rājandarśanena nayena ca || 38.6 ||

उस राजा ने "ऐसा ही हो" कहकर राघव से यह वचन कहा - "हे राजन्! मैं आपके दर्शन और आपकी नीति से प्रसन्न हूँ।

श्लोक 7 (uttara.38.7)

यान्येतानि तु रत्नानि मदर्थं सञ्चितानि वै । दुहित्रे तानि वै राजन्सर्वाण्येव ददामि च ।। 38.7 ।।

yānyetāni tu ratnāni madarthaṃ sañcitāni vai | duhitre tāni vai rājansarvāṇyeva dadāmi ca || 38.7 ||

मेरे लिए संचित किए गए ये जो रत्न हैं, हे राजन्! ये सभी मैं अपनी पुत्री को ही देता हूँ।"

श्लोक 8 (uttara.38.8)

एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थं जनको हृष्टमानसः । प्रययौ मिथिलां श्रीमांस्तमनुज्ञाय राघवम् ।। 38.8 ।।

evamuktvā tu kākutsthaṃ janako hṛṣṭamānasaḥ | prayayau mithilāṃ śrīmāṃstamanujñāya rāghavam || 38.8 ||

काकुत्स्थ से इस प्रकार कहकर, हर्षित मन वाले श्रीमान् जनक राघव से आज्ञा लेकर मिथिला के लिए प्रस्थान कर गए।

श्लोक 9 (uttara.38.9)

ततः प्रयाते जनके केकयं मातुलं प्रभुः । राघवः प्राञ्जलिर्भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ।। 38.9 ।।

tataḥ prayāte janake kekayaṃ mātulaṃ prabhuḥ | rāghavaḥ prāñjalirbhūtvā vākyametaduvāca ha || 38.9 ||

जनक के प्रस्थान करने पर, प्रभु राघव ने हाथ जोड़कर अपने मामा केकयराज से यह वचन कहा।

श्लोक 10 (uttara.38.10)

इदं राज्यमहं चैव भरतश्च सलक्ष्मणः । आयत्तास्त्वं हि नो राजन्गतिश्च पुरुषर्षभ ।। 38.10 ।।

idaṃ rājyamahaṃ caiva bharataśca salakṣmaṇaḥ | āyattāstvaṃ hi no rājangatiśca puruṣarṣabha || 38.10 ||

"यह राज्य, मैं स्वयं, तथा लक्ष्मण सहित भरत - हम सब आपके ही अधीन हैं; हे राजन्! हे पुरुषर्षभ! आप ही हमारी गति हैं।

श्लोक 11 (uttara.38.11)

राजा हि वृद्धः सन्तापं त्वदर्थमुपयास्यति । तस्माद्गमनमद्यैव रोचते तव पार्थिव ।। 38.11 ।।

rājā hi vṛddhaḥ santāpaṃ tvadarthamupayāsyati | tasmādgamanamadyaiva rocate tava pārthiva || 38.11 ||

वृद्ध महाराज (मेरे पिता) आपके लिए संतप्त होंगे; अतः हे पार्थिव! आज ही आपका प्रस्थान करना उचित है।

श्लोक 12 (uttara.38.12)

लक्ष्मणेनानुयात्रेण पृष्ठतो ऽनुगमिष्यते । धनमादाय विपुलं रत्नानि विविधानि च ।। 38.12 ।।

lakṣmaṇenānuyātreṇa pṛṣṭhato 'nugamiṣyate | dhanamādāya vipulaṃ ratnāni vividhāni ca || 38.12 ||

लक्ष्मण अनुरक्षक के रूप में आपके पीछे-पीछे चलेंगे; आप प्रचुर धन और विविध रत्न लेकर जाएँ।"

श्लोक 13 (uttara.38.13)

युधाजित्तु तथेत्याह गमनं प्रति राघवम् । रत्नानि च धनं चैव त्वय्येवाक्षय्यमस्त्विति ।। 38.13 ।।

yudhājittu tathetyāha gamanaṃ prati rāghavam | ratnāni ca dhanaṃ caiva tvayyevākṣayyamastviti || 38.13 ||

