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उत्तरकाण्ड · सर्ग 64

राम का उपदेश और शत्रुघ्न का प्रस्थान

सर्ग 63सर्ग-सूचीसर्ग 65

श्लोक 1 (uttara.64.1)

एवमुक्त्वा च काकुत्स्थं प्रशस्य च पुनः पुनः । पुनरेवापरं वाक्यमुवाच रघुनन्दनः ।। 64.1 ।।

evamuktvā ca kākutsthaṃ praśasya ca punaḥ punaḥ | punarevāparaṃ vākyamuvāca raghunandanaḥ || 64.1 ||

काकुत्स्थ शत्रुघ्न से ऐसा कहकर और बार-बार उसकी प्रशंसा करके रघुनन्दन ने फिर एक और वचन कहा।

श्लोक 2 (uttara.64.2)

इमान्यश्वसहस्राणि चत्वारि पुरुषर्षभ । रथानां द्वे सहस्रे च गजानां शतमुत्तमम् ।। 64.2 ।।

imānyaśvasahasrāṇi catvāri puruṣarṣabha | rathānāṃ dve sahasre ca gajānāṃ śatamuttamam || 64.2 ||

"हे पुरुषश्रेष्ठ! ये चार हजार अश्व, दो हजार रथ, तथा सौ उत्तम हाथी साथ ले जाओ।

श्लोक 3 (uttara.64.3)

अन्तरा पणवीथ्यश्च नानापण्योपशोभिताः । अनुगच्छन्तु काकुत्स्थं तथैव नटनर्तकाः ।। 64.3 ।।

antarā paṇavīthyaśca nānāpaṇyopaśobhitāḥ | anugacchantu kākutsthaṃ tathaiva naṭanartakāḥ || 64.3 ||

मार्ग में विविध वस्तुओं से सुशोभित बाज़ारों की पंक्तियाँ, तथा नट और नर्तक भी काकुत्स्थ के साथ चलें।

श्लोक 4 (uttara.64.4)

हिरण्यस्य सुवर्णस्य नियुतं पुरुषर्षभ । आदाय गच्छ शत्रुघ्न पर्याप्तधनवाहनः ।। 64.4 ।।

hiraṇyasya suvarṇasya niyutaṃ puruṣarṣabha | ādāya gaccha śatrughna paryāptadhanavāhanaḥ || 64.4 ||

हे पुरुषश्रेष्ठ, हे शत्रुघ्न! चाँदी और सोने का एक नियुत (दस लाख) लेकर, पर्याप्त धन और वाहनों सहित जाओ।

श्लोक 5 (uttara.64.5)

बलं च सुभृतं वीर हृष्टपुष्टमनुद्धतम् । सम्भाषासम्प्रदानेन रञ्जयस्व नगेत्तम ।। 64.5 ।।

balaṃ ca subhṛtaṃ vīra hṛṣṭapuṣṭamanuddhatam | sambhāṣāsampradānena rañjayasva nagettama || 64.5 ||

हे वीर! भली-भाँति पालित, प्रसन्न, हृष्ट-पुष्ट किन्तु अनुद्धत सेना को साथ लो; हे नगरश्रेष्ठ! प्रिय वचन और उपहारों से उन्हें प्रसन्न रखना।

श्लोक 6 (uttara.64.6)

न ह्यर्थास्तत्र तिष्ठन्ति न दारा न च बान्धवाः । सुप्रीतो भृत्यवर्गश्च यत्र तिष्ठसि राघव ।। 64.6 ।।

na hyarthāstatra tiṣṭhanti na dārā na ca bāndhavāḥ | suprīto bhṛtyavargaśca yatra tiṣṭhasi rāghava || 64.6 ||

हे राघव! जहाँ तुम रहते हो, वहीं धन है, वहीं पत्नी और बन्धुजन हैं, और वहीं सन्तुष्ट सेवकगण भी हैं।

श्लोक 7 (uttara.64.7)

