उत्तरकाण्ड · सर्ग 45
सीता का परित्याग
श्लोक 1 (uttara.45.1)
तेषां समुपविष्टानां सर्वेषां दीनचेतसाम् । उवाच वाक्यं काकुत्स्थो मुखेन परिशुष्यता ।। 45.1 ।।
teṣāṃ samupaviṣṭānāṃ sarveṣāṃ dīnacetasām | uvāca vākyaṃ kākutstho mukhena pariśuṣyatā || 45.1 ||
उन सबके, जो दीन हृदय से बैठे थे, बीच काकुत्स्थ ने सूखते हुए मुख से यह वचन कहा।
श्लोक 2 (uttara.45.2)
सर्वे शृणुत भद्रं वो मा कुरुध्वं मनो ऽन्यथा । पौराणां मम सीतायां यादृशी वर्तते कथा ।। 45.2 ।।
sarve śṛṇuta bhadraṃ vo mā kurudhvaṃ mano 'nyathā | paurāṇāṃ mama sītāyāṃ yādṛśī vartate kathā || 45.2 ||
"तुम सब सुनो, तुम्हारा कल्याण हो; अपना मन कहीं और मत लगाओ - सुनो कि नगरवासियों में मेरे और सीता के विषय में कैसी बातें फैली हुई हैं।
श्लोक 3 (uttara.45.3)
पौरापवादः सुमहांस्तथा जनपदस्य च । वर्तते मयि बीभत्सा सा मे मर्माणि कृन्तति ।। 45.3 ।।
paurāpavādaḥ sumahāṃstathā janapadasya ca | vartate mayi bībhatsā sā me marmāṇi kṛntati || 45.3 ||
बहुत बड़ी निन्दा नगरवासियों की, और जनपदवासियों की भी, मुझ पर हो रही है; वह घृणित बात मेरे मर्मस्थलों को काट रही है।
श्लोक 4 (uttara.45.4)
अहं किल कुले जात इक्ष्वाकूणां महात्मनाम् । सीता ऽपि सत्कुले जाता जनकानां महात्मनाम् ।। 45.4 ।।
ahaṃ kila kule jāta ikṣvākūṇāṃ mahātmanām | sītā 'pi satkule jātā janakānāṃ mahātmanām || 45.4 ||
मैं, ऐसा कहा जाता है, महात्मा इक्ष्वाकुओं के कुल में जन्मा हूँ; सीता भी महात्मा जनकों के सत्कुल में जन्मी हैं।
श्लोक 5 (uttara.45.5)
जानासि त्वं यथा सौम्य दण्डके विजने वने । रावणेन हृता सीता स च विध्वंसितो मया ।। 45.5 ।।
jānāsi tvaṃ yathā saumya daṇḍake vijane vane | rāvaṇena hṛtā sītā sa ca vidhvaṃsito mayā || 45.5 ||
हे सौम्य! तुम जानते हो कि किस प्रकार सूने दण्डक वन में सीता का रावण द्वारा हरण किया गया था, और उस रावण को मैंने नष्ट किया।
श्लोक 6 (uttara.45.6)
तत्र मे बुद्धिरुत्पन्ना जनकस्य सुतां प्रति । अत्रोषितामिमां सीतामानयेयं कथं पुरीम् ।। 45.6 ।।
tatra me buddhirutpannā janakasya sutāṃ prati | atroṣitāmimāṃ sītāmānayeyaṃ kathaṃ purīm || 45.6 ||
वहाँ जनक-पुत्री सीता के विषय में मेरे मन में यह विचार उठा था कि वहाँ रह चुकीं इस सीता को मैं नगर में किस प्रकार ले आऊँ?