युधाजित् ने राघव से जाने के विषय में "ऐसा ही हो" कहा - "ये रत्न और यह धन आप ही के पास अक्षय बने रहें।"

श्लोक 14 (uttara.38.14)

प्रदक्षिणं स राजानं कृत्वा केकयवर्धनः । रामेण हि कृतः पूर्वमभिवाद्य प्रदक्षिणम् ।। 38.14 ।।

pradakṣiṇaṃ sa rājānaṃ kṛtvā kekayavardhanaḥ | rāmeṇa hi kṛtaḥ pūrvamabhivādya pradakṣiṇam || 38.14 ||

उस केकयवंशवर्धक ने राजा (राम) की प्रदक्षिणा की, क्योंकि पहले राम ने ही उनका अभिवादन और प्रदक्षिणा की थी।

श्लोक 15 (uttara.38.15)

लक्ष्मणेन सहायेन प्रयातः केकयेश्वरः । हते ऽसुरे यथा वृत्रे विष्णुना सह वासवः ।। 38.15 ।।

lakṣmaṇena sahāyena prayātaḥ kekayeśvaraḥ | hate 'sure yathā vṛtre viṣṇunā saha vāsavaḥ || 38.15 ||

लक्ष्मण को सहायक बनाकर केकयराज प्रस्थान कर गए, जैसे वृत्रासुर के मारे जाने पर इन्द्र विष्णु के साथ प्रस्थान करते हैं।

श्लोक 16 (uttara.38.16)

तं विसृज्य ततो रामो वयस्यमकुतोभयम् । प्रतर्दनं काशिपतिं परिष्वज्येदमब्रवीत् ।। 38.16 ।।

taṃ visṛjya tato rāmo vayasyamakutobhayam | pratardanaṃ kāśipatiṃ pariṣvajyedamabravīt || 38.16 ||

उन्हें विदा देकर तत्पश्चात् राम ने अपने निर्भय मित्र, काशिपति प्रतर्दन को गले लगाकर यह कहा।

श्लोक 17 (uttara.38.17)

दर्शिता भवता प्रीतिर्दर्शितं सौहृदं परम् । उद्योगश्च कृतो राजन्भरतेन त्वया सह ।। 38.17 ।।

darśitā bhavatā prītirdarśitaṃ sauhṛdaṃ param | udyogaśca kṛto rājanbharatena tvayā saha || 38.17 ||

"आपने मुझे प्रेम दिखाया, परम सौहार्द दिखाया; और हे राजन्! आपने भरत के साथ मिलकर उद्योग भी किया।

श्लोक 18 (uttara.38.18)

तद्भवानद्य काशेय पुरीं वाराणसीं व्रज । रमणीयां त्वया गुप्तां सुप्रकाशां सुतोरणाम् ।। 38.18 ।।

tadbhavānadya kāśeya purīṃ vārāṇasīṃ vraja | ramaṇīyāṃ tvayā guptāṃ suprakāśāṃ sutoraṇām || 38.18 ||

अतः हे काशिराज! अब आप उस रमणीय, आपके द्वारा सुरक्षित, देदीप्यमान एवं सुन्दर तोरणों वाली वाराणसी नगरी को प्रस्थान करें।"

श्लोक 19 (uttara.38.19)

एतावदुक्त्वा चोत्थाय काकुत्स्थः परमासनात् । पर्यष्वजत धर्मात्मा निरन्तरमुरोगतम् ।। 38.19 ।।

etāvaduktvā cotthāya kākutsthaḥ paramāsanāt | paryaṣvajata dharmātmā nirantaramurogatam || 38.19 ||

इतना कहकर और अपने उत्तम आसन से उठकर, धर्मात्मा काकुत्स्थ ने उन्हें हृदय से लगाकर आलिंगन किया।

श्लोक 20 (uttara.38.20)

विसर्जयामास तदा कौसल्यानन्दवर्धनः । राघवेणाभ्यनुज्ञातः काशीशो ऽप्यकुतोभयः । वाराणसीं ययौ तूर्णं राघवेण विसर्जितः ।। 38.20 ।।

visarjayāmāsa tadā kausalyānandavardhanaḥ | rāghaveṇābhyanujñātaḥ kāśīśo 'pyakutobhayaḥ | vārāṇasīṃ yayau tūrṇaṃ rāghaveṇa visarjitaḥ || 38.20 ||

