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उत्तरकाण्ड · सर्ग 51

दुर्वासा की भविष्यवाणी

सर्ग 50सर्ग-सूचीसर्ग 52

श्लोक 1 (uttara.51.1)

तथा सञ्चोदितः सूतो लक्ष्मणेन महात्मना । तद्वाक्यमृषिणा प्रोक्तं व्याहर्तुमुपचक्रमे ।। 51.1 ।।

tathā sañcoditaḥ sūto lakṣmaṇena mahātmanā | tadvākyamṛṣiṇā proktaṃ vyāhartumupacakrame || 51.1 ||

इस प्रकार महात्मा लक्ष्मण द्वारा प्रेरित होकर सूत, ऋषि (दुर्वासा) द्वारा कहे गए उस वचन को कहने लगा।

श्लोक 2 (uttara.51.2)

पुरा नाम्ना हि दुर्वासा अत्रेः पुत्रो महामुनिः । वसिष्ठस्याश्रमे पुण्ये वार्षिक्यं समुवास ह ।। 51.2 ।।

purā nāmnā hi durvāsā atreḥ putro mahāmuniḥ | vasiṣṭhasyāśrame puṇye vārṣikyaṃ samuvāsa ha || 51.2 ||

पूर्वकाल में दुर्वासा नाम के अत्रि-पुत्र महामुनि ने वसिष्ठ के पुण्य आश्रम में वर्षा ऋतु का निवास किया था।

श्लोक 3 (uttara.51.3)

तमाश्रमं महातेजाः पिता ते सुमहायशाः । पुरोहितं महात्मानं दिदृक्षुरगमस्त्वयम् ।। 51.3 ।।

tamāśramaṃ mahātejāḥ pitā te sumahāyaśāḥ | purohitaṃ mahātmānaṃ didṛkṣuragamastvayam || 51.3 ||

उस आश्रम में, अपने पुरोहित उस महात्मा को देखने की इच्छा से, तुम्हारे अत्यंत यशस्वी और महातेजस्वी पिता स्वयं गए।

श्लोक 4 (uttara.51.4)

स दृष्ट्वा सूर्यसङ्काशं ज्वलन्तमिव तेजसा । उपविष्टं वसिष्ठस्य सव्यपार्श्वे महामुनिम् ।। 51.4 ।।

sa dṛṣṭvā sūryasaṅkāśaṃ jvalantamiva tejasā | upaviṣṭaṃ vasiṣṭhasya savyapārśve mahāmunim || 51.4 ||

उसने सूर्य के समान, मानो तेज से जलते हुए, उस महामुनि को वसिष्ठ के बायीं ओर बैठा देखा।

श्लोक 5 (uttara.51.5)

तौ मुनी तापसश्रेष्ठौ विनीतो ह्यभिवादयत् । स ताभ्यां पूजितो राजा स्वागतेनासनेन च । पाद्येन फलमूलैश्च उवास मुनिभिः सह ।। 51.5 ।।

tau munī tāpasaśreṣṭhau vinīto hyabhivādayat | sa tābhyāṃ pūjito rājā svāgatenāsanena ca | pādyena phalamūlaiśca uvāsa munibhiḥ saha || 51.5 ||

विनम्र होकर उसने उन दोनों तपस्वि-श्रेष्ठ मुनियों को प्रणाम किया। उन दोनों ने उस राजा का स्वागत-वचन, आसन, पाद्य (पैर धोने का जल) तथा फल-मूल से सत्कार किया, और वह उन मुनियों के साथ रहने लगा।

श्लोक 6 (uttara.51.6)

तेषां तत्रोपविष्टानां तास्ताः सुमधुराः कथाः । बभूवुः परमर्षीणां मध्यादित्यगते ऽहनि ।। 51.6 ।।

teṣāṃ tatropaviṣṭānāṃ tāstāḥ sumadhurāḥ kathāḥ | babhūvuḥ paramarṣīṇāṃ madhyādityagate 'hani || 51.6 ||

वहाँ बैठे हुए उन महर्षियों की, जब सूर्य दिन के मध्य में पहुँचा था, अनेक प्रकार की मधुर कथाएँ होने लगीं।

श्लोक 7 (uttara.51.7)

ततः कथायां कस्याञ्चित्प्राञ्जलिः प्रग्रहो नृपः । उवाच तं महात्मानमत्रेः पुत्रं तपोधनम् ।। 51.7 ।।

tataḥ kathāyāṃ kasyāñcitprāñjaliḥ pragraho nṛpaḥ | uvāca taṃ mahātmānamatreḥ putraṃ tapodhanam || 51.7 ||

तत्पश्चात् किसी कथा के प्रसंग में, हाथ जोड़कर विनम्र हुए राजा ने उन महात्मा, अत्रि-पुत्र, तपोधन मुनि से यह कहा।

श्लोक 8 (uttara.51.8)

भगवन्किं प्रमाणेन मम वंशो भविष्यति । किमायुश्च हि मे रामः पुत्राश्चान्ये किमायुषः ।। 51.8 ।।

bhagavankiṃ pramāṇena mama vaṃśo bhaviṣyati | kimāyuśca hi me rāmaḥ putrāścānye kimāyuṣaḥ || 51.8 ||

"हे भगवन्! किस प्रमाण तक मेरा वंश चलेगा? मेरा पुत्र राम कितनी आयु का होगा, और मेरे अन्य पुत्र कितनी आयु के होंगे?

