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उत्तरकाण्ड · सर्ग 55

निमि और वसिष्ठ का पारस्परिक शाप

सर्ग 54सर्ग-सूचीसर्ग 56

श्लोक 1 (uttara.55.1)

एष ते नृगशापस्य विस्तरो ऽभिहितो मया । यद्यस्ति श्रवणे श्रद्धा शृणुष्वेहापरां कथाम् ।। 55.1 ।।

eṣa te nṛgaśāpasya vistaro 'bhihito mayā | yadyasti śravaṇe śraddhā śṛṇuṣvehāparāṃ kathām || 55.1 ||

"यह मैंने तुम्हें नृग के शाप का विस्तार बताया। यदि सुनने में तुम्हारी श्रद्धा है, तो अब यहाँ एक और कथा सुनो।

श्लोक 2 (uttara.55.2)

एवमुक्तस्तु रामेण सौमित्रिः पुनरब्रवीत् । तृप्तिराश्चर्यभूतानां कथानां नास्ति मे नृप ।। 55.2 ।।

evamuktastu rāmeṇa saumitriḥ punarabravīt | tṛptirāścaryabhūtānāṃ kathānāṃ nāsti me nṛpa || 55.2 ||

राम के इस प्रकार कहने पर सौमित्र ने फिर कहा, "हे राजन्! ऐसी अद्भुत कथाओं को सुनकर मुझे कभी तृप्ति नहीं होती।"

श्लोक 3 (uttara.55.3)

लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु राम इक्ष्वाकुनन्दनः । कथां परमधर्मिष्ठां व्याहर्तुमुपचक्रमे ।। 55.3 ।।

lakṣmaṇenaivamuktastu rāma ikṣvākunandanaḥ | kathāṃ paramadharmiṣṭhāṃ vyāhartumupacakrame || 55.3 ||

लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर, इक्ष्वाकु-वंशी राम एक अत्यंत धर्मपूर्ण कथा कहने लगे।

श्लोक 4 (uttara.55.4)

आसीद्राजा निमिर्नाम इक्ष्वाकूणां महात्मनाम् । पुत्रो द्वादशमो वीर्ये धर्मे च परिनिष्ठितः ।। 55.4 ।।

āsīdrājā nimirnāma ikṣvākūṇāṃ mahātmanām | putro dvādaśamo vīrye dharme ca pariniṣṭhitaḥ || 55.4 ||

"इक्ष्वाकु वंश के महात्माओं में एक राजा हुए, जिनका नाम निमि था; वे बारहवें पुत्र थे, और पराक्रम एवं धर्म में पूर्णतः प्रतिष्ठित थे।

श्लोक 5 (uttara.55.5)

स राजा वीर्यसम्पन्नः पुरं देवपुरोपमम् । निवेशयामास तदा अभ्याशे गौतमस्य तु ।। 55.5 ।।

sa rājā vīryasampannaḥ puraṃ devapuropamam | niveśayāmāsa tadā abhyāśe gautamasya tu || 55.5 ||

उस पराक्रम-संपन्न राजा ने देवनगरी के समान एक नगर बसाया, वह भी गौतम मुनि के आश्रम के निकट।

श्लोक 6 (uttara.55.6)

पुरस्य सुकृतं नाम वैजयन्तमिति श्रुतम् । निवेशं यत्र राजर्षिर्निमिश्चक्रे महायशाः ।। 55.6 ।।

purasya sukṛtaṃ nāma vaijayantamiti śrutam | niveśaṃ yatra rājarṣirnimiścakre mahāyaśāḥ || 55.6 ||

उस नगर का सुंदर नाम 'वैजयंत' सुना जाता है, जहाँ महायशस्वी राजर्षि निमि ने अपना निवास बनाया था।

श्लोक 7 (uttara.55.7)

तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना निवेश्य सुमहापुरम् । यजेयं दीर्घसत्रेण पितुः प्रह्लादयन्मनः ।। 55.7 ।।

tasya buddhiḥ samutpannā niveśya sumahāpuram | yajeyaṃ dīrghasatreṇa pituḥ prahlādayanmanaḥ || 55.7 ||

उस विशाल नगर को बसाकर, उसके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि वह अपने पिता के मन को प्रसन्न करते हुए एक दीर्घ यज्ञ के द्वारा यज्ञ करे।

श्लोक 8 (uttara.55.8)

