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उत्तरकाण्ड · सर्ग 60

यमुना-तट के ऋषियों की राम से प्रार्थना

सर्ग 59सर्ग-सूचीसर्ग 61

श्लोक 1 (uttara.60.1)

तयोः संवदतोरेवं रामलक्ष्मणयोस्तदा । वासन्तिकी निशा प्राप्ता न शीता न च घर्मदा ।। 60.1 ।।

tayoḥ saṃvadatorevaṃ rāmalakṣmaṇayostadā | vāsantikī niśā prāptā na śītā na ca gharmadā || 60.1 ||

राम और लक्ष्मण के इस प्रकार वार्तालाप करते रहने पर, वह वासंती रात्रि, न शीत और न उष्ण, इस प्रकार बीत गई।

श्लोक 2 (uttara.60.2)

ततः प्रभाते विमले कृतपौर्वाह्णिकक्रियः । अभिचक्राम काकुत्स्थो दर्शनं पौरकार्यवित् ।। 60.2 ।।

tataḥ prabhāte vimale kṛtapaurvāhṇikakriyaḥ | abhicakrāma kākutstho darśanaṃ paurakāryavit || 60.2 ||

तत्पश्चात् निर्मल प्रभात में पूर्वाह्न की क्रियाएँ पूर्ण करके, नगरजनों के कार्यों को जानने वाले काकुत्स्थ राम दर्शन देने के लिए आए।

श्लोक 3 (uttara.60.3)

ततः सुमन्त्रस्त्वागम्य राघवं वाक्यमब्रवीत् । एते प्रतिहता राजन्द्वारि तिष्ठन्ति तापसाः ।। 60.3 ।।

tataḥ sumantrastvāgamya rāghavaṃ vākyamabravīt | ete pratihatā rājandvāri tiṣṭhanti tāpasāḥ || 60.3 ||

तब सुमंत्र ने आकर राघव से यह वचन कहा - "हे राजन्! ये तपस्वी द्वार पर रोके गए खड़े हैं।

श्लोक 4 (uttara.60.4)

भार्गवच्यवनं चैव पुरस्कृत्य महर्षयः । दर्शनं ते महाराज्ञश्चोदयन्ति कृतत्वराः । प्रीयमाणा नरव्याघ्र यमुनातीरवासिनः ।। 60.4 ।।

bhārgavacyavanaṃ caiva puraskṛtya maharṣayaḥ | darśanaṃ te mahārājñaścodayanti kṛtatvarāḥ | prīyamāṇā naravyāghra yamunātīravāsinaḥ || 60.4 ||

हे महाराज! भार्गव च्यवन को आगे करके ये महर्षि शीघ्रतापूर्वक आपके दर्शन के लिए आग्रह कर रहे हैं। हे नरव्याघ्र! ये यमुना तट के निवासी प्रसन्नचित्त तपस्वी हैं।"

श्लोक 5 (uttara.60.5)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा रामः प्रोवाच धर्मवित् । प्रवेश्यन्तां महाभागा भार्गवप्रमुखा द्विजाः ।। 60.5 ।।

tasya tadvacanaṃ śrutvā rāmaḥ provāca dharmavit | praveśyantāṃ mahābhāgā bhārgavapramukhā dvijāḥ || 60.5 ||

उसका यह वचन सुनकर, धर्मज्ञ राम ने कहा - "भार्गव के नेतृत्व में उन महाभाग ब्राह्मणों को अंदर प्रवेश कराया जाए।"

श्लोक 6 (uttara.60.6)

राज्ञस्त्वाज्ञां पुरस्कृत्य द्वाःस्थो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः । प्रवेशयामास तदा तापसान्सुदुरासदान् ।। 60.6 ।।

rājñastvājñāṃ puraskṛtya dvāḥstho mūrdhni kṛtāñjaliḥ | praveśayāmāsa tadā tāpasānsudurāsadān || 60.6 ||

राजा की आज्ञा को शिरोधार्य करके, द्वारपाल ने सिर पर हाथ जोड़कर, उन दुर्धर्ष तेजस्वी तपस्वियों को तब प्रवेश कराया।

श्लोक 7 (uttara.60.7)

शतं समधिकं तत्र दीप्यमानं स्वतेजसा । प्रविष्टं राजभवनं तापसानां महात्मनाम् ।। 60.7 ।।

śataṃ samadhikaṃ tatra dīpyamānaṃ svatejasā | praviṣṭaṃ rājabhavanaṃ tāpasānāṃ mahātmanām || 60.7 ||

उस समय सौ से अधिक महात्मा तपस्वी, अपने तेज से दीप्त होते हुए, उस राजभवन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 8 (uttara.60.8)

ते द्विजाः पूर्णकलशैः सर्वतीर्थाम्बुसत्कृतैः । गृहीत्वा फलमूलं च रामस्याभ्याहरन्बहु ।। 60.8 ।।

te dvijāḥ pūrṇakalaśaiḥ sarvatīrthāmbusatkṛtaiḥ | gṛhītvā phalamūlaṃ ca rāmasyābhyāharanbahu || 60.8 ||

वे ब्राह्मण सभी तीर्थों के जल से युक्त परिपूर्ण कलश और फल-मूल लेकर, राम के लिए बहुत कुछ भेंट लाए।

श्लोक 9 (uttara.60.9)

प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं रामः प्रीतिपुरस्कृतः । तीर्थोदकानि सर्वाणि फलानि विविधानि च ।। 60.9 ।।

pratigṛhya tu tatsarvaṃ rāmaḥ prītipuraskṛtaḥ | tīrthodakāni sarvāṇi phalāni vividhāni ca || 60.9 ||