श्लोक 9 (uttara.51.9)

रामस्य च सुता ये स्युस्तेषामायुः कियद्भवेत् । काम्यया भगवन्बूहि वंशस्यास्य गतिं मम ।। 51.9 ।।

rāmasya ca sutā ye syusteṣāmāyuḥ kiyadbhavet | kāmyayā bhagavanbrūhi vaṃśasyāsya gatiṃ mama || 51.9 ||

और राम के जो पुत्र होंगे, उनकी आयु कितनी होगी? हे भगवन्! कृपापूर्वक मुझे अपने इस वंश की गति बताइए।"

श्लोक 10 (uttara.51.10)

तच्छ्रुत्वा व्याहृतं वाक्यं राज्ञो दशरथस्य च । दुर्वासाः सुमहातेजा व्याहर्तुमुपचक्रमे ।। 51.10 ।।

tacchrutvā vyāhṛtaṃ vākyaṃ rājño daśarathasya ca | durvāsāḥ sumahātejā vyāhartumupacakrame || 51.10 ||

राजा दशरथ के इस प्रकार कहे गए वचन को सुनकर, महातेजस्वी दुर्वासा यह कहने लगे।

श्लोक 11 (uttara.51.11)

शृणु राजन्पुरावृत्तं तदा देवासुरे युधि । दैत्याः सुरैर्भर्त्स्यमाना भृगुपत्नीं समाश्रिताः ।। 51.11 ।।

śṛṇu rājanpurāvṛttaṃ tadā devāsure yudhi | daityāḥ surairbhartsyamānā bhṛgupatnīṃ samāśritāḥ || 51.11 ||

"हे राजन्! सुनो, पूर्वकाल की एक घटना - देवासुर संग्राम में, देवों द्वारा त्रस्त किए गए दैत्यों ने भृगु की पत्नी की शरण ली थी।

श्लोक 12 (uttara.51.12)

तया दत्ताभयास्तत्र न्यवसन्नभयास्तदा ।। 51.12 ।।

tayā dattābhayāstatra nyavasannabhayāstadā || 51.12 ||

उसके द्वारा अभयदान दिए जाने पर, वे वहाँ निर्भय होकर रहने लगे।

श्लोक 13 (uttara.51.13)

तया परिगृहीतांस्तान्दृष्ट्वा क्रुद्धः सुरेश्वरः । चक्रेण शितधारेण भृगुपत्न्याः शिरो ऽहरत् ।। 51.13 ।।

tayā parigṛhītāṃstāndṛṣṭvā kruddhaḥ sureśvaraḥ | cakreṇa śitadhāreṇa bhṛgupatnyāḥ śiro 'harat || 51.13 ||

उनको उसके द्वारा शरण दिए जाने को देखकर क्रुद्ध हुए देवेश्वर (विष्णु) ने तीक्ष्ण धार वाले चक्र से भृगु की पत्नी का सिर काट डाला।

श्लोक 14 (uttara.51.14)

ततस्तां निहतां दृष्ट्वा पत्नीं भृगुकुलोद्वहः । शशाप सहसा क्रुद्धो विष्णुं रिपुकुलार्दनम् ।। 51.14 ।।

tatastāṃ nihatāṃ dṛṣṭvā patnīṃ bhṛgukulodvahaḥ | śaśāpa sahasā kruddho viṣṇuṃ ripukulārdanam || 51.14 ||

तत्पश्चात् अपनी उस मारी गई पत्नी को देखकर, भृगुकुल के उद्धारक (भृगु) ने तुरंत क्रुद्ध होकर, शत्रुकुल के नाशक विष्णु को शाप दे दिया।

श्लोक 15 (uttara.51.15)

यस्मादवध्यां मे पत्नीमवधीः क्रोधमूर्च्छितः । तस्मात्त्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनार्दन ।। 51.15 ।।

yasmādavadhyāṃ me patnīmavadhīḥ krodhamūrcchitaḥ | tasmāttvaṃ mānuṣe loke janiṣyasi janārdana || 51.15 ||

