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उत्तरकाण्ड · सर्ग 63

शत्रुघ्न का राज्याभिषेक

सर्ग 62सर्ग-सूचीसर्ग 64

श्लोक 1 (uttara.63.1)

एवमुक्तस्तु रामेण परां व्रीडामुपागमत् । शत्रुघ्नो वीर्यसम्पन्नो मन्दं मन्दमुवाच ह ।। 63.1 ।।

evamuktastu rāmeṇa parāṃ vrīḍāmupāgamat | śatrughno vīryasampanno mandaṃ mandamuvāca ha || 63.1 ||

राम के ऐसा कहने पर पराक्रमी शत्रुघ्न अत्यन्त लज्जित हो गए और धीरे-धीरे बोले।

श्लोक 2 (uttara.63.2)

अधर्मं विद्म काकुत्स्थ ह्यस्मिन्नर्थे नरेश्वर । कथं तिष्ठत्सु ज्येष्ठेषु कनीयानभिषिच्यते ।। 63.2 ।।

adharmaṃ vidma kākutstha hyasminnarthe nareśvara | kathaṃ tiṣṭhatsu jyeṣṭheṣu kanīyānabhiṣicyate || 63.2 ||

"हे काकुत्स्थ, हे नरेश्वर! हम इस बात में अधर्म जानते हैं — बड़े भाइयों के रहते छोटे का अभिषेक कैसे हो सकता है?

श्लोक 3 (uttara.63.3)

अवश्यं करणीयं च शासनं पुरुषर्षभ । तव चैव महाभाग शासनं दुरतिक्रमम् ।। 63.3 ।।

avaśyaṃ karaṇīyaṃ ca śāsanaṃ puruṣarṣabha | tava caiva mahābhāga śāsanaṃ duratikramam || 63.3 ||

फिर भी, हे पुरुषश्रेष्ठ! आपकी आज्ञा का पालन अवश्य करना है; हे महाभाग! आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

श्लोक 4 (uttara.63.4)

त्वत्तो मया श्रुतं वीर श्रुतिभ्यश्च मया श्रुतम् । नोत्तरं हि मया वाच्यं मध्यमे प्रतिजानति ।। 63.4 ।।

tvatto mayā śrutaṃ vīra śrutibhyaśca mayā śrutam | nottaraṃ hi mayā vācyaṃ madhyame pratijānati || 63.4 ||

हे वीर! मैंने आपसे भी सुना है और शास्त्रों से भी सुना है कि जब मंझला भाई कोई प्रतिज्ञा कर दे, तो उसे और उत्तर नहीं देना चाहिए।

श्लोक 5 (uttara.63.5)

व्याहृतं दुर्वचो घोरं हन्तास्मि लवणं मृधे । तस्यैवं मे दुरुक्तस्य दुर्गतिः पुरुषर्षभ ।। 63.5 ।।

vyāhṛtaṃ durvaco ghoraṃ hantāsmi lavaṇaṃ mṛdhe | tasyaivaṃ me duruktasya durgatiḥ puruṣarṣabha || 63.5 ||

मैंने एक अनुचित और उग्र वचन कह दिया कि मैं युद्ध में लवण को मार डालूँगा; हे पुरुषश्रेष्ठ! ऐसी अविचारित बात कहने पर मुझे दुर्गति ही प्राप्त हो।

श्लोक 6 (uttara.63.6)

उत्तरं नहि वक्तव्यं ज्येष्ठेनाभिहिते पुनः । अधर्मसहितं चैव परलोकविवर्जितम् ।। 63.6 ।।

uttaraṃ nahi vaktavyaṃ jyeṣṭhenābhihite punaḥ | adharmasahitaṃ caiva paralokavivarjitam || 63.6 ||

बड़े भाई के पुनः कुछ कहने पर उसे उत्तर देना उचित नहीं, यह अधर्मयुक्त और परलोक से वंचित करने वाला कार्य है।

श्लोक 7 (uttara.63.7)