राम ने प्रसन्नतापूर्वक वह सब - तीर्थों का समस्त जल और नाना प्रकार के फल - ग्रहण करके,

श्लोक 10 (uttara.60.10)

उवाच च महाबाहुः सर्वानेव महामुनीन् । इमान्यासनमुख्यानि यथार्हमुपविश्यताम् ।। 60.10 ।।

uvāca ca mahābāhuḥ sarvāneva mahāmunīn | imānyāsanamukhyāni yathārhamupaviśyatām || 60.10 ||

उन सभी महामुनियों से यह कहा - "इन प्रमुख आसनों पर यथायोग्य विराजें।"

श्लोक 11 (uttara.60.11)

रामस्य भाषितं श्रुत्वा सर्व एव महर्षयः । बृसीषु रुचिराख्यासु निषेदुः काञ्चनीषु ते ।। 60.11 ।।

rāmasya bhāṣitaṃ śrutvā sarva eva maharṣayaḥ | bṛsīṣu rucirākhyāsu niṣeduḥ kāñcanīṣu te || 60.11 ||

राम का यह वचन सुनकर, वे सभी महर्षि उन सुंदर स्वर्णिम आसनों पर विराजमान हुए।

श्लोक 12 (uttara.60.12)

उपविष्टानृषींस्तत्र दृष्ट्वा परपुरञ्जयः । प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ।। 60.12 ।।

upaviṣṭānṛṣīṃstatra dṛṣṭvā parapurañjayaḥ | prayataḥ prāñjalirbhūtvā rāghavo vākyamabravīt || 60.12 ||

वहाँ बैठे हुए ऋषियों को देखकर, शत्रुनगर-विजेता राघव ने संयमपूर्वक हाथ जोड़कर यह वचन कहा।

श्लोक 13 (uttara.60.13)

किमागमनकार्यं वः किं करोमि समाहितः । आज्ञाप्यो ऽहं महर्षीणां सर्वकामकरः सुखम् ।। 60.13 ।।

kimāgamanakāryaṃ vaḥ kiṃ karomi samāhitaḥ | ājñāpyo 'haṃ maharṣīṇāṃ sarvakāmakaraḥ sukham || 60.13 ||

"आपके आगमन का क्या प्रयोजन है? मैं सावधानी से क्या करूँ? मैं महर्षियों की आज्ञा का पालक हूँ, जो सुखपूर्वक उनकी सब इच्छाएँ पूर्ण करता है।

श्लोक 14 (uttara.60.14)

इदं राज्यं च सकलं जीवितं च हृदि स्थितम् । सर्वमेतद्द्विजार्थं मे सत्यमेतद्ब्रवीमि वः ।। 60.14 ।।

idaṃ rājyaṃ ca sakalaṃ jīvitaṃ ca hṛdi sthitam | sarvametaddvijārthaṃ me satyametadbravīmi vaḥ || 60.14 ||

यह समस्त राज्य और यह हृदय में स्थित प्राण भी - यह सब मेरा द्विजों के लिए ही है। मैं आपसे यह सत्य कह रहा हूँ।"

श्लोक 15 (uttara.60.15)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा साधुकारो महानभूत् । ऋषीणामुग्रतपसां यमुनातीरवासिनाम् ।। 60.15 ।।

tasya tadvacanaṃ śrutvā sādhukāro mahānabhūt | ṛṣīṇāmugratapasāṃ yamunātīravāsinām || 60.15 ||

उसका यह वचन सुनकर, यमुना तट के निवासी उग्र तपस्वी ऋषियों में महान साधुवाद हुआ।

श्लोक 16 (uttara.60.16)

ऊचुश्च ते महात्मानो हर्षेण महता वृताः । उपपन्नं नरश्रेष्ठ तवैव भुवि नान्यतः ।। 60.16 ।।

ūcuśca te mahātmāno harṣeṇa mahatā vṛtāḥ | upapannaṃ naraśreṣṭha tavaiva bhuvi nānyataḥ || 60.16 ||

और वे महात्मा अत्यंत हर्ष से भरकर बोले - "हे नरश्रेष्ठ! यह तो पृथ्वी पर केवल आप में ही संभव है, अन्य किसी में नहीं।

श्लोक 17 (uttara.60.17)

बहवः पार्थिवा राजन्नतिक्रान्ता महाबलाः । कार्यस्य गौरवं मत्वा प्रतिज्ञां नाभ्यरोचयन् ।। 60.17 ।।

bahavaḥ pārthivā rājannatikrāntā mahābalāḥ | kāryasya gauravaṃ matvā pratijñāṃ nābhyarocayan || 60.17 ||

हे राजन्! अनेक महाबली राजा हो चुके हैं, जिन्होंने कार्य की गुरुता समझकर यह प्रतिज्ञा करना स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 18 (uttara.60.18)

त्वया पुनर्ब्राह्मणगौरवादियं कृता प्रतिज्ञा ह्यनवेक्ष्य कारणम् । ततश्च कर्ता ह्यसि नात्र संशयो महाभयात् त्रातुमृषींस्त्वमर्हसि ।। 60.18 ।।

tvayā punarbrāhmaṇagauravādiyaṃ kṛtā pratijñā hyanavekṣya kāraṇam | tataśca kartā hyasi nātra saṃśayo mahābhayāt trātumṛṣīṃstvamarhasi || 60.18 ||

परन्तु आपने ब्राह्मणों के गौरव के कारण, कारण पर विचार किए बिना ही यह प्रतिज्ञा कर ली है; अतः निःसंदेह आप ही इसे पूर्ण करने वाले हैं - आपको महान भय से ऋषियों की रक्षा करनी चाहिए।"

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