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उत्तरकाण्ड · सर्ग 56

वसिष्ठ का पुनर्जन्म और उर्वशी का शाप

सर्ग 55सर्ग-सूचीसर्ग 57

श्लोक 1 (uttara.56.1)

रामस्य भाषितं श्रुत्वा लक्ष्मणः परवीरहा । उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं राघवं दीप्ततेजसम् ।। 56.1 ।।

rāmasya bhāṣitaṃ śrutvā lakṣmaṇaḥ paravīrahā | uvāca prāñjalirvākyaṃ rāghavaṃ dīptatejasam || 56.1 ||

राम के वचन सुनकर, शत्रुवीरों का नाश करने वाले लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर तेजोमय राघव से यह वचन कहा।

श्लोक 2 (uttara.56.2)

निक्षिप्तदेहौ काकुत्स्थ कथं तौ द्विजपार्थिवौ । पुनर्देहेन संयोगं जग्मतुर्देवसम्मतौ ।। 56.2 ।।

nikṣiptadehau kākutstha kathaṃ tau dvijapārthivau | punardehena saṃyogaṃ jagmaturdevasammatau || 56.2 ||

"हे काकुत्स्थ! शरीर त्याग चुके वे दोनों - एक ब्राह्मण और एक राजा - देवताओं द्वारा सम्मानित होकर पुनः शरीर से किस प्रकार युक्त हुए?

श्लोक 3 (uttara.56.3)

लक्ष्मणेनैवमुक्तस्तु रामश्चेक्ष्वाकुनन्दनः । प्रत्युवाच महातेजा लक्ष्मणं पुरुषर्षभः ।। 56.3 ।।

lakṣmaṇenaivamuktastu rāmaścekṣvākunandanaḥ | pratyuvāca mahātejā lakṣmaṇaṃ puruṣarṣabhaḥ || 56.3 ||

लक्ष्मण के इस प्रकार कहने पर, इक्ष्वाकुवंश के आनंददाता, महातेजस्वी पुरुषश्रेष्ठ राम ने लक्ष्मण को उत्तर दिया।

श्लोक 4 (uttara.56.4)

तौ परस्परशापेन देहावुत्सृज्य धार्मिकौ । अभूतां नृपविप्रर्षी वायुभूतौ तपोधनौ ।। 56.4 ।।

tau parasparaśāpena dehāvutsṛjya dhārmikau | abhūtāṃ nṛpaviprarṣī vāyubhūtau tapodhanau || 56.4 ||

वे दोनों धर्मात्मा - एक राजर्षि और तपोधन विप्रर्षि - परस्पर शाप के कारण अपने शरीर त्यागकर वायुरूप हो गए।

श्लोक 5 (uttara.56.5)

अशरीरः शरीरस्य कृते ऽन्यस्य महामुनिः । वसिष्ठः सुमहातेजा जगाम पितुरन्तिकम् ।। 56.5 ।।

aśarīraḥ śarīrasya kṛte 'nyasya mahāmuniḥ | vasiṣṭhaḥ sumahātejā jagāma piturantikam || 56.5 ||

शरीरहीन होकर वह महामुनि, अत्यंत तेजस्वी वसिष्ठ, दूसरे शरीर की प्राप्ति के लिए अपने पिता (ब्रह्मा) के समीप गए।

श्लोक 6 (uttara.56.6)

सो ऽभिवाद्य ततः पादौ देवदेवस्य धर्मवित् । पितामहमथोवाच वायुभूत इदं वचः ।। 56.6 ।।

so 'bhivādya tataḥ pādau devadevasya dharmavit | pitāmahamathovāca vāyubhūta idaṃ vacaḥ || 56.6 ||

धर्मज्ञ वसिष्ठ ने देवाधिदेव के चरणों में प्रणाम करके, वायुरूप में स्थित होकर पितामह ब्रह्मा से यह वचन कहा।

श्लोक 7 (uttara.56.7)

भगवन्निमिशापेन विदेहत्वमुपागमम् । लोकनाथ महादेव अण्डजो ऽपि त्वमब्जजः ।। 56.7 ।।

bhagavannimiśāpena videhatvamupāgamam | lokanātha mahādeva aṇḍajo 'pi tvamabjajaḥ || 56.7 ||

"हे भगवन्! निमि के शाप से मैं देहरहित हो गया हूँ। हे लोकनाथ! हे महादेव! आप अण्डज होते हुए भी अब्जज (कमल से उत्पन्न) हैं।

श्लोक 8 (uttara.56.8)