सो ऽहं द्वितीयं काकुत्स्थ न वक्ष्यामि तवोत्तरम् । मा द्वितीयेन दण्डो वै निपतेन्मयि मानद ।। 63.7 ।।

so 'haṃ dvitīyaṃ kākutstha na vakṣyāmi tavottaram | mā dvitīyena daṇḍo vai nipatenmayi mānada || 63.7 ||

हे काकुत्स्थ! अतः मैं दूसरी बार आपको उत्तर नहीं दूँगा; हे मानद! ऐसा न हो कि दूसरे अपराध का दण्ड मुझ पर आ पड़े।

श्लोक 8 (uttara.63.8)

कामकारो ह्यहं राजंस्तवास्मि पुरुषर्षभ । अधर्मं जहि काकुत्स्थ मत्कृते रघुनन्दन ।। 63.8 ।।

kāmakāro hyahaṃ rājaṃstavāsmi puruṣarṣabha | adharmaṃ jahi kākutstha matkṛte raghunandana || 63.8 ||

हे राजन्, हे पुरुषश्रेष्ठ! मैं आपके अधीन स्वेच्छाचारी हूँ; हे काकुत्स्थ, हे रघुनन्दन! मेरे कारण उत्पन्न इस अधर्म को आप ही मिटाइए।"

श्लोक 9 (uttara.63.9)

एवमुक्ते तु शूरेण शत्रुघ्नेन महात्मना । उवाच रामः संहृष्टो भरतं लक्ष्मणं तथा ।। 63.9 ।।

evamukte tu śūreṇa śatrughnena mahātmanā | uvāca rāmaḥ saṃhṛṣṭo bharataṃ lakṣmaṇaṃ tathā || 63.9 ||

शूरवीर महात्मा शत्रुघ्न के ऐसा कहने पर प्रसन्न होकर राम ने भरत और लक्ष्मण से कहा।

श्लोक 10 (uttara.63.10)

सम्भारानभिषेकस्य आनयध्वं समाहिताः । अद्यैव पुरुषव्याघ्रमभिषेक्ष्यामि राघवम् ।। 63.10 ।।

sambhārānabhiṣekasya ānayadhvaṃ samāhitāḥ | adyaiva puruṣavyāghramabhiṣekṣyāmi rāghavam || 63.10 ||

"सावधान होकर अभिषेक की सामग्री लाओ; आज ही मैं पुरुषसिंह राघव का अभिषेक करूँगा।

श्लोक 11 (uttara.63.11)

पुरोहितं च काकुत्स्थं नैगमानृत्विजस्तथा । मन्त्रिणश्चैव तान्सर्वानानयध्वं ममाज्ञया ।। 63.11 ।।

purohitaṃ ca kākutsthaṃ naigamānṛtvijastathā | mantriṇaścaiva tānsarvānānayadhvaṃ mamājñayā || 63.11 ||

काकुत्स्थ-कुल के पुरोहित को, नगरवासियों को, ऋत्विजों को तथा मन्त्रियों को — इन सबको मेरी आज्ञा से बुलाओ।"

श्लोक 12 (uttara.63.12)

राज्ञः शासनमाज्ञाय तथा ऽकुर्वन्महारथाः । अभिषेकसमारम्भं पुरस्कृत्य पुरोधसम् । प्रविष्टा राजभवनं राजानो ब्राह्मणास्तथा ।। 63.12 ।।

rājñaḥ śāsanamājñāya tathā 'kurvanmahārathāḥ | abhiṣekasamārambhaṃ puraskṛtya purodhasam | praviṣṭā rājabhavanaṃ rājāno brāhmaṇāstathā || 63.12 ||

राजा की आज्ञा पाकर उन महारथियों ने वैसा ही किया; पुरोहित को आगे कर अभिषेक का आरम्भ हुआ, और राजा तथा ब्राह्मण राजभवन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 13 (uttara.63.13)