ततः पितरमामन्त्र्य इक्ष्वाकुं हि मनोः सुतम् । वसिष्ठं वरयामास पूर्वं ब्रह्मर्षिसत्तमम् ।। 55.8 ।।

tataḥ pitaramāmantrya ikṣvākuṃ hi manoḥ sutam | vasiṣṭhaṃ varayāmāsa pūrvaṃ brahmarṣisattamam || 55.8 ||

तत्पश्चात् अपने पिता, मनु-पुत्र इक्ष्वाकु से अनुमति लेकर, उसने सर्वप्रथम ब्रह्मर्षियों में श्रेष्ठ वसिष्ठ को पुरोहित के रूप में वरण किया।

श्लोक 9 (uttara.55.9)

अनन्तरं स राजर्षिर्निमिरिक्ष्वाकुनन्दनः । अत्रिमङ्गिरसं चैव भृगुं चैव तपोधनम् ।। 55.9 ।।

anantaraṃ sa rājarṣirnimirikṣvākunandanaḥ | atrimaṅgirasaṃ caiva bhṛguṃ caiva tapodhanam || 55.9 ||

उसके बाद उस राजर्षि निमि, इक्ष्वाकु के पुत्र ने अत्रि, अंगिरा, तथा तपोधन भृगु को भी यज्ञ में सम्मिलित होने हेतु आमंत्रित किया।

श्लोक 10 (uttara.55.10)

तमुवाच वसिष्ठस्तु निमिं राजर्षिसत्तमम् । वृतो ऽहं पूर्वमिन्द्रेण अन्तरं प्रतिपालय ।। 55.10 ।।

tamuvāca vasiṣṭhastu nimiṃ rājarṣisattamam | vṛto 'haṃ pūrvamindreṇa antaraṃ pratipālaya || 55.10 ||

वसिष्ठ ने उस राजर्षिश्रेष्ठ निमि से कहा, "मैं पहले ही इन्द्र द्वारा वरण किया जा चुका हूँ। तुम कुछ समय की प्रतीक्षा करो।"

श्लोक 11 (uttara.55.11)

अनन्तरं महाविप्रो गौतमः प्रत्यपूरयत् । वसिष्ठो ऽपि महातेजा इन्द्रयज्ञमथाकरोत् ।। 55.11 ।।

anantaraṃ mahāvipro gautamaḥ pratyapūrayat | vasiṣṭho 'pi mahātejā indrayajñamathākarot || 55.11 ||

तत्पश्चात् महाब्राह्मण गौतम ने पुरोहित का वह स्थान भर दिया, और महातेजस्वी वसिष्ठ इंद्र के यज्ञ को संपन्न करने में लग गए।

श्लोक 12 (uttara.55.12)

निमिस्तु राजा विप्रांस्तान्समानीय नराधिपः । अयजद्धिमवत्पार्श्वे स्वपुरस्य समीपतः । पञ्चवर्षसहस्राणि राजा दीक्षामुपागमत् ।। 55.12 ।।

nimistu rājā viprāṃstānsamānīya narādhipaḥ | ayajaddhimavatpārśve svapurasya samīpataḥ | pañcavarṣasahasrāṇi rājā dīkṣāmupāgamat || 55.12 ||

राजा निमि ने उन ब्राह्मणों को एकत्रित करके हिमालय के समीप, अपने नगर के निकट यज्ञ आरम्भ किया। उस राजा ने पाँच हज़ार वर्षों तक की दीक्षा ग्रहण की।

श्लोक 13 (uttara.55.13)

इन्द्रयज्ञावसाने तु वसिष्ठो भगवनृषिः । सकाशमागतो राज्ञो हौत्रं कर्तुमनिन्दितः ।। 55.13 ।।

indrayajñāvasāne tu vasiṣṭho bhagavanṛṣiḥ | sakāśamāgato rājño hautraṃ kartumaninditaḥ || 55.13 ||

इन्द्र के यज्ञ की समाप्ति पर, वह भगवान् ऋषि, निष्पाप वसिष्ठ, होता का कार्य करने के लिए राजा के पास आए।

श्लोक 14 (uttara.55.14)

तदन्तरमथापश्यद्गौतमेनाभिपूरितम् । कोपेन महताविष्टो वसिष्ठो ब्रह्मणः सुतः ।। 55.14 ।।

tadantaramathāpaśyadgautamenābhipūritam | kopena mahatāviṣṭo vasiṣṭho brahmaṇaḥ sutaḥ || 55.14 ||

तब उसने देखा कि वह स्थान गौतम द्वारा भरा जा चुका था। यह देखकर ब्रह्मा के पुत्र वसिष्ठ महान् क्रोध से आविष्ट हो गए।