सर्वेषां देहहीनानां महद्दुःखं भविष्यति । लुप्यन्ते सर्वकार्याणि हीनदेहस्य वै प्रभो । देहस्यान्यस्य सद्भावे प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। 56.8 ।।

sarveṣāṃ dehahīnānāṃ mahadduḥkhaṃ bhaviṣyati | lupyante sarvakāryāṇi hīnadehasya vai prabho | dehasyānyasya sadbhāve prasādaṃ kartumarhasi || 56.8 ||

सभी देहहीन प्राणियों को महान दुःख प्राप्त होता है; हे प्रभो! जिसका शरीर नहीं रहा उसके सभी कार्य नष्ट हो जाते हैं। अतः आप मुझे कृपा करके दूसरे शरीर की प्राप्ति कराएँ।"

श्लोक 9 (uttara.56.9)

तमुवाच ततो ब्रह्मा स्वयम्भूरमितप्रभः । मित्रावरुणजं तेजः प्रविश त्वं महायशः ।। 56.9 ।।

tamuvāca tato brahmā svayambhūramitaprabhaḥ | mitrāvaruṇajaṃ tejaḥ praviśa tvaṃ mahāyaśaḥ || 56.9 ||

तब स्वयम्भू, अमितप्रभावशाली ब्रह्मा ने उनसे कहा - "हे महायशस्वी! तुम मित्र और वरुण से उत्पन्न तेज में प्रवेश करो।

श्लोक 10 (uttara.56.10)

अयोनिजस्त्वं भविता तत्रापि द्विजसत्तम । धर्मेण महता युक्तः पुनरेष्यसि मे वशम् ।। 56.10 ।।

ayonijastvaṃ bhavitā tatrāpi dvijasattama | dharmeṇa mahatā yuktaḥ punareṣyasi me vaśam || 56.10 ||

हे द्विजश्रेष्ठ! वहाँ भी तुम अयोनिज (बिना गर्भ के) उत्पन्न होगे; महान धर्म से युक्त होकर पुनः मेरे अधीन आ जाओगे।"

श्लोक 11 (uttara.56.11)

एवमुक्तस्तु देवेन चाभिवाद्य प्रदक्षिणम् । कृत्वा पितामहं तूर्णं प्रययौ वरुणालयम् ।। 56.11 ।।

evamuktastu devena cābhivādya pradakṣiṇam | kṛtvā pitāmahaṃ tūrṇaṃ prayayau varuṇālayam || 56.11 ||

देवता (ब्रह्मा) द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, पितामह को प्रणाम और प्रदक्षिणा करके, वे तुरंत वरुण के धाम को गए।

श्लोक 12 (uttara.56.12)

तमेव कालं मित्रो ऽपि वरुणत्वमकारयत् । क्षीरोदेन सहोपेतः पूज्यमानः सुरोत्तमैः ।। 56.12 ।।

tameva kālaṃ mitro 'pi varuṇatvamakārayat | kṣīrodena sahopetaḥ pūjyamānaḥ surottamaiḥ || 56.12 ||

उसी समय मित्र भी वरुण-रूप धारण कर रहे थे, क्षीरोद (क्षीरसागर) के सहित श्रेष्ठ देवताओं द्वारा पूजित होते हुए।

श्लोक 13 (uttara.56.13)

एतस्मिन्नेव काले तु उर्वशी परमाप्सराः । यदृच्छया तमुद्देशमाययौ सखिभिर्वृता ।। 56.13 ।।

etasminneva kāle tu urvaśī paramāpsarāḥ | yadṛcchayā tamuddeśamāyayau sakhibhirvṛtā || 56.13 ||

इसी समय परम अप्सरा उर्वशी अपनी सखियों से घिरी हुई, संयोगवश उस स्थान पर आ पहुँची।

श्लोक 14 (uttara.56.14)

तां दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां क्रीडन्तीं वरुणालये । आविशत्परमो हर्षो वरुणं चोर्वशीकृते ।। 56.14 ।।

tāṃ dṛṣṭvā rūpasampannāṃ krīḍantīṃ varuṇālaye | āviśatparamo harṣo varuṇaṃ corvaśīkṛte || 56.14 ||

वरुण-धाम में क्रीड़ा करती हुई उस रूपसम्पन्न उर्वशी को देखकर, वरुण के हृदय में उर्वशी के प्रति परम हर्ष उत्पन्न हुआ।

श्लोक 15 (uttara.56.15)

स तां पद्मपलाशाक्षीं पूर्णचन्द्रनिभाननाम् । वरुणो वरयामास मैथुनायाप्सरोवराम् ।। 56.15 ।।

sa tāṃ padmapalāśākṣīṃ pūrṇacandranibhānanām | varuṇo varayāmāsa maithunāyāpsarovarām || 56.15 ||