"चूँकि तुमने क्रोध से मोहित होकर मेरी अवध्य पत्नी का वध कर दिया, इसलिए हे जनार्दन! तुम मनुष्य-लोक में जन्म लोगे,

श्लोक 16 (uttara.51.16)

तत्र पत्नीवियोगं त्वं प्राप्स्यसे बहुवार्षिकम् ।। 51.16 ।।

tatra patnīviyogaṃ tvaṃ prāpsyase bahuvārṣikam || 51.16 ||

और वहाँ तुम्हें अपनी पत्नी का वियोग अनेक वर्षों तक सहना पड़ेगा।"

श्लोक 17 (uttara.51.17)

शापाभिहतचेतास्स स्वात्मना भावितो ऽभवत् ।। 51.17 ।।

śāpābhihatacetāssa svātmanā bhāvito 'bhavat || 51.17 ||

उस शाप से चेतना पर आघात पाकर, वे (विष्णु) अपने आप में ही लीन हो गए।

श्लोक 18 (uttara.51.18)

अर्चयामास तं देवं भृगुः शापेन पीडितः ।। 51.18 ।।

arcayāmāsa taṃ devaṃ bhṛguḥ śāpena pīḍitaḥ || 51.18 ||

तत्पश्चात् शाप देने से स्वयं व्यथित हुए भृगु ने उस देव (विष्णु) की आराधना की।

श्लोक 19 (uttara.51.19)

तपसाराधितो देवो ह्यब्रवीद्भक्तवत्सलः । लोकानां संहितार्थं तु तं शापं ग्राह्यमुक्तवान् ।। 51.19 ।।

tapasārādhito devo hyabravīdbhaktavatsalaḥ | lokānāṃ saṃhitārthaṃ tu taṃ śāpaṃ grāhyamuktavān || 51.19 ||

उस तप से प्रसन्न हुए, भक्तवत्सल देव ने कहा कि लोकों के हित के लिए ही वह शाप ग्रहण करने योग्य है, ऐसा उन्होंने कहा।

श्लोक 20 (uttara.51.20)

इति शप्तो महातेजा भृगुणा पूर्वजन्मनि । इहागतो हि पुत्रत्वं तव पार्थिवसत्तम ।। 51.20 ।।

iti śapto mahātejā bhṛguṇā pūrvajanmani | ihāgato hi putratvaṃ tava pārthivasattama || 51.20 ||

हे राजाओं में श्रेष्ठ! इस प्रकार पूर्वजन्म में भृगु द्वारा शप्त हुए वे महातेजस्वी (विष्णु) यहाँ आकर तुम्हारे पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 21 (uttara.51.21)

राम इत्यभिविख्यातस्त्रिषु लोकेषु मानद । तत्फलं प्राप्स्यते चापि भृगुशापकृतं महत् ।। 51.21 ।।

rāma ityabhivikhyātastriṣu lokeṣu mānada | tatphalaṃ prāpsyate cāpi bhṛguśāpakṛtaṃ mahat || 51.21 ||

हे मानद! वह तीनों लोकों में 'राम' नाम से विख्यात होगा, और भृगु के शाप से उत्पन्न उस महान् फल को भी वह भोगेगा।

श्लोक 22 (uttara.51.22)

अयोध्यायाः पती रामो दीर्घकालं भविष्यति । सुखिनश्च समृद्धाश्च भविष्यन्त्यस्य ये ऽनुगाः ।। 51.22 ।।

ayodhyāyāḥ patī rāmo dīrghakālaṃ bhaviṣyati | sukhinaśca samṛddhāśca bhaviṣyantyasya ye 'nugāḥ || 51.22 ||

राम दीर्घकाल तक अयोध्या के स्वामी रहेंगे, और जो भी उनके अनुगामी होंगे, वे सब सुखी और समृद्ध होंगे।

श्लोक 23 (uttara.51.23)

दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च । रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं गमिष्यति ।। 51.23 ।।

daśa varṣasahasrāṇi daśa varṣaśatāni ca | rāmo rājyamupāsitvā brahmalokaṃ gamiṣyati || 51.23 ||

दस हज़ार वर्ष और दस सौ वर्ष तक राज्य करने के बाद राम ब्रह्मलोक को प्राप्त होंगे।

श्लोक 24 (uttara.51.24)

समृद्धैश्चाश्वमेधैश्च इष्ट्वा परमदुर्जयः । राजवंशांश्च बहुशो बहून्संस्थापयिष्यति ।। 51.24 ।।

samṛddhaiścāśvamedhaiśca iṣṭvā paramadurjayaḥ | rājavaṃśāṃśca bahuśo bahūnsaṃsthāpayiṣyati || 51.24 ||

