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उत्तरकाण्ड · सर्ग 54

नृग का अपने पुत्र को उपदेश

सर्ग 53सर्ग-सूचीसर्ग 55

श्लोक 1 (uttara.54.1)

रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परमार्थवित् । उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं राघवं दीप्ततेजसम् ।। 54.1 ।।

rāmasya bhāṣitaṃ śrutvā lakṣmaṇaḥ paramārthavit | uvāca prāñjalirvākyaṃ rāghavaṃ dīptatejasam || 54.1 ||

राम के इस वचन को सुनकर, परमार्थ को जानने वाले लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर, प्रज्वलित तेज वाले राघव से यह वचन कहा।

श्लोक 2 (uttara.54.2)

अल्पापराधे काकुत्स्थ द्विजाभ्यां शाप ईदृशः । महान्नृगस्य राजर्षेर्यमदण्ड इवापरः ।। 54.2 ।।

alpāparādhe kākutstha dvijābhyāṃ śāpa īdṛśaḥ | mahānnṛgasya rājarṣeryamadaṇḍa ivāparaḥ || 54.2 ||

"हे काकुत्स्थ! राजर्षि नृग के इतने छोटे से अपराध पर दोनों ब्राह्मणों द्वारा दिया गया यह इतना बड़ा शाप, मानो यमराज के दण्ड के समान ही है।

श्लोक 3 (uttara.54.3)

श्रुत्वा तु पापसंयुक्तमात्मानं पुरषर्षभ । किमुवाच नृगो राजा द्विजौ क्रोधसमन्वितौ ।। 54.3 ।।

śrutvā tu pāpasaṃyuktamātmānaṃ puruṣarṣabha | kimuvāca nṛgo rājā dvijau krodhasamanvitau || 54.3 ||

हे पुरुषर्षभ! अपने आप को पाप से युक्त हुआ सुनकर राजा नृग ने उन क्रोधित दोनों ब्राह्मणों से क्या कहा?"

श्लोक 4 (uttara.54.4)

लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राघवः पुनरब्रवीत् । शृणु सौम्य यथा पूर्वं स राजा शापविक्षतः ।। 54.4 ।।

lakṣmaṇenaivamuktastu rāghavaḥ punarabravīt | śṛṇu saumya yathā pūrvaṃ sa rājā śāpavikṣataḥ || 54.4 ||

लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर राघव फिर से कहने लगे, "हे सौम्य! सुनो, वह शाप से आहत राजा पहले किस प्रकार बोला था।

श्लोक 5 (uttara.54.5)

अथाध्वनि गतौ विप्रौ विज्ञाय स नृगस्तदा । आहूय मन्त्रिणः सर्वान्नैगमान्सपुरोधसः ।। 54.5 ।।

athādhvani gatau viprau vijñāya sa nṛgastadā | āhūya mantriṇaḥ sarvānnaigamānsapurodhasaḥ || 54.5 ||

तत्पश्चात् उन दोनों ब्राह्मणों के मार्ग में चले जाने की बात जानकर, नृग ने सब मंत्रियों को, नगरजनों को तथा पुरोहित सहित सभी को बुलवाया।

श्लोक 6 (uttara.54.6)

तानुवाच नृगो राजा सर्वाश्च प्रकृतीस्तथा । दुःखेन सुसमाविष्टः श्रूयतां मे समाहितैः ।। 54.6 ।।

tānuvāca nṛgo rājā sarvāśca prakṛtīstathā | duḥkhena susamāviṣṭaḥ śrūyatāṃ me samāhitaiḥ || 54.6 ||

राजा नृग ने, अत्यंत दुःख से आविष्ट होकर, उन सबसे तथा समस्त प्रजाजनों से कहा, "एकाग्रचित्त होकर मेरी बात सुनो।

श्लोक 7 (uttara.54.7)

नारदः पर्वतश्चैव मम दत्त्वा महद्भयम् । गतौ त्रिभुवनं भद्रौ वायुभूतावनिन्दितौ ।। 54.7 ।।

nāradaḥ parvataścaiva mama dattvā mahadbhayam | gatau tribhuvanaṃ bhadrau vāyubhūtāvanindito || 54.7 ||