ततो हृष्टजनाकीर्णां प्रस्थाप्य महतीं चमूम् । एक एव धनुष्पाणिर्गच्छ त्वं मधुनो वनम् ।। 64.7 ।।

tato hṛṣṭajanākīrṇāṃ prasthāpya mahatīṃ camūm | eka eva dhanuṣpāṇirgaccha tvaṃ madhuno vanam || 64.7 ||

तत्पश्चात् प्रसन्न जनों से भरी हुई उस विशाल सेना को आगे भेजकर, तुम धनुष हाथ में लेकर अकेले ही मधुवन को जाना।

श्लोक 8 (uttara.64.8)

यथा त्वां न प्रजानाति गच्छन्तं युद्धकाङ्क्षिणम् । लवणस्तु मधोः पुत्रस्तथा गच्छेरशङ्कितम् ।। 64.8 ।।

yathā tvāṃ na prajānāti gacchantaṃ yuddhakāṅkṣiṇam | lavaṇastu madhoḥ putrastathā gaccheraśaṅkitam || 64.8 ||

इस प्रकार जाना कि युद्ध की इच्छा से जाते हुए तुम्हें मधुपुत्र लवण पहचान न सके, और तुम निर्भय होकर जा सको।

श्लोक 9 (uttara.64.9)

न तस्य मृत्युरन्यो ऽस्ति कश्चिद्धि पुरुषर्षभ । दर्शनं यो ऽभिगच्छेत स वध्यो लवणेन हि ।। 64.9 ।।

na tasya mṛtyuranyo 'sti kaściddhi puruṣarṣabha | darśanaṃ yo 'bhigaccheta sa vadhyo lavaṇena hi || 64.9 ||

हे पुरुषश्रेष्ठ! उसकी मृत्यु और किसी प्रकार से नहीं हो सकती, क्योंकि जो भी उसके सम्मुख आता है, वह लवण द्वारा ही मारा जाता है।

श्लोक 10 (uttara.64.10)

स हि ग्रीष्मो ऽपयाते तु वर्षारात्र उपागते । हन्यास्त्वं लवणं सौम्य सहि कालो ऽस्य दुर्मतेः ।। 64.10 ।।

sa hi grīṣmo 'payāte tu varṣārātra upāgate | hanyāstvaṃ lavaṇaṃ saumya sahi kālo 'sya durmateḥ || 64.10 ||

अतः हे सौम्य! ग्रीष्म ऋतु के बीत जाने और वर्षा ऋतु आने पर, उस दुर्बुद्धि लवण का वध करना — वही उसके लिए उचित समय होगा।

श्लोक 11 (uttara.64.11)

महर्षींस्तु पुरत्कृत्य प्रयान्तु तव सौनिकाः । यथा ग्रीष्मावशेषेण तरेयुर्जाह्नवीजलम् ।। 64.11 ।।

maharṣīṃstu puratkṛtya prayāntu tava saunikāḥ | yathā grīṣmāvaśeṣeṇa tareyurjāhnavījalam || 64.11 ||

तुम्हारे सैनिक महर्षियों को आगे रखकर चलें, जिससे वे ग्रीष्म ऋतु की शेष अवधि में ही गंगा-जल पार कर सकें।

श्लोक 12 (uttara.64.12)

तत्र स्थाप्य बलं सर्वं नदीतीरे समाहितः । अग्रतो धनुषा सार्धं गच्छ त्वं लघुविक्रमः ।। 64.12 ।।

tatra sthāpya balaṃ sarvaṃ nadītīre samāhitaḥ | agrato dhanuṣā sārdhaṃ gaccha tvaṃ laghuvikramaḥ || 64.12 ||

वहाँ नदी के तट पर सावधानीपूर्वक सारी सेना को ठहराकर, तुम धनुष सहित अकेले ही आगे बढ़ना, हे शीघ्रगामी वीर!"

