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उत्तरकाण्ड · सर्ग 40

राम द्वारा वानरों को विदाई

सर्ग 39सर्ग-सूचीसर्ग 41

श्लोक 1 (uttara.40.1)

तथा स्म तेषां वसतामृक्षवानररक्षसाम् । राघवस्तु महातेजाः सुग्रीवमिदमब्रवीत् ।। 40.1 ।।

tathā sma teṣāṃ vasatāmṛkṣavānararakṣasām | rāghavastu mahātejāḥ sugrīvamidamabravīt || 40.1 ||

इस प्रकार जब वे भालू, वानर और राक्षस वहाँ निवास कर रहे थे, तब महातेजस्वी राघव ने सुग्रीव से यह कहा।

श्लोक 2 (uttara.40.2)

गम्यतां सौम्य किष्किन्धां दुराधर्षां सुरासुरैः । पालयस्व सहामात्यो राज्यं निहतकण्टकम् ।। 40.2 ।।

gamyatāṃ saumya kiṣkindhāṃ durādharṣāṃ surāsuraiḥ | pālayasva sahāmātyo rājyaṃ nihatakaṇṭakam || 40.2 ||

"हे सौम्य! अब देवों और असुरों के लिए भी दुर्धर्ष किष्किन्धा को जाओ; मन्त्रियों सहित निष्कण्टक हुए उस राज्य का पालन करो।

श्लोक 3 (uttara.40.3)

अङ्गदं च महाबाहो प्रीत्या परमया युतः । पश्य त्वं हनुमन्तं च नलं च सुमहाबलम् ।। 40.3 ।।

aṅgadaṃ ca mahābāho prītyā paramayā yutaḥ | paśya tvaṃ hanumantaṃ ca nalaṃ ca sumahābalam || 40.3 ||

हे महाबाहो! परम प्रेम के साथ अंगद का, तथा हनुमान् और अति बलशाली नल का भी ध्यान रखना,

श्लोक 4 (uttara.40.4)

सुषेणं श्वशुरं वीरं तारं च बलिनां वरम् । कुमुदं चैव दुर्धर्षं नीलं चैव महाबलम् ।। 40.4 ।।

suṣeṇaṃ śvaśuraṃ vīraṃ tāraṃ ca balināṃ varam | kumudaṃ caiva durdharṣaṃ nīlaṃ caiva mahābalam || 40.4 ||

अपने श्वसुर वीर सुषेण का, बलवानों में श्रेष्ठ तार का, दुर्धर्ष कुमुद का, और महाबली नील का भी,

श्लोक 5 (uttara.40.5)

वीरं शतवलिं चैव मैन्दं द्विविदमेव च । गजं गवाक्षं गवयं शरभं च महाबलम् । पश्य प्रीतिसमायुक्तो गन्धमादनमेव च ।। 40.5 ।।

vīraṃ śatavaliṃ caiva maindaṃ dvividameva ca | gajaṃ gavākṣaṃ gavayaṃ śarabhaṃ ca mahābalam | paśya prītisamāyukto gandhamādanameva ca || 40.5 ||

वीर शतबलि, मैन्द और द्विविद, गज, गवाक्ष, गवय, तथा महाबली शरभ - इन सबको प्रेमपूर्वक देखना, और गन्धमादन को भी।

श्लोक 6 (uttara.40.6)

ऋषभं च सुविक्रान्तं जाम्बवन्तं महाबलम् । ये चेमे सुमहात्मानो मदर्थे त्यक्तजीविताः ।। 40.6 ।।

ṛṣabhaṃ ca suvikrāntaṃ jāmbavantaṃ mahābalam | ye ceme sumahātmāno madarthe tyaktajīvitāḥ || 40.6 ||

...अत्यन्त पराक्रमी ऋषभ को, महाबली जाम्बवान् को, तथा उन अन्य सभी महात्माओं को भी, जिन्होंने मेरे लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की,

श्लोक 7 (uttara.40.7)

पश्य त्वं प्रीतिसंयुक्तो मा चैषां विप्रियं कृथाः ।। 40.7 ।।

paśya tvaṃ prītisaṃyukto mā caiṣāṃ vipriyaṃ kṛthāḥ || 40.7 ||

...उन सबको प्रेमपूर्वक देखते रहना, और इनका कभी अप्रिय मत करना।"

श्लोक 8 (uttara.40.8)

एवमुक्त्वा तु सुग्रीवमाश्लिष्य च पुनः पुनः । विभीषणमुवाचाथ रामो मधुरया गिरा ।। 40.8 ।।

evamuktvā tu sugrīvamāśliṣya ca punaḥ punaḥ | vibhīṣaṇamuvācātha rāmo madhurayā girā || 40.8 ||