नारद और पर्वत - वे दोनों भद्र, निष्पाप मुनि - मुझे महान् भय देकर, वायु के समान वेगवान् होकर तीनों लोकों में चले गए।

श्लोक 8 (uttara.54.8)

कुमारो ऽयं वसुर्नाम स देवो ऽद्याभिषिच्यताम् । श्वभ्रं च यत्सुखस्पर्शं क्रियतां शिल्पिभिर्मम । यत्राहं सङ्क्षयिष्यामि शापं ब्राह्मणनिःसृतम् ।। 54.8 ।।

kumāro 'yaṃ vasurnāma sa devo 'dyābhiṣicyatām | śvabhraṃ ca yatsukhasparśaṃ kriyatāṃ śilpibhirmama | yatrāhaṃ saṅkṣayiṣyāmi śāpaṃ brāhmaṇaniḥsṛtam || 54.8 ||

यह कुमार, जिसका नाम वसु है, वह देव-तुल्य आज ही अभिषिक्त किया जाए। और मेरे शिल्पियों द्वारा एक ऐसा सुखस्पर्श बिल बनाया जाए, जिसमें रहकर मैं ब्राह्मणों से निकले उस शाप को क्षय करूँगा।

श्लोक 9 (uttara.54.9)

वर्षघ्नमेकं श्वभ्रं तु हिमघ्नमपरं तथा । ग्रीष्मघ्नं तु सुखस्पर्शमेकं कुर्वन्तु शिल्पिनः ।। 54.9 ।।

varṣaghnamekaṃ śvabhraṃ tu himaghnamaparaṃ tathā | grīṣmaghnaṃ tu sukhasparśamekaṃ kurvantu śilpinaḥ || 54.9 ||

शिल्पी लोग एक ऐसा बिल बनाएँ जो वर्षा को रोकने वाला हो, दूसरा जो शीत को रोकने वाला हो, और एक जो ग्रीष्म को रोकने वाला, सुखस्पर्श हो।

श्लोक 10 (uttara.54.10)

फलवन्तश्च ये वृक्षाः पुष्पवत्यश्च या लताः । विरोप्यन्तां बहुविधाश्छायावन्तश्च गुल्मिनः ।। 54.10 ।।

phalavantaśca ye vṛkṣāḥ puṣpavatyaśca yā latāḥ | viropyantāṃ bahuvidhāśchāyāvantaśca gulminaḥ || 54.10 ||

फलदार वृक्ष तथा फूलों वाली लताएँ, अनेक प्रकार की छायादार झाड़ियाँ भी वहाँ रोपी जाएँ।

श्लोक 11 (uttara.54.11)

क्रियतां रमणीयं च श्वभ्राणां सर्वतोदिशम् । सुखमत्र वसिष्यामि यावत्कालस्य पर्ययः ।। 54.11 ।।

kriyatāṃ ramaṇīyaṃ ca śvabhrāṇāṃ sarvatodiśam | sukhamatra vasiṣyāmi yāvatkālasya paryayaḥ || 54.11 ||

उन बिलों के चारों ओर सब दिशाओं में इसे रमणीय बनाया जाए। जब तक काल का परिवर्तन नहीं होता, तब तक मैं यहाँ सुखपूर्वक रहूँगा।

श्लोक 12 (uttara.54.12)

पुष्पाणि च सुगन्धीनि क्रियतां तेषु नित्यशः । परिवार्य यथा मे स्युरध्यर्धं योजनं तथा ।। 54.12 ।।

puṣpāṇi ca sugandhīni kriyatāṃ teṣu nityaśaḥ | parivārya yathā me syuradhyardhaṃ yojanaṃ tathā || 54.12 ||

उनमें सदा सुगंधित पुष्प रखे जाएँ, इस प्रकार कि वे मेरे चारों ओर डेढ़ योजन तक फैले हुए हों।

श्लोक 13 (uttara.54.13)

एवं कृत्वा विधानं स सन्दिदेश वसं तदा । धर्मनित्यः प्रजाः पुत्र क्षत्रधर्मेण पालय ।। 54.13 ।।

evaṃ kṛtvā vidhānaṃ sa sandideśa vasaṃ tadā | dharmanityaḥ prajāḥ putra kṣatradharmeṇa pālaya || 54.13 ||