तथो ऽभिषेको ववृधे शत्रुघ्नस्य महात्मनः । सम्प्रहर्षकरः श्रीमान्राघवस्य पुरस्य च ।। 63.13 ।।

tatho 'bhiṣeko vavṛdhe śatrughnasya mahātmanaḥ | sampraharṣakaraḥ śrīmānrāghavasya purasya ca || 63.13 ||

इस प्रकार महात्मा शत्रुघ्न का वह भव्य अभिषेक बढ़ता गया, जो राघव और नगरवासियों दोनों के लिए हर्ष उत्पन्न करने वाला था।

श्लोक 14 (uttara.63.14)

अभिषिक्तस्तु शत्रुघ्नो बभौ चादित्यसन्निभः । अभिषिक्तः पुरा स्कन्दः सेन्द्रैरिव मरुद्गणैः ।। 63.14 ।।

abhiṣiktastu śatrughno babhau cādityasannibhaḥ | abhiṣiktaḥ purā skandaḥ sendrairiva marudgaṇaiḥ || 63.14 ||

अभिषिक्त होकर शत्रुघ्न सूर्य के समान शोभायमान हुए, जैसे पूर्वकाल में इन्द्र सहित मरुद्गणों द्वारा अभिषिक्त स्कन्द शोभित हुए थे।

श्लोक 15 (uttara.63.15)

अभिषिक्ते तु शत्रुघ्ने रामेणाक्लिष्टकर्मणा । पौराः प्रमुदिताश्चासन्ब्राह्मणाश्च बहुश्रुताः ।। 63.15 ।।

abhiṣikte tu śatrughne rāmeṇākliṣṭakarmaṇā | paurāḥ pramuditāścāsanbrāhmaṇāśca bahuśrutāḥ || 63.15 ||

अक्लिष्टकर्मा राम द्वारा शत्रुघ्न के अभिषिक्त होने पर नगरवासी और बहुश्रुत ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 16 (uttara.63.16)

कौसल्या च सुमित्रा च मङ्गलं केकयी तथा । चक्रुस्ता राजभवने याश्चान्या राजयोषितः ।। 63.16 ।।

kausalyā ca sumitrā ca maṅgalaṃ kekayī tathā | cakrustā rājabhavane yāścānyā rājayoṣitaḥ || 63.16 ||

कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी ने तथा राजभवन की अन्य रानियों ने भी वहाँ मंगलाचार किए।

श्लोक 17 (uttara.63.17)

ऋषयश्च महात्मानो यमुनातीरवासिनः । हतं लवणमाशंसुः शत्रुघ्नस्याभिषेचनात् ।। 63.17 ।।

ṛṣayaśca mahātmāno yamunātīravāsinaḥ | hataṃ lavaṇamāśaṃsuḥ śatrughnasyābhiṣecanāt || 63.17 ||

यमुना-तट पर निवास करने वाले महात्मा ऋषिगण शत्रुघ्न के इस अभिषेक से ही लवण को मृतप्राय मान बैठे।

श्लोक 18 (uttara.63.18)

ततो ऽभिषिक्तं शत्रुघ्नमङ्कमारोप्य राघवः । उवाच मधुरां वाणीं तेजस्तस्याभिपूरयन् ।। 63.18 ।।

tato 'bhiṣiktaṃ śatrughnamaṅkamāropya rāghavaḥ | uvāca madhurāṃ vāṇīṃ tejastasyābhipūrayan || 63.18 ||

तदनन्तर राघव ने अभिषिक्त शत्रुघ्न को अपनी गोद में बिठाकर उनके तेज को बढ़ाते हुए यह मधुर वाणी कही।

श्लोक 19 (uttara.63.19)

अयं शरस्त्वमोघस्ते दिव्यः परपुरञ्जयः । अनेन लवणं सौम्य हन्ता ऽसि रघुनन्दन ।। 63.19 ।।

ayaṃ śarastvamoghaste divyaḥ parapurañjayaḥ | anena lavaṇaṃ saumya hantā 'si raghunandana || 63.19 ||