श्लोक 7 (uttara.45.7)
प्रत्ययार्थं ततः सीता विवेश ज्वलनं तदा । प्रत्यक्षं तव सौमित्रे देवानां हव्यवाहनः । अपापां मैथिलीमाह वायुश्चाकाशगोचरः ।। 45.7 ।।
pratyayārthaṃ tataḥ sītā viveśa jvalanaṃ tadā | pratyakṣaṃ tava saumitre devānāṃ havyavāhanaḥ | apāpāṃ maithilīmāha vāyuścākāśagocaraḥ || 45.7 ||
तब प्रमाण के लिए सीता ने अग्नि में प्रवेश किया था; हे सौमित्रे! तुम्हारे सामने ही देवताओं के हव्यवाहक अग्निदेव ने, तथा आकाशचारी वायुदेव ने भी, मैथिली को निष्पाप कहा था।
श्लोक 8 (uttara.45.8)
चन्द्रादित्यौ च शंसेते सुराणां सन्निधौ पुरा । ऋषीणां चैव सर्वेषामपापां जनकात्मजाम् ।। 45.8 ।।
candrādityau ca śaṃsete surāṇāṃ sannidhau purā | ṛṣīṇāṃ caiva sarveṣāmapāpāṃ janakātmajām || 45.8 ||
और चन्द्रमा तथा सूर्य ने भी, देवताओं और समस्त ऋषियों के समक्ष, उस समय जनकात्मजा को निष्पाप घोषित किया था।
श्लोक 9 (uttara.45.9)
एवं शुद्धसमाचारा देवगन्धर्वसन्निधौ । लङ्काद्वीपे महेन्द्रेण मम हस्ते निवेशिता ।। 45.9 ।।
evaṃ śuddhasamācārā devagandharvasannidhau | laṅkādvīpe mahendreṇa mama haste niveśitā || 45.9 ||
इस प्रकार शुद्ध आचरण वाली सीता को, देवों और गन्धर्वों के समक्ष, लंका द्वीप में, स्वयं महेन्द्र ने मेरे हाथ में सौंपा था।
श्लोक 10 (uttara.45.10)
अन्तरात्मा च मे वेत्ति सीतां शुद्धां यशस्विनीम् । ततो गृहीत्वा वैदेहीमयोध्यामहमागतः ।। 45.10 ।।
antarātmā ca me vetti sītāṃ śuddhāṃ yaśasvinīm | tato gṛhītvā vaidehīmayodhyāmahamāgataḥ || 45.10 ||
और मेरी अन्तरात्मा भी सीता को शुद्ध और यशस्विनी जानती है। तत्पश्चात् वैदेही को साथ लेकर मैं अयोध्या आया।
श्लोक 11 (uttara.45.11)
अयं तु मे महान्वादः शोकश्च हृदि वर्तते । पौरापवादः सुमहांस्तथा जनपदस्य च ।। 45.11 ।।
ayaṃ tu me mahānvādaḥ śokaśca hṛdi vartate | paurāpavādaḥ sumahāṃstathā janapadasya ca || 45.11 ||
फिर भी यह बड़ा विवाद और शोक मेरे हृदय में बना हुआ है - नगरवासियों की, और जनपदवासियों की भी, यह अत्यन्त बड़ी निन्दा।
श्लोक 12 (uttara.45.12)
अकीर्तिर्यस्य गीयेत लोके भूतस्य कस्यचित् । पतत्येवाधमाँल्लोकान्यावच्छब्दः प्रकीर्त्यते ।। 45.12 ।।
akīrtiryasya gīyeta loke bhūtasya kasyacit | patatyevādhamā~llokānyāvacchabdaḥ prakīrtyate || 45.12 ||
संसार में जिस किसी प्राणी की अपकीर्ति गाई जाती है, वह जब तक वह अपवाद प्रचलित रहता है, तब तक अधम लोकों में गिरता ही रहता है।
श्लोक 13 (uttara.45.13)