वरुण ने उस कमलदल-नयनी, पूर्णचंद्र के समान मुखवाली, अप्सराओं में श्रेष्ठ उर्वशी को समागम के लिए वरण करना चाहा।

श्लोक 16 (uttara.56.16)

प्रत्युवाच ततः सा तु वरुणं प्राञ्जलिः स्थिता । मित्रेणाहं वृता साक्षात्पूर्वमेव सुरेश्वर ।। 56.16 ।।

pratyuvāca tataḥ sā tu varuṇaṃ prāñjaliḥ sthitā | mitreṇāhaṃ vṛtā sākṣātpūrvameva sureśvara || 56.16 ||

तब वह हाथ जोड़कर खड़ी हुई उर्वशी ने वरुण को उत्तर दिया - "हे सुरेश्वर! मैं इससे पहले ही साक्षात् मित्र द्वारा वरण की जा चुकी हूँ।"

श्लोक 17 (uttara.56.17)

वरुणस्त्वब्रवीद्वाक्यं कन्दर्पशरपीडितः । इदं तेजः समुत्स्रक्ष्ये कुम्भे ऽस्मिन्देवनिर्मिते ।। 56.17 ।।

varuṇastvabravīdvākyaṃ kandarpaśarapīḍitaḥ | idaṃ tejaḥ samutsrakṣye kumbhe 'smindevanirmite || 56.17 ||

किन्तु कामदेव के बाणों से पीड़ित वरुण ने यह वचन कहा - "मैं अपना यह तेज इस देवनिर्मित कुंभ में छोड़ दूँगा।

श्लोक 18 (uttara.56.18)

एवमुत्सृज्य सुश्रोणि त्वय्यहं वरवर्णिनि । कृतकामो भविष्यामि यदि नेच्छसि सङ्गमम् ।। 56.18 ।।

evamutsṛjya suśroṇi tvayyahaṃ varavarṇini | kṛtakāmo bhaviṣyāmi yadi necchasi saṅgamam || 56.18 ||

हे सुश्रोणि! हे वरवर्णिनि! इस प्रकार तेज छोड़कर, यदि तुम संगम नहीं चाहती हो तो भी, मैं इस प्रकार अपनी कामना पूर्ण मान लूँगा।"

श्लोक 19 (uttara.56.19)

तस्य तल्लोकपालस्य वरुणस्य सुभाषितम् । उर्वशी परमप्रीता श्रुत्वा वाक्यमुवाच ह ।। 56.19 ।।

tasya tallokapālasya varuṇasya subhāṣitam | urvaśī paramaprītā śrutvā vākyamuvāca ha || 56.19 ||

उस लोकपाल वरुण के उस सुन्दर वचन को सुनकर, अत्यंत प्रसन्न हुई उर्वशी ने यह वचन कहा।

श्लोक 20 (uttara.56.20)

काममेतद्भवत्वेवं हृदयं मे त्वयि स्थितम् । भावश्चाप्यधिकस्तुभ्यं देहो मित्रस्य तु प्रभो ।। 56.20 ।।

kāmametadbhavatvevaṃ hṛdayaṃ me tvayi sthitam | bhāvaścāpyadhikastubhyaṃ deho mitrasya tu prabho || 56.20 ||

"हे प्रभो! तुम्हारी इच्छा के अनुसार ऐसा ही हो; मेरा हृदय तुम में ही स्थित है, और तुम्हारे प्रति मेरा भाव भी अधिक है - किन्तु मेरा शरीर मित्र का है।"

श्लोक 21 (uttara.56.21)

उर्वश्या एवमुक्तस्तु रेतस्तन्महदद्भुतम् । ज्वलदग्निशिखाप्रख्यं तस्मिन्कुम्भे ह्यपासृजत् ।। 56.21 ।।

urvaśyā evamuktastu retastanmahadadbhutam | jvaladagniśikhāprakhyaṃ tasminkumbhe hyapāsṛjat || 56.21 ||

उर्वशी के इस प्रकार कहने पर, वरुण ने प्रज्वलित अग्निशिखा के समान उस महान अद्भुत तेज को उस कुंभ में छोड़ दिया।

श्लोक 22 (uttara.56.22)

उर्वशी त्वगमत्तत्र मित्रो वै यत्र देवता । तां तु मित्रः सुसङ्क्रम्य उर्वशीमिदमब्रवीत् ।। 56.22 ।।

urvaśī tvagamattatra mitro vai yatra devatā | tāṃ tu mitraḥ susaṅkramya urvaśīmidamabravīt || 56.22 ||

