उत्तरकाण्ड · सर्ग 65
वाल्मीकि द्वारा कल्माषपाद की कथा
श्लोक 1 (uttara.65.1)
प्रस्थाप्य च बलं सर्वं मासमात्रोषितः पथि । एक एवाशु शत्रुघ्नो जगाम त्वरितं तदा ।। 65.1 ।।
prasthāpya ca balaṃ sarvaṃ māsamātroṣitaḥ pathi | eka evāśu śatrughno jagāma tvaritaṃ tadā || 65.1 ||
सारी सेना को भेजकर और मार्ग में एक मास तक ठहरकर, शत्रुघ्न तब अकेले ही शीघ्रता से चल पड़े।
श्लोक 2 (uttara.65.2)
द्विरात्रमन्तरे शूर उष्य राघवनन्दनः । वाल्मीकेराश्रमं पुण्यमगच्छद्वासमुत्तमम् ।। 65.2 ।।
dvirātramantare śūra uṣya rāghavanandanaḥ | vālmīkerāśramaṃ puṇyamagacchadvāsamuttamam || 65.2 ||
मार्ग में दो रात्रि व्यतीत करने के बाद वे शूरवीर राघवनन्दन वाल्मीकि के पवित्र आश्रम में, जो एक उत्तम विश्रामस्थल था, पहुँचे।
श्लोक 3 (uttara.65.3)
सो ऽभिवाद्य महात्मानं वाल्मीकिं मुनिसत्तमम् । कृताञ्जलिरथो भूत्वा वाक्यमेतदुवाच ह ।। 65.3 ।।
so 'bhivādya mahātmānaṃ vālmīkiṃ munisattamam | kṛtāñjaliratho bhūtvā vākyametaduvāca ha || 65.3 ||
उन्होंने मुनिश्रेष्ठ महात्मा वाल्मीकि को प्रणाम कर, हाथ जोड़कर यह वचन कहा।
श्लोक 4 (uttara.65.4)
भगवन्वस्तुमिच्छामि गुरोः कृत्यादिहागतः । श्वः प्रभाते गमिष्यामि प्रतीचीं वारुणीं दिशम् ।। 65.4 ।।
bhagavanvastumicchāmi guroḥ kṛtyādihāgataḥ | śvaḥ prabhāte gamiṣyāmi pratīcīṃ vāruṇīṃ diśam || 65.4 ||
"हे भगवन्! अपने गुरु के कार्य से यहाँ आया हुआ मैं आज रात निवास करना चाहता हूँ; कल प्रातःकाल पश्चिम दिशा की ओर जाऊँगा।"
श्लोक 5 (uttara.65.5)
शत्रुघ्नस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य मुनिपुङ्गवः । प्रत्युवाच महात्मानं स्वागतं ते महायशः ।। 65.5 ।।
śatrughnasya vacaḥ śrutvā prahasya munipuṅgavaḥ | pratyuvāca mahātmānaṃ svāgataṃ te mahāyaśaḥ || 65.5 ||
शत्रुघ्न के वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ मुस्कुराए और उस महात्मा से बोले, "हे महायशस्वी! तुम्हारा स्वागत है।
श्लोक 6 (uttara.65.6)
स्वमाश्रममिदं सौम्य राघवाणां कुलस्य हि । आसनं पाद्यमर्ध्यं च निर्विशङ्कः प्रतीच्छ मे ।। 65.6 ।।
svamāśramamidaṃ saumya rāghavāṇāṃ kulasya hi | āsanaṃ pādyamardhyaṃ ca nirviśaṅkaḥ pratīccha me || 65.6 ||
हे सौम्य! यह आश्रम रघुकुल का ही अपना है; निःसंकोच होकर मुझसे आसन, पाद्य और अर्घ्य ग्रहण करो।"
श्लोक 7 (uttara.65.7)
प्रतिगृह्य तदा पूजां फलमूलं च भोजनम् । भक्षयामास काकुत्स्थस्तृप्तिं च परमां गतः ।। 65.7 ।।
pratigṛhya tadā pūjāṃ phalamūlaṃ ca bhojanam | bhakṣayāmāsa kākutsthastṛptiṃ ca paramāṃ gataḥ || 65.7 ||
तब वह पूजा स्वीकार कर काकुत्स्थ ने फल-मूल का भोजन किया और परम तृप्ति को प्राप्त हुए।
श्लोक 8 (uttara.65.8)
स भुक्त्वा फलमूलं च महर्षिं तमुवाच ह । इयं यज्ञविभूतिस्ते कस्याश्रमसमीपतः ।। 65.8 ।।
sa bhuktvā phalamūlaṃ ca maharṣiṃ tamuvāca ha | iyaṃ yajñavibhūtiste kasyāśramasamīpataḥ || 65.8 ||
फल-मूल खाने के बाद उन्होंने उस महर्षि से पूछा, "यह यज्ञ-सामग्री का चिह्न आपके आश्रम के निकट किसका है?"