अकीर्तिर्निन्द्यते देवैः कीर्तिर्लोकेषु पूज्यते । कीर्त्यर्थं तु समारम्भः सर्वेषां सुमहात्मनाम् ।। 45.13 ।।
akīrtirnindyate devaiḥ kīrtirlokeṣu pūjyate | kīrtyarthaṃ tu samārambhaḥ sarveṣāṃ sumahātmanām || 45.13 ||
अपकीर्ति देवताओं द्वारा भी निन्दित होती है, और कीर्ति समस्त लोकों में पूजित होती है; समस्त महात्माओं का हर उद्यम कीर्ति के लिए ही होता है।
श्लोक 14 (uttara.45.14)
अप्यहं जीवितं जह्यां युष्मान्वा पुरुषर्षभाः । अपवादभयाद्भीतः किं पुनर्जनकात्मजाम् ।। 45.14 ।।
apyahaṃ jīvitaṃ jahyāṃ yuṣmānvā puruṣarṣabhāḥ | apavādabhayādbhītaḥ kiṃ punarjanakātmajām || 45.14 ||
हे पुरुषर्षभो! अपवाद के भय से भयभीत होकर मैं अपना जीवन भी त्याग सकता हूँ, अथवा तुम सबको भी - फिर जनकात्मजा को त्यागना तो और भी सहज है।
श्लोक 15 (uttara.45.15)
तस्माद्भवन्तः पश्यन्तु पतितं शोकसागरे । नहि पश्याम्यहं भूतं किञ्चिद्दुःखमतो ऽधिकम् ।। 45.15 ।।
tasmādbhavantaḥ paśyantu patitaṃ śokasāgare | nahi paśyāmyahaṃ bhūtaṃ kiñcidduḥkhamato 'dhikam || 45.15 ||
इसलिए तुम सब मुझे शोक के सागर में डूबा हुआ देखो; क्योंकि मुझे इससे बढ़कर कोई भी दुःख किसी प्राणी को हुआ हो, ऐसा दिखाई नहीं देता।
श्लोक 16 (uttara.45.16)
श्वस्त्वं प्रभाते सौमित्रे सुमन्त्राधिष्ठितं रथम् । आरुह्य सीतामारोप्य विषयान्ते समुत्सृज ।। 45.16 ।।
śvastvaṃ prabhāte saumitre sumantrādhiṣṭhitaṃ ratham | āruhya sītāmāropya viṣayānte samutsṛja || 45.16 ||
हे सौमित्रे! कल प्रातःकाल सुमन्त्र द्वारा संचालित रथ पर चढ़कर, सीता को भी उस पर बिठाकर, उन्हें राज्य की सीमा पर छोड़ आओ।
श्लोक 17 (uttara.45.17)
गङ्गायास्तु परे पारे वाल्मीकेस्तु महात्मनः । आश्रमो दिव्यसङ्काशस्तमसातीरमाश्रितः ।। 45.17 ।।
gaṅgāyāstu pare pāre vālmīkestu mahātmanaḥ | āśramo divyasaṅkāśastamasātīramāśritaḥ || 45.17 ||
गंगा के उस पार, महात्मा वाल्मीकि का दिव्य-सा दिखने वाला आश्रम है, जो तमसा नदी के तट पर स्थित है।
श्लोक 18 (uttara.45.18)
तत्रैनां विजने देशे विसृज्य रघुनन्दन । शीघ्रमागच्छ भद्रं ते कुरुष्व वचनं मम ।। 45.18 ।।
tatraināṃ vijane deśe visṛjya raghunandana | śīghramāgaccha bhadraṃ te kuruṣva vacanaṃ mama || 45.18 ||
हे रघुनन्दन! उन्हें वहाँ उस निर्जन स्थान में छोड़कर शीघ्र लौट आओ; तुम्हारा कल्याण हो - मेरी बात मानो।
श्लोक 19 (uttara.45.19)
न चास्मिन् प्रतिवक्तव्यः सीतां प्रति कथञ्चन । तस्मात्त्वं गच्छ सौमित्रे नात्र कार्या विचारणा ।। 45.19 ।।