"यह दिव्य बाण, जो शत्रुनगरों को जीतने वाला है, तुम्हारे लिए अमोघ है; हे सौम्य, हे रघुनन्दन! इसी से तुम लवण का वध करोगे।

श्लोक 20 (uttara.63.20)

सृष्टः शरो ऽयं काकुत्स्थ यदा शेते महार्णवे ।। 63.20 ।।

sṛṣṭaḥ śaro 'yaṃ kākutstha yadā śete mahārṇave || 63.20 ||

हे काकुत्स्थ! यह बाण उस समय बनाया गया था जब वे विष्णु महासागर में शयन करते हैं।

श्लोक 21 (uttara.63.21)

स्वयम्भूरजितो देवो यन्नापश्यन्सुरासुराः । अदृश्यः सर्वभूतानां तेनायं तु शरोत्तमः ।। 63.21 ।।

svayambhūrajito devo yannāpaśyansurāsurāḥ | adṛśyaḥ sarvabhūtānāṃ tenāyaṃ tu śarottamaḥ || 63.21 ||

स्वयम्भू, अजेय देव को न देवता देख पाते हैं और न असुर — वे समस्त प्राणियों के लिए अदृश्य हैं; उन्हीं से यह सर्वोत्तम बाण उत्पन्न हुआ है।

श्लोक 22 (uttara.63.22)

सृष्टः क्रोधाभिभूतेन विनाशार्थं दुरात्मनोः । मधुकैटभयोर्वीर विघाते वर्तमानयोः । स्रष्टुकामेन लोकांस्त्रींस्तौ चानेन हतौ युधि ।। 63.22 ।।

sṛṣṭaḥ krodhābhibhūtena vināśārthaṃ durātmanoḥ | madhukaiṭabhayorvīra vighāte vartamānayoḥ | sraṣṭukāmena lokāṃstrīṃstau cānena hatau yudhi || 63.22 ||

हे वीर! तीनों लोकों की रचना की इच्छा रखते हुए, तथा उसमें विघ्न डालने वाले दुष्ट मधु और कैटभ के विनाश के लिए क्रोध से भरे हुए उन्होंने ही इसे उत्पन्न किया था, और इसी बाण से युद्ध में उन दोनों का वध हुआ था।

श्लोक 23 (uttara.63.23)

तौ हत्वा जनभोगार्थं कैटभं तु मधुं तथा । अनेन शरमुख्येन ततो लोकांश्चकार सः ।। 63.23 ।।

tau hatvā janabhogārthaṃ kaiṭabhaṃ tu madhuṃ tathā | anena śaramukhyena tato lokāṃścakāra saḥ || 63.23 ||

कैटभ और मधु दोनों का वध करके, इसी श्रेष्ठ बाण से, उन्होंने प्रजाओं के भोग के लिए तीनों लोकों की रचना की।

श्लोक 24 (uttara.63.24)

नायं मया शरः पूर्वं रावणस्य वधार्थिना । मुक्तः शत्रुघ्न भूतानां महांस्त्रासो भवेदिति ।। 63.24 ।।

nāyaṃ mayā śaraḥ pūrvaṃ rāvaṇasya vadhārthinā | muktaḥ śatrughna bhūtānāṃ mahāṃstrāso bhavediti || 63.24 ||

हे शत्रुघ्न! रावण के वध की इच्छा रखते हुए भी मैंने पहले इस बाण का प्रयोग नहीं किया, यह सोचकर कि इससे समस्त प्राणियों को महान् त्रास होगा।

श्लोक 25 (uttara.63.25)

यच्च तस्य महच्छूलं त्र्यम्बकेण महात्मना । दत्तं शत्रुविनाशाय मधोरायुधमुत्तमम् ।। 63.25 ।।

yacca tasya mahacchūlaṃ tryambakeṇa mahātmanā | dattaṃ śatruvināśāya madhorāyudhamuttamam || 63.25 ||