सुग्रीव से इस प्रकार कहकर, तथा उन्हें बार-बार आलिंगन करके, राम ने तब विभीषण से मधुर वाणी में कहा।

श्लोक 9 (uttara.40.9)

लङ्कां प्रशाधि धर्मेण धर्मज्ञस्त्वं मतो मम । पुरस्य राक्षसानां च स्वभ्रातुस्सम्मतो ह्यसि ।। 40.9 ।।

laṅkāṃ praśādhi dharmeṇa dharmajñastvaṃ mato mama | purasya rākṣasānāṃ ca svabhrātussammato hyasi || 40.9 ||

"धर्मपूर्वक लंका का शासन करो; तुम धर्मज्ञ हो, ऐसा मुझे विश्वास है। नगर के राक्षसों तथा अपने भाई (कुबेर) को भी तुम प्रिय हो।

श्लोक 10 (uttara.40.10)

मा च बुद्धिमधर्मे त्वं कुर्या राजन्कथञ्चन । बुद्धिमन्तो हि राजानो ध्रुवमश्नन्ति मेदिनीम् ।। 40.10 ।।

mā ca buddhimadharme tvaṃ kuryā rājankathañcana | buddhimanto hi rājāno dhruvamaśnanti medinīm || 40.10 ||

और हे राजन्! तुम अपनी बुद्धि को कभी भी अधर्म की ओर मत लगाना; क्योंकि बुद्धिमान् राजा ही निश्चय पृथ्वी का दीर्घकाल तक भोग करते हैं।

श्लोक 11 (uttara.40.11)

अहं च नित्यशो राजन्सुग्रीवसहितस्त्वया । स्मर्तव्यः परया प्रीत्या गच्छ त्वं विगतज्वरः ।। 40.11 ।।

ahaṃ ca nityaśo rājansugrīvasahitastvayā | smartavyaḥ parayā prītyā gaccha tvaṃ vigatajvaraḥ || 40.11 ||

हे राजन्! और तुम सुग्रीव के साथ मुझे भी सदा परम प्रेम से स्मरण करते रहना। अब निश्चिन्त होकर जाओ।"

श्लोक 12 (uttara.40.12)

रामस्य भाषितं श्रुत्वा ऋक्षवानरराक्षसाः । साधुसाध्विति काकुत्स्थं प्रशशंसुः पुनः पुनः ।। 40.12 ।।

rāmasya bhāṣitaṃ śrutvā ṛkṣavānararākṣasāḥ | sādhusādhviti kākutsthaṃ praśaśaṃsuḥ punaḥ punaḥ || 40.12 ||

राम के इस वचन को सुनकर भालू, वानर और राक्षस "साधु-साधु" कहकर काकुत्स्थ की बार-बार प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 13 (uttara.40.13)

तव बुद्धिर्महाबाहो वीर्यमद्भुतमेव च । माधुर्यं परमं राम स्वयम्भोरिव नित्यदा ।। 40.13 ।।

tava buddhirmahābāho vīryamadbhutameva ca | mādhuryaṃ paramaṃ rāma svayambhoriva nityadā || 40.13 ||

"हे महाबाहो! आपकी बुद्धि, आपका अद्भुत पराक्रम, तथा हे राम! आपका परम माधुर्य - ये सब सदा स्वयम्भू (ब्रह्मा) के समान हैं।"

श्लोक 14 (uttara.40.14)

तेषामेवं ब्रुवाणानां वानराणां च राक्षसाम् । हनूमान्प्रवणः भूत्वा राघवं वाक्यमब्रवीत् ।। 40.14 ।।

teṣāmevaṃ bruvāṇānāṃ vānarāṇāṃ ca rākṣasām | hanūmānpravaṇaḥ bhūtvā rāghavaṃ vākyamabravīt || 40.14 ||

उन वानरों और राक्षसों के इस प्रकार कहते रहने पर, हनुमान् ने विनम्र होकर राघव से यह वचन कहा।

श्लोक 15 (uttara.40.15)

स्नेहो मे परमो राजंस्त्वयि तिष्ठतु नित्यदा । भक्तिश्च नियता वीर भावो नान्यत्र गच्छतु ।। 40.15 ।।

sneho me paramo rājaṃstvayi tiṣṭhatu nityadā | bhaktiśca niyatā vīra bhāvo nānyatra gacchatu || 40.15 ||