na cāsmin prativaktavyaḥ sītāṃ prati kathañcana | tasmāttvaṃ gaccha saumitre nātra kāryā vicāraṇā || 45.19 ||
इस विषय में, सीता को लेकर, मुझसे किसी प्रकार का प्रत्युत्तर नहीं देना है। इसलिए हे सौमित्रे! तुम जाओ; इसमें कोई विचार-विमर्श नहीं करना है।
श्लोक 20 (uttara.45.20)
अप्रीतिर्हि परा मह्यं त्वयेतत्प्रतिवारिते । शापिता हि मया यूयं भुजाभ्यां जीवितेन च ।। 45.20 ।।
aprītirhi parā mahyaṃ tvayetatprativārite | śāpitā hi mayā yūyaṃ bhujābhyāṃ jīvitena ca || 45.20 ||
यदि तुमने इसका विरोध किया, तो मुझे अत्यन्त अप्रसन्नता होगी; क्योंकि मैंने तुम सबको अपनी भुजाओं और अपने जीवन की सौगन्ध देकर बाँध दिया है।
श्लोक 21 (uttara.45.21)
ये मां वाक्यान्तरे ब्रूयुरनुनेतुं कथञ्चन । अहिता नाम ते नित्यं मदभीष्टविघातनात् ।। 45.21 ।।
ye māṃ vākyāntare brūyuranunetuṃ kathañcana | ahitā nāma te nityaṃ madabhīṣṭavighātanāt || 45.21 ||
जो कोई भी मुझे बीच में किसी प्रकार समझाने-बुझाने के लिए कुछ कहेगा, वह मेरे अभीष्ट का विघात करने के कारण, सदा के लिए मेरा अहितकारी ही समझा जाएगा।
श्लोक 22 (uttara.45.22)
मानयन्तु भवन्तो मां यदि मच्छासने स्थिताः । इतो ऽद्य नीयतां सीता कुरुष्व वचनं मम ।। 45.22 ।।
mānayantu bhavanto māṃ yadi macchāsane sthitāḥ | ito 'dya nīyatāṃ sītā kuruṣva vacanaṃ mama || 45.22 ||
यदि तुम सब मेरा सम्मान करते हो और मेरी आज्ञा में रहना चाहते हो, तो आज ही सीता को यहाँ से ले जाया जाए; मेरी बात मानो।
श्लोक 23 (uttara.45.23)
पूर्वमुक्तो ऽहमनया गङ्गातीरे महाश्रमान् । पश्येयमिति तस्याश्च कामः संवर्त्यतामयम् ।। 45.23 ।।
pūrvamukto 'hamanayā gaṅgātīre mahāśramān | paśyeyamiti tasyāśca kāmaḥ saṃvartyatāmayam || 45.23 ||
मुझसे पहले उन्होंने ही कहा था, 'मैं गंगा के तट पर स्थित महान् आश्रमों को देखना चाहती हूँ' - अब उनकी वही इच्छा पूर्ण कर दी जाए।"
श्लोक 24 (uttara.45.24)
एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थो बाष्पेण पिहिताननः । प्रविवेश स धर्मात्मा भ्रातृभिः परिवारितः ।। 45.24 ।।
evamuktvā tu kākutstho bāṣpeṇa pihitānanaḥ | praviveśa sa dharmātmā bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ || 45.24 ||
यह कहकर काकुत्स्थ, अश्रुओं से ढके हुए मुख वाले, वे धर्मात्मा राम, अपने भाइयों से घिरे हुए, भीतर चले गए,
श्लोक 25 (uttara.45.25)
शोकसंलग्नहृदयो निशश्वास यथा द्विपः ।। 45.25 ।।
śokasaṃlagnahṛdayo niśaśvāsa yathā dvipaḥ || 45.25 ||
उनका हृदय शोक से जकड़ा हुआ था, और वे हाथी की भाँति गहरी साँसें ले रहे थे।