जो वह महान् शूल महात्मा त्र्यम्बक शिव द्वारा शत्रुनाश के लिए मधु को दिया गया था, वह उसका सर्वोत्तम आयुध है।

श्लोक 26 (uttara.63.26)

स तं निक्षिप्य भवने पूज्यमान पुनः पुनः । दिशः सर्वाः समासाद्य प्राप्नोत्याहारमुत्तमम् ।। 63.26 ।।

sa taṃ nikṣipya bhavane pūjyamāna punaḥ punaḥ | diśaḥ sarvāḥ samāsādya prāpnotyāhāramuttamam || 63.26 ||

वह उस शूल को अपने भवन में स्थापित कर, बार-बार पूजा करते हुए, सभी दिशाओं में जाकर उत्तम आहार प्राप्त करता है।

श्लोक 27 (uttara.63.27)

यदा तु युद्धमाकाङ्क्षन् कश्चिदेनं समाह्वयेत् । तदा शूलं गहीत्वा तं भस्म रक्षः करोति हि ।। 63.27 ।।

yadā tu yuddhamākāṅkṣan kaścidenaṃ samāhvayet | tadā śūlaṃ gahītvā taṃ bhasma rakṣaḥ karoti hi || 63.27 ||

जब भी कोई युद्ध की इच्छा से उसे ललकारता है, तब वह उस शूल को हाथ में लेकर उस राक्षस को भस्म कर देता है।

श्लोक 28 (uttara.63.28)

स त्वं पुरुषशार्दूल तमायुधविनाकृतम् । अप्रविष्टं पुरं पूर्वं द्वारि तिष्ठ धृतायुधः ।। 63.28 ।।

sa tvaṃ puruṣaśārdūla tamāyudhavinākṛtam | apraviṣṭaṃ puraṃ pūrvaṃ dvāri tiṣṭha dhṛtāyudhaḥ || 63.28 ||

अतः हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम शस्त्र धारण किए हुए उसके द्वार पर खड़े रहना, जब तक वह अपने आयुध शूल से रहित हो और नगर में प्रवेश न कर चुका हो।

श्लोक 29 (uttara.63.29)

अप्रविष्टं च भवनं युद्धाय पुरुषर्षभ । आह्वयेथा महाबाहो ततो हन्तासि राक्षसम् ।। 63.29 ।।

apraviṣṭaṃ ca bhavanaṃ yuddhāya puruṣarṣabha | āhvayethā mahābāho tato hantāsi rākṣasam || 63.29 ||

हे पुरुषश्रेष्ठ, हे महाबाहो! जब तक वह भवन में प्रवेश न कर चुका हो, तभी उसे युद्ध के लिए ललकारना; तभी तुम उस राक्षस का वध कर सकोगे।

श्लोक 30 (uttara.63.30)

अन्यथा क्रियमाणे तु अवध्यः स भविष्यति । यदि त्वेवं कृते वीर विनाशमुपयास्यति ।। 63.30 ।।

anyathā kriyamāṇe tu avadhyaḥ sa bhaviṣyati | yadi tvevaṃ kṛte vīra vināśamupayāsyati || 63.30 ||

अन्यथा किए जाने पर वह अवध्य ही रहेगा; परन्तु हे वीर! ऐसा किए जाने पर वह अवश्य नष्ट होगा।

श्लोक 31 (uttara.63.31)

एतत्ते सर्वमाख्यातं शूलस्य च विपर्ययः । श्रीमतः शितिकण्ठस्य कृत्यं हि दुरतिक्रमम् ।। 63.31 ।।

etatte sarvamākhyātaṃ śūlasya ca viparyayaḥ | śrīmataḥ śitikaṇṭhasya kṛtyaṃ hi duratikramam || 63.31 ||

यह सब मैंने तुम्हें बता दिया, तथा शूल को निष्फल करने का उपाय भी; क्योंकि शोभायुक्त शितिकण्ठ शिव का दिया हुआ कार्य टाला नहीं जा सकता।"

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