तब कौसल्या के आनन्दवर्धक राम ने उन्हें विदा दी; और राघव से अनुमति पाकर, निर्भय काशिराज, राघव द्वारा विसर्जित होकर शीघ्र ही वाराणसी को चले गए।

श्लोक 21 (uttara.38.21)

विसृज्य तं काशिपतिं त्रिशतं पृथिवीपतीन् । प्रहसन्राघवो वाक्यमुवाच मधुराक्षरम् ।। 38.21 ।।

visṛjya taṃ kāśipatiṃ triśataṃ pṛthivīpatīn | prahasanrāghavo vākyamuvāca madhurākṣaram || 38.21 ||

उस काशिपति को विदा देकर, तत्पश्चात् त्रिशत (तीन सौ) राजाओं की ओर मुस्कुराते हुए राघव ने मधुर वचन कहा।

श्लोक 22 (uttara.38.22)

भवतां प्रीतिरव्यग्रा तेजसा परिरक्षिता । धर्मश्च नियतो नित्यं सत्यं च भवतां सदा ।। 38.22 ।।

bhavatāṃ prītiravyagrā tejasā parirakṣitā | dharmaśca niyato nityaṃ satyaṃ ca bhavatāṃ sadā || 38.22 ||

"आप सबका प्रेम अविचल रहा है, जो आपके तेज से रक्षित है; आपका धर्म सदा नियत रहा है, और सत्य सदैव आपके साथ रहा है।

श्लोक 23 (uttara.38.23)

युष्माकं चानुभावेन तेजसा च महात्मनाम् । हतो दुरात्मा दुर्बुद्धी रावणो राक्षसाधमः ।। 38.23 ।।

yuṣmākaṃ cānubhāvena tejasā ca mahātmanām | hato durātmā durbuddhī rāvaṇo rākṣasādhamaḥ || 38.23 ||

आप महात्माओं के प्रभाव और तेज से ही दुरात्मा, दुर्बुद्धि, राक्षसाधम रावण का वध हुआ है।

श्लोक 24 (uttara.38.24)

हेतुमात्रमहं तत्र भवतां तेजसा हतः । रावणः सगणो युद्धे सपुत्रामात्यबान्धवः ।। 38.24 ।।

hetumātramahaṃ tatra bhavatāṃ tejasā hataḥ | rāvaṇaḥ sagaṇo yuddhe saputrāmātyabāndhavaḥ || 38.24 ||

मैं तो वहाँ केवल निमित्तमात्र था; आप लोगों के तेज से ही युद्ध में पुत्र, अमात्य और बान्धवों सहित सेनासमेत रावण मारा गया।

श्लोक 25 (uttara.38.25)

भवन्तश्च समानीता भरतेन महात्मना । श्रुत्वा जनकराजस्य काननात्तनयां हृताम् ।। 38.25 ।।

bhavantaśca samānītā bharatena mahātmanā | śrutvā janakarājasya kānanāttanayāṃ hṛtām || 38.25 ||

जनकराज की पुत्री के वन से हरण की बात सुनकर, महात्मा भरत ने ही आप सबको एकत्र किया था।

श्लोक 26 (uttara.38.26)

उद्युक्तानां च सर्वेषां पार्थिवानां महात्मनाम् । कालो व्यतीतः सुमहान्गमनं रोचयाम्यतः ।। 38.26 ।।

udyuktānāṃ ca sarveṣāṃ pārthivānāṃ mahātmanām | kālo vyatītaḥ sumahāngamanaṃ rocayāmyataḥ || 38.26 ||

आप सभी उद्यत महात्मा राजाओं का बहुत लंबा समय व्यतीत हो चुका है; अतः अब मैं आपके प्रस्थान करने को उचित मानता हूँ।"

श्लोक 27 (uttara.38.27)