उर्वशी तब वहाँ गई जहाँ देवता मित्र थे। तब मित्र ने उर्वशी के निकट जाकर उससे यह कहा।

श्लोक 23 (uttara.56.23)

मया निमन्त्रिता पूर्वं कस्मात्त्वमवसर्जिता । पतिमन्यं वृतवती तस्मात्त्वं दुष्टचारिणी ।। 56.23 ।।

mayā nimantritā pūrvaṃ kasmāttvamavasarjitā | patimanyaṃ vṛtavatī tasmāttvaṃ duṣṭacāriṇī || 56.23 ||

"मैंने पहले तुम्हें आमंत्रित किया था, फिर तुम क्यों मुक्त हो गई? तुमने दूसरे पति का वरण किया, इसलिए तुम दुराचारिणी हो।

श्लोक 24 (uttara.56.24)

अनेन दुष्कृतेन त्वं मत्क्रोधकलुषीकृता । मनुष्यलोकमास्थाय कञ्चित्कालं निवत्स्यसि ।। 56.24 ।।

anena duṣkṛtena tvaṃ matkrodhakaluṣīkṛtā | manuṣyalokamāsthāya kañcitkālaṃ nivatsyasi || 56.24 ||

इस दुष्कृत्य के कारण मेरे क्रोध से कलुषित होकर तुम मनुष्यलोक में जाकर कुछ काल तक निवास करोगी।

श्लोक 25 (uttara.56.25)

बुधस्य पुत्रो राजर्षिः काशीराजः पुरूरवाः । तमद्य गच्छ दुर्बुद्धे स ते भर्ता भविष्यति ।। 56.25 ।।

budhasya putro rājarṣiḥ kāśīrājaḥ purūravāḥ | tamadya gaccha durbuddhe sa te bhartā bhaviṣyati || 56.25 ||

बुध का पुत्र राजर्षि पुरूरवा, जो काशिराज है - हे दुर्बुद्धे! अब तुम उसके पास जाओ; वही तुम्हारा पति होगा।"

श्लोक 26 (uttara.56.26)

ततः सा शापदोषेण पुरूरवसमभ्यगात् । प्रतियाते पुरूरवं बुधस्यात्मजमौरसम् ।। 56.26 ।।

tataḥ sā śāpadoṣeṇa purūravasamabhyagāt | pratiyāte purūravaṃ budhasyātmajamaurasam || 56.26 ||

तत्पश्चात् उस शाप के दोष से वह पुरूरवा के पास गई; वह बुध के औरस पुत्र पुरूरवा के समक्ष उपस्थित हुई।

श्लोक 27 (uttara.56.27)

तस्य जज्ञे ततः श्रीमानायुः पुत्रो महाबलः । नहुषो यस्य पुत्रस्तु बभूवेन्द्रसमद्युतिः ।। 56.27 ।।

tasya jajñe tataḥ śrīmānāyuḥ putro mahābalaḥ | nahuṣo yasya putrastu babhūvendrasamadyutiḥ || 56.27 ||

उससे तेजस्वी, महाबली पुत्र आयु उत्पन्न हुआ; उसका पुत्र नहुष हुआ, जो इंद्र के समान तेजस्वी था।

श्लोक 28 (uttara.56.28)

वज्रमुत्सृज्य वृत्राय भ्रान्ते ऽथ त्रिदिवेश्वरे । शतं वर्षसहस्राणि येनेन्द्रत्वं प्रशासितम् ।। 56.28 ।।

vajramutsṛjya vṛtrāya bhrānte 'tha tridiveśvare | śataṃ varṣasahasrāṇi yenendratvaṃ praśāsitam || 56.28 ||

वृत्रासुर पर वज्र चलाकर त्रिदिवेश्वर इंद्र के भ्रमण करते रहने पर, नहुष ने ही एक लाख वर्षों तक इंद्रपद का शासन किया।

श्लोक 29 (uttara.56.29)

सा तेन शापेन जगाम भूमिं तदोर्वशी चारुदती सुनेत्रा । बहूनि वर्षाण्यवसच्च सुभ्रूः शापक्षयादिन्द्रसदो ययौ च ।। 56.29 ।।

sā tena śāpena jagāma bhūmiṃ tadorvaśī cārudatī sunetrā | bahūni varṣāṇyavasacca subhrūḥ śāpakṣayādindrasado yayau ca || 56.29 ||

उस शाप के कारण सुंदर दाँतों वाली, सुनयना उर्वशी पृथ्वी पर गई; वह सुभ्रू अनेक वर्षों तक वहाँ निवास करती रही, और शाप की समाप्ति पर पुनः इंद्रलोक को चली गई।

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