श्लोक 13 (uttara.64.13)

एवमुक्तस्तु रामेण शत्रुघ्नस्तान्महाबलान् । सेनामुख्यान्समानीय ततो वाक्यमुवाच ह ।। 64.13 ।।

evamuktastu rāmeṇa śatrughnastānmahābalān | senāmukhyānsamānīya tato vākyamuvāca ha || 64.13 ||

राम के ऐसा कहने पर शत्रुघ्न ने उन महाबली सेनापतियों को बुलाकर उनसे यह वचन कहा।

श्लोक 14 (uttara.64.14)

एते वो गणिता वासा यत्र तत्र निवत्स्यथ । स्थातव्यं चाविरोधेन यथा बाधा न कस्यचित् ।। 64.14 ।।

ete vo gaṇitā vāsā yatra tatra nivatsyatha | sthātavyaṃ cāvirodhena yathā bādhā na kasyacit || 64.14 ||

"तुम्हारे लिए जो-जो पड़ाव नियत किए गए हैं, वहीं तुम ठहरना; बिना किसी विरोध के इस प्रकार रहना कि किसी को कोई कष्ट न हो।"

श्लोक 15 (uttara.64.15)

तथा तांस्तु समाज्ञाप्य प्रस्थाप्य च महद्बलम् । कौसल्यां च सुमित्रां च कैकेयीं चाभ्यवादयत् ।। 64.15 ।।

tathā tāṃstu samājñāpya prasthāpya ca mahadbalam | kausalyāṃ ca sumitrāṃ ca kaikeyīṃ cābhyavādayat || 64.15 ||

इस प्रकार उन्हें आज्ञा देकर और विशाल सेना को आगे भेजकर, शत्रुघ्न ने कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी को प्रणाम किया।

श्लोक 16 (uttara.64.16)

रामं प्रदक्षिणीकृत्य शिरसा ऽभिप्रणम्य च । रामेण चाभ्यनुज्ञातः शत्रुघ्नः शत्रुतापनः ।। 64.16 ।।

rāmaṃ pradakṣiṇīkṛtya śirasā 'bhipraṇamya ca | rāmeṇa cābhyanujñātaḥ śatrughnaḥ śatrutāpanaḥ || 64.16 ||

शत्रुओं को संतप्त करने वाले शत्रुघ्न ने राम की प्रदक्षिणा कर मस्तक झुकाकर प्रणाम किया, और राम से आज्ञा प्राप्त की।

श्लोक 17 (uttara.64.17)

लक्ष्मणं भरतं चैव प्रणिपत्य कृताञ्जलिः । पुरोहितं वसिष्ठं च शत्रुघ्नः प्रयतात्मवान् । प्रदक्षिणमथो कृत्वा निर्जगाम महाबलः ।। 64.17 ।।

lakṣmaṇaṃ bharataṃ caiva praṇipatya kṛtāñjaliḥ | purohitaṃ vasiṣṭhaṃ ca śatrughnaḥ prayatātmavān | pradakṣiṇamatho kṛtvā nirjagāma mahābalaḥ || 64.17 ||

संयमी महाबली शत्रुघ्न ने हाथ जोड़कर लक्ष्मण, भरत और पुरोहित वसिष्ठ को प्रणाम किया, और प्रदक्षिणा करके प्रस्थान किया।

श्लोक 18 (uttara.64.18)

प्रस्थाप्य सेनामथ सो ऽग्रतस्तदा गजेन्द्रवाजिप्रवरौघसङ्कुलाम् । उपास मासं तु नरेन्द्रपार्श्वतस्त्वथ प्रयातो रघुवंशवर्धनः ।। 64.18 ।।

prasthāpya senāmatha so 'gratastadā gajendravājipravaraughasaṅkulām | upāsa māsaṃ tu narendrapārśvatastvatha prayāto raghuvaṃśavardhanaḥ || 64.18 ||

उस रघुवंश-वर्धक ने श्रेष्ठ हाथियों और घोड़ों के समूह से भरी हुई अपनी सेना को आगे भेजकर, एक मास तक राजा राम के पास रहकर, तत्पश्चात् प्रस्थान किया।

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