वह सर्वथा अजेय राम भव्य अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करेंगे, और अनेक राजवंशों की भी बार-बार स्थापना करेंगे।

श्लोक 25 (uttara.51.25)

द्वौ पुत्रौ तु भविष्येते सीतायां राघवस्य तु । अन्यत्र न त्वयोध्यायां सत्यमेतन्नसंशयः ।। 51.25 ।।

dvau putrau tu bhaviṣyete sītāyāṃ rāghavasya tu | anyatra na tvayodhyāyāṃ satyametannasaṃśayaḥ || 51.25 ||

राघव के सीता से दो पुत्र होंगे, किन्तु वे अयोध्या में नहीं, अन्यत्र ही (जन्म लेंगे) - यह सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 26 (uttara.51.26)

सीतायाश्च ततः पुत्रावभिषेक्ष्यति राघवः ।। 51.26 ।।

sītāyāśca tataḥ putrāvabhiṣekṣyati rāghavaḥ || 51.26 ||

और तत्पश्चात् राघव सीता के उन दोनों पुत्रों का राज्याभिषेक करेंगे।

श्लोक 27 (uttara.51.27)

स सर्वमखिलं राज्ञो वंशस्याह गतागतम् । आख्याय सुमहातेजास्तूष्णीमासीन्महामुनिः ।। 51.27 ।।

sa sarvamakhilaṃ rājño vaṃśasyāha gatāgatam | ākhyāya sumahātejāstūṣṇīmāsīnmahāmuniḥ || 51.27 ||

राजा के वंश की सम्पूर्ण गति-अगति (भूत-भविष्य) कहकर, वह महातेजस्वी महामुनि मौन हो गए।

श्लोक 28 (uttara.51.28)

तूष्णीम्भूते तदा तस्मिन्राजा दशरथो मुनौ । अभिवाद्य महात्मानौ पुनरायात्पुरोत्तमम् ।। 51.28 ।।

tūṣṇīmbhūte tadā tasminrājā daśaratho munau | abhivādya mahātmānau punarāyātpurottamam || 51.28 ||

उस मुनि के मौन हो जाने पर, राजा दशरथ ने उन दोनों महात्माओं को प्रणाम करके पुनः उस उत्तम नगरी (अयोध्या) को लौट गए।

श्लोक 29 (uttara.51.29)

एतद्वचो मया तत्र मुनिना व्याहृतं पुरा । श्रुतं हृदि च निक्षिप्तं नान्यथा तद्भविष्यति ।। 51.29 ।।

etadvaco mayā tatra muninā vyāhṛtaṃ purā | śrutaṃ hṛdi ca nikṣiptaṃ nānyathā tadbhaviṣyati || 51.29 ||

यह वचन मुनि द्वारा तब मेरे समक्ष कहा गया था, जिसे मैंने सुनकर अपने हृदय में धारण कर रखा है; वह अन्यथा नहीं होगा।

श्लोक 30 (uttara.51.30)

एवं गते न सन्तापं कर्तुमर्हसि राघव । सीतार्थे राघवार्थे वा दृढो भव नरोत्तम ।। 51.30 ।।

evaṃ gate na santāpaṃ kartumarhasi rāghava | sītārthe rāghavārthe vā dṛḍho bhava narottama || 51.30 ||

ऐसा होने पर हे राघव! तुम्हें संताप नहीं करना चाहिए। हे नरोत्तम! चाहे सीता के लिए हो या राघव के लिए, तुम दृढ़ बने रहो।

श्लोक 31 (uttara.51.31)

श्रुत्वा तु व्याहृतं वाक्यं सूतस्य परमाद्भुतम् । प्रहर्षमतुलं लेभे साधु साध्विति चाब्रवीत् ।। 51.31 ।।

śrutvā tu vyāhṛtaṃ vākyaṃ sūtasya paramādbhutam | praharṣamatulaṃ lebhe sādhu sādhviti cābravīt || 51.31 ||

सूत के द्वारा कहे गए इस अत्यंत अद्भुत वचन को सुनकर लक्ष्मण को अतुल हर्ष हुआ, और वे "साधु-साधु" कहने लगे।

श्लोक 32 (uttara.51.32)

ततः संवदतोरेवं सूतलक्ष्मणयोः पथि । अस्तमर्के गते वासं केशिन्यां तावथोषतुः ।। 51.32 ।।

tataḥ saṃvadatorevaṃ sūtalakṣmaṇayoḥ pathi | astamarke gate vāsaṃ keśinyāṃ tāvathoṣatuḥ || 51.32 ||

इस प्रकार मार्ग में सूत और लक्ष्मण की बातचीत होते-होते सूर्य अस्त हो गया, और वे दोनों केशिनी नदी के तट पर रात्रि-निवास के लिए ठहर गए।

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