प्रत्यूचुस्तं च राजानो हर्षेण महता वृताः । दिष्ट्यां त्वं विजयी राम स्वराज्ये ऽपि प्रतिष्ठितः ।। 38.27 ।।

pratyūcustaṃ ca rājāno harṣeṇa mahatā vṛtāḥ | diṣṭyāṃ tvaṃ vijayī rāma svarājye 'pi pratiṣṭhitaḥ || 38.27 ||

और अत्यन्त हर्ष से भरे हुए राजाओं ने उन्हें उत्तर दिया - "सौभाग्य से, हे राम! आप विजयी हुए हैं, और अपने राज्य में भी प्रतिष्ठित हुए हैं।

श्लोक 28 (uttara.38.28)

दिष्ट्या प्रत्याहृता सीता दिष्ट्या शत्रुः पराजितः । एष नः परमः काम एषा नः पीतिरुत्तमा ।। 38.28 ।।

diṣṭyā pratyāhṛtā sītā diṣṭyā śatruḥ parājitaḥ | eṣa naḥ paramaḥ kāma eṣā naḥ pītiruttamā || 38.28 ||

सौभाग्य से सीता वापस लाई गई हैं, सौभाग्य से शत्रु पराजित हुआ है; यही हमारी परम कामना और यही हमारा उत्तम आनन्द है।

श्लोक 29 (uttara.38.29)

यत्त्वां विजयिनं राम पश्यामो हतशात्रवम् ।। 38.29 ।।

yattvāṃ vijayinaṃ rāma paśyāmo hataśātravam || 38.29 ||

यही, कि हम आपको विजयी और शत्रुहीन देख रहे हैं।

श्लोक 30 (uttara.38.30)

एतत्त्वय्युपपन्नं च यदस्मांस्त्वं प्रशंससे । प्रशंसार्ह न जानीमः प्रशंसां वक्तुमीदृशीम् ।। 38.30 ।।

etattvayyupapannaṃ ca yadasmāṃstvaṃ praśaṃsase | praśaṃsārha na jānīmaḥ praśaṃsāṃ vaktumīdṛśīm || 38.30 ||

यह आप में ही सम्भव है कि आप हमारी प्रशंसा करें; हम प्रशंसा के योग्य न होते हुए भी, आप जैसी प्रशंसा करना नहीं जानते।

श्लोक 31 (uttara.38.31)

आपृच्छामो गमिष्यामो हृदिस्थो नः सदा भवान् । वर्तामहे महाबाहो प्रीत्यात्र महता वृताः । भवेच्च ते महाराज प्रीतिरस्मासु नित्यदा ।। 38.31 ।।

āpṛcchāmo gamiṣyāmo hṛdistho naḥ sadā bhavān | vartāmahe mahābāho prītyātra mahatā vṛtāḥ | bhavecca te mahārāja prītirasmāsu nityadā || 38.31 ||

हम आपसे विदा माँगते हैं, अब प्रस्थान करेंगे; आप सदैव हमारे हृदय में बसे रहेंगे। हे महाबाहो! हम यहाँ अत्यन्त प्रेम से भरे हुए हैं; और हे महाराज! आपका प्रेम भी हम पर सदा बना रहे।"

श्लोक 32 (uttara.38.32)

बाढमित्येव राजानो हर्षेण परमान्विताः । उचुः प्राञ्जलयः सर्वे राघवं गमनोत्सुकाः ।। 38.32 ।।

bāḍhamityeva rājāno harṣeṇa paramānvitāḥ | ucuḥ prāñjalayaḥ sarve rāghavaṃ gamanotsukāḥ || 38.32 ||

"अवश्य ऐसा ही हो" - इस प्रकार परम हर्ष से युक्त सभी राजाओं ने हाथ जोड़कर, प्रस्थान के लिए उत्सुक होकर राघव से कहा।

श्लोक 33 (uttara.38.33)

पूजिताश्चैव रामेण जग्मुर्देशान्स्वकान्स्वकान् ।। 38.33 ।।

pūjitāścaiva rāmeṇa jagmurdeśānsvakānsvakān || 38.33 ||

और राम के द्वारा सम्मानित होकर वे सब अपने-अपने देशों को चले गए।

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