इस प्रकार व्यवस्था करके, उसने तब वसु को यह आदेश दिया, "हे पुत्र! सदा धर्म में स्थित रहकर, क्षत्रिय-धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करना।

श्लोक 14 (uttara.54.14)

प्रत्यक्षं ते यथा शापो द्विजाभ्यां मयि पातितः । नरश्रेष्ठ सरोषाभ्यामपराधे ऽपि तादृशे ।। 54.14 ।।

pratyakṣaṃ te yathā śāpo dvijābhyāṃ mayi pātitaḥ | naraśreṣṭha saroṣābhyāmaparādhe 'pi tādṛśe || 54.14 ||

हे नरश्रेष्ठ! तुमने अपनी आँखों से देखा है कि कैसे इतने छोटे से अपराध पर भी उन दोनों क्रोधित ब्राह्मणों ने मुझ पर यह शाप डाल दिया।

श्लोक 15 (uttara.54.15)

मा कृथास्तनुसन्तापं मत्कृते ऽपि नरर्षभ । कृतान्तः कुशलः पुत्र येनास्मि व्यसनीकृतः ।। 54.15 ।।

mā kṛthāstanusantāpaṃ matkṛte 'pi nararṣabha | kṛtāntaḥ kuśalaḥ putra yenāsmi vyasanīkṛtaḥ || 54.15 ||

हे नरर्षभ! मेरे लिए शरीर से संताप मत करना। हे पुत्र! यह तो कृतान्त (नियति) की ही कुशलता है, जिसके कारण मैं इस विपत्ति में पड़ा हूँ।

श्लोक 16 (uttara.54.16)

प्राप्तव्यान्येव प्राप्नोति गन्तव्यान्येव गच्छति । लब्धव्यान्येव लभते दुःखानि च सुखानि च ।। 54.16 ।।

prāptavyānyeva prāpnoti gantavyānyeva gacchati | labdhavyānyeva labhate duḥkhāni ca sukhāni ca || 54.16 ||

मनुष्य वही प्राप्त करता है जो उसे प्राप्त होना है, वहीं जाता है जहाँ उसे जाना है, वही पाता है जो उसे पाना है - चाहे वह दुःख हो या सुख।

श्लोक 17 (uttara.54.17)

पूर्वे जात्यन्तरे वत्स मा विषादं कुरुष्व ह ।। 54.17 ।।

pūrve jātyantare vatsa mā viṣādaṃ kuruṣva ha || 54.17 ||

यह तो पूर्व जन्म का ही फल है, हे वत्स! इसलिए विषाद मत करो।"

श्लोक 18 (uttara.54.18)

एवमुक्त्वा नृपस्तत्र सुतं राजा महायशाः । श्वभ्रं जगाम सुकृतं वासाय पुरुषर्षभ ।। 54.18 ।।

evamuktvā nṛpastatra sutaṃ rājā mahāyaśāḥ | śvabhraṃ jagāma sukṛtaṃ vāsāya puruṣarṣabha || 54.18 ||

हे पुरुषर्षभ! अपने पुत्र से इस प्रकार कहकर, वह महायशस्वी राजा वहाँ उस सुसज्जित बिल में निवास के लिए चला गया।

श्लोक 19 (uttara.54.19)

एवं प्रविश्यैव नृपस्तदानीं श्वभ्रं महारत्नविभूषितं तत् । सम्पादयामास तदा महात्मा शापं द्विजाभ्यां हि रुषा विमुक्तम् ।। 54.19 ।।

evaṃ praviśyaiva nṛpastadānīṃ śvabhraṃ mahāratnavibhūṣitaṃ tat | sampādayāmāsa tadā mahātmā śāpaṃ dvijābhyāṃ hi ruṣā vimuktam || 54.19 ||

इस प्रकार उस महारत्नों से सुशोभित बिल में प्रवेश करते ही, वह महात्मा राजा उस शाप को, जो क्रोधवश दोनों ब्राह्मणों द्वारा दिया गया था, भोगने लगा।

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