"हे राजन्! आपके प्रति मेरा परम स्नेह सदैव बना रहे; हे वीर! मेरी भक्ति सदा अटल रहे, और मेरा हृदय कभी अन्यत्र न जाए।

श्लोक 16 (uttara.40.16)

यावद्रामकथा वीर चरिष्यति महीतले । तावच्छरीरे वत्स्यन्ति प्राणा मम न संशयः ।। 40.16 ।।

yāvadrāmakathā vīra cariṣyati mahītale | tāvaccharīre vatsyanti prāṇā mama na saṃśayaḥ || 40.16 ||

हे वीर! जब तक राम-कथा इस पृथ्वी पर विचरण करती रहेगी, तब तक निःसंदेह मेरे प्राण इस शरीर में निवास करते रहेंगे।

श्लोक 17 (uttara.40.17)

यच्चैतच्चरितं दिव्यं कथा ते रघुनन्दन । तन्मयाप्सरसो नाम श्रावयेयुर्नरर्षभ ।। 40.17 ।।

yaccaitaccaritaṃ divyaṃ kathā te raghunandana | tanmayāpsaraso nāma śrāvayeyurnararṣabha || 40.17 ||

हे रघुनन्दन! हे नरर्षभ! आपका यह दिव्य चरित्र और कथा - इसे मुझे अप्सराएँ भी सुनाती रहें।

श्लोक 18 (uttara.40.18)

तच्छ्रुत्वाहं ततो वीर तव चर्यामृतं प्रभो । उत्कण्ठां तां हरिष्यामि मेघलेखामिवानिलः ।। 40.18 ।।

tacchrutvāhaṃ tato vīra tava caryāmṛtaṃ prabho | utkaṇṭhāṃ tāṃ hariṣyāmi meghalekhāmivānilaḥ || 40.18 ||

हे वीर! हे प्रभो! आपके चरित्र के उस अमृत को सुनकर मैं अपनी उत्कण्ठा को उसी प्रकार दूर कर लूँगा, जैसे वायु मेघ की रेखा को छिन्न-भिन्न कर देती है।"

श्लोक 19 (uttara.40.19)

एवं ब्रुवाणं रामस्तु हनूमन्तं वरासनात् । उत्थाय सस्वजे स्नेहाद्वाक्यमेतदुवाच ह ।। 40.19 ।।

evaṃ bruvāṇaṃ rāmastu hanūmantaṃ varāsanāt | utthāya sasvaje snehādvākyametaduvāca ha || 40.19 ||

इस प्रकार कहते हुए हनुमान् को, राम ने अपने उत्तम आसन से उठकर स्नेहपूर्वक आलिंगन किया, और यह वचन कहा।

श्लोक 20 (uttara.40.20)

एवमेतत्कपिश्रेष्ठ भविता नात्र संशयः । चरिष्यति कथा यावदेषा लोके च मामिका । तावत्ते भविता कीर्तिः शरीरे ऽप्यसवस्तथा ।। 40.20 ।।

evametatkapiśreṣṭha bhavitā nātra saṃśayaḥ | cariṣyati kathā yāvadeṣā loke ca māmikā | tāvatte bhavitā kīrtiḥ śarīre 'pyasavastathā || 40.20 ||

"हे कपिश्रेष्ठ! ऐसा ही होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। जब तक मेरी यह कथा संसार में विचरण करती रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति बनी रहेगी, और वैसे ही तुम्हारे प्राण भी शरीर में बने रहेंगे।

श्लोक 21 (uttara.40.21)

लोका हि यावत्स्थास्यन्ति तावत्स्थास्यति मे कथा ।। 40.21 ।।

lokā hi yāvatsthāsyanti tāvatsthāsyati me kathā || 40.21 ||

क्योंकि जब तक ये लोक स्थित रहेंगे, तब तक मेरी कथा भी स्थित रहेगी।

श्लोक 22 (uttara.40.22)

एकैकस्योपकारस्य प्राणान्दास्यामि ते कपे । नरः प्रत्युपकाराणामापस्त्वायाति पात्रताम् ।। 40.22 ।।

ekaikasyopakārasya prāṇāndāsyāmi te kape | naraḥ pratyupakārāṇāmāpastvāyāti pātratām || 40.22 ||

हे कपि! तुम्हारे एक-एक उपकार के बदले मैं तुम्हें अपने प्राण भी दे सकता हूँ; मनुष्य प्रत्युपकार करने का अवसर विरले ही पाता है।"

श्लोक 23 (uttara.40.23)