श्लोक 9 (uttara.65.9)
तत्तस्य भाषितं श्रुत्वा वाल्मीकिर्वाक्यमब्रवीत् । शत्रुघ्न शृणु यस्येदं बभूवायतनं पुरा ।। 65.9 ।।
tattasya bhāṣitaṃ śrutvā vālmīkirvākyamabravīt | śatrughna śṛṇu yasyedaṃ babhūvāyatanaṃ purā || 65.9 ||
उनका यह वचन सुनकर वाल्मीकि ने कहा, "हे शत्रुघ्न! सुनो, यह स्थान पहले किसका यज्ञस्थल था।
श्लोक 10 (uttara.65.10)
युष्माकं पूर्वको राजा सौदासस्तस्य भूपतेः । पुत्रो वीरसहो नाम वीर्यवानतिधार्मिकः ।। 65.10 ।।
yuṣmākaṃ pūrvako rājā saudāsastasya bhūpateḥ | putro vīrasaho nāma vīryavānatidhārmikaḥ || 65.10 ||
तुम्हारे पूर्वज राजा सुदास थे; उन भूपति का पुत्र, पराक्रमी और अत्यन्त धर्मात्मा, वीरसह नामक था।
श्लोक 11 (uttara.65.11)
स बाल एव सौदासो मृगयामुपचक्रमे । चञ्चूर्यमाणं ददृशे स शूरो राक्षसद्वयम् ।। 65.11 ।।
sa bāla eva saudāso mṛgayāmupacakrame | cañcūryamāṇaṃ dadṛśe sa śūro rākṣasadvayam || 65.11 ||
वह सौदास बचपन में ही आखेट करने लगा; उस शूरवीर ने विचरण करते हुए दो राक्षसों को देखा।
श्लोक 12 (uttara.65.12)
शार्दूलरूपिणौ घोरौ मृगान्बहुसहस्रशः । भक्षमाणावसन्तुष्टौ पर्याप्तिं नैव जग्मतुः ।। 65.12 ।।
śārdūlarūpiṇau ghorau mṛgānbahusahasraśaḥ | bhakṣamāṇāvasantuṣṭau paryāptiṃ naiva jagmatuḥ || 65.12 ||
व्याघ्र के रूप में वे दोनों भयंकर राक्षस हजारों मृगों को खाते हुए भी असन्तुष्ट थे और उन्हें तृप्ति नहीं मिल रही थी।
श्लोक 13 (uttara.65.13)
स तु तौ राक्षसौ दृष्ट्वा निर्मृगं च वनं कृतम् । क्रोधेन महताविष्टो जघानैकं महेषुणा ।। 65.13 ।।
sa tu tau rākṣasau dṛṣṭvā nirmṛgaṃ ca vanaṃ kṛtam | krodhena mahatāviṣṭo jaghānaikaṃ maheṣuṇā || 65.13 ||
उन दोनों राक्षसों को देखकर, और वन को मृगविहीन हुआ जानकर, वह भारी क्रोध से भरकर एक विशाल बाण से उनमें से एक को मार गिराया।
श्लोक 14 (uttara