श्लोक 15 (uttara.55.15)

स राज्ञो दर्शनाकाङ्क्षी मुहूर्तं समुपाविशत् । तस्मिन्नहनि राजर्षिर्निद्रया ऽपहृतो भृशम् ।। 55.15 ।।

sa rājño darśanākāṅkṣī muhūrtaṃ samupāviśat | tasminnahani rājarṣirnidrayā 'pahṛto bhṛśam || 55.15 ||

राजा से भेंट की इच्छा से वे कुछ क्षण के लिए बैठ गए। उस दिन राजर्षि निमि नींद से अत्यंत अभिभूत हो गए थे।

श्लोक 16 (uttara.55.16)

ततो मन्युर्वसिष्ठस्य प्रादुरासीन्महात्मनः । अदर्शनेन राजर्षेर्व्याहर्तुमुपचक्रमे ।। 55.16 ।।

tato manyurvasiṣṭhasya prādurāsīnmahātmanaḥ | adarśanena rājarṣervyāhartumupacakrame || 55.16 ||

तब उस महात्मा वसिष्ठ का क्रोध, राजर्षि के दर्शन न होने के कारण, प्रकट हो उठा, और वे यह कहने लगे।

श्लोक 17 (uttara.55.17)

यस्मात्त्वमन्यं वृतवान्मामवज्ञाय पार्थिव । चेतनेन विनाभूतो देहस्तव भविष्यति ।। 55.17 ।।

yasmāttvamanyaṃ vṛtavānmāmavajñāya pārthiva | cetanena vinābhūto dehastava bhaviṣyati || 55.17 ||

"हे राजन्! चूँकि तुमने मेरा अनादर करके किसी और को पुरोहित के रूप में चुन लिया है, इसलिए तुम्हारा शरीर चेतना से रहित हो जाएगा।"

श्लोक 18 (uttara.55.18)

ततः प्रबुद्धो राजर्षिः श्रुत्वा शापमुदाहृतम् । ब्रह्मयोनिमथोवाच संरम्भात् क्रोधमूर्च्छितः ।। 55.18 ।।

tataḥ prabuddho rājarṣiḥ śrutvā śāpamudāhṛtam | brahmayonimathovāca saṃrambhāt krodhamūrcchitaḥ || 55.18 ||

तब वह राजर्षि जाग उठा, और उस दिए गए शाप को सुनकर, आवेश में आकर, क्रोध से मोहित होकर, उस ब्रह्मा के वंशज वसिष्ठ से यह कहने लगा।

श्लोक 19 (uttara.55.19)

अजानतः शयानस्य क्रोधेन कलुषीकृतः । मुक्तवान्मयि शापाग्निं यमदण्डमिवापरम् ।। 55.19 ।।

ajānataḥ śayānasya krodhena kaluṣīkṛtaḥ | muktavānmayi śāpāgniṃ yamadaṇḍamivāparam || 55.19 ||

"मैं अनजान था, सो रहा था, फिर भी क्रोध से मलिन होकर तुमने मुझ पर यह शाप-अग्नि छोड़ दी, मानो यमराज का एक और दण्ड हो।

श्लोक 20 (uttara.55.20)

तस्मात्तवापि ब्रह्मर्षे चेतनेन विना कृतः । देहः सुरुचिरप्रख्यो भविष्यति न संशयः ।। 55.20 ।।

tasmāttavāpi brahmarṣe cetanena vinā kṛtaḥ | dehaḥ suruciraprakhyo bhaviṣyati na saṃśayaḥ || 55.20 ||

इसलिए हे ब्रह्मर्षे! तुम्हारा भी अत्यंत सुंदर देह चेतना से रहित हो जाएगा, इसमें कोई संशय नहीं।"

श्लोक 21 (uttara.55.21)

इति रोषवशादुभौ तदानीमन्योन्यं शपितौ नृपद्विजेन्द्रौ । सहसैव बभूवतुर्विदेहौ तत्तुल्याधिगतप्रभाववन्तौ ।। 55.21 ।।

iti roṣavaśādubhau tadānīmanyonyaṃ śapitau nṛpadvijendrau | sahasaiva babhūvaturvidehau tattulyādhigataprabhāvavantau || 55.21 ||

इस प्रकार क्रोध के वशीभूत होकर उस समय एक-दूसरे को शाप दे चुके वे राजा और ब्राह्मणश्रेष्ठ दोनों तत्काल ही विदेह (शरीर-रहित) हो गए, दोनों समान रूप से उस प्रभाव को प्राप्त हुए।

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