ततो ऽस्य हारं चन्द्राभं मुच्य कण्ठात्स राघवः । वैडूर्यतरलं कण्ठे बबन्ध च हनूमतः ।। 40.23 ।।

tato 'sya hāraṃ candrābhaṃ mucya kaṇṭhātsa rāghavaḥ | vaiḍūryataralaṃ kaṇṭhe babandha ca hanūmataḥ || 40.23 ||

तत्पश्चात् राघव ने अपने कण्ठ से चन्द्रमा के समान उज्ज्वल, वैडूर्यमणि के लटकन वाला हार उतारकर हनुमान् के गले में बाँध दिया।

श्लोक 24 (uttara.40.24)

तेनोरसि निबद्धेन हारेण महता कपिः । रराज हेमशैलेन्द्रश्चन्द्रेणाक्रान्तमस्तकः ।। 40.24 ।।

tenorasi nibaddhena hāreṇa mahatā kapiḥ | rarāja hemaśailendraścandreṇākrāntamastakaḥ || 40.24 ||

वक्षःस्थल पर बँधे हुए उस विशाल हार से वह वानर उसी प्रकार सुशोभित होने लगा, जैसे स्वर्णमय पर्वतराज (मेरु) अपने शिखर पर चन्द्रमा को धारण किए हुए हो।

श्लोक 25 (uttara.40.25)

श्रुत्वा तु राघवस्यैतदुत्थायोत्थाय वानराः । प्रणम्य शिरसा पादौ निर्जग्मुस्ते महाबलाः ।। 40.25 ।।

śrutvā tu rāghavasyaitadutthāyotthāya vānarāḥ | praṇamya śirasā pādau nirjagmuste mahābalāḥ || 40.25 ||

राघव की यह बात सुनकर वे महाबली वानर एक-एक करके उठे, और सिर झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम करके प्रस्थान करने लगे।

श्लोक 26 (uttara.40.26)

सुग्रीवः स च रामेण निरन्तरमुरोगतः । विभीषणश्च धर्मात्मा सर्वे ते बाष्पविक्लवाः ।। 40.26 ।।

sugrīvaḥ sa ca rāmeṇa nirantaramurogataḥ | vibhīṣaṇaśca dharmātmā sarve te bāṣpaviklavāḥ || 40.26 ||

सुग्रीव, जिन्हें राम ने हृदय से लगाकर आलिंगन किया था, तथा धर्मात्मा विभीषण भी - वे सभी अश्रुपूरित होकर विह्वल हो गए।

श्लोक 27 (uttara.40.27)

सर्वे च ते बाष्पकलाः साश्रुनेत्रा विचेतसः । सम्मूढा इव दुःखेन त्यजन्तो राघवं तदा ।। 40.27 ।।

sarve ca te bāṣpakalāḥ sāśrunetrā vicetasaḥ | sammūḍhā iva duḥkhena tyajanto rāghavaṃ tadā || 40.27 ||

वे सभी अश्रुगद्गद, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले, अचेत-से होकर, मानो दुःख से मूढ़ हुए, उस समय राघव से विदा लेने लगे।

श्लोक 28 (uttara.40.28)

कृतप्रसादास्तेनैवं राघवेण महात्मना । जग्मुः स्वं स्वं गृहं सर्वे देही देहमिव त्यजन् ।। 40.28 ।।

kṛtaprasādāstenaivaṃ rāghaveṇa mahātmanā | jagmuḥ svaṃ svaṃ gṛhaṃ sarve dehī dehamiva tyajan || 40.28 ||

उन महात्मा राघव द्वारा इस प्रकार अनुगृहीत होकर वे सब अपने-अपने घर को उसी प्रकार चल पड़े, जैसे देही (जीवात्मा) शरीर को त्यागकर जाता है।

श्लोक 29 (uttara.40.29)

ततस्तु ते राक्षसऋक्षवानराः प्रणम्य रामं रघुवंशवर्धनम् । वियोगजाश्रुप्रतिपूर्णलोचनाः प्रतिप्रयातास्तु यथा निवासिनः ।। 40.29 ।।

tatastu te rākṣasaṛkṣavānarāḥ praṇamya rāmaṃ raghuvaṃśavardhanam | viyogajāśrupratipūrṇalocanāḥ pratiprayātāstu yathā nivāsinaḥ || 40.29 ||

तत्पश्चात् वे राक्षस, भालू और वानर, रघुवंश के वर्धनकर्ता राम को प्रणाम करके, वियोग से उत्पन्न अश्रुओं से परिपूर्ण नेत्रों के साथ, अपने-अपने निवास-स्थान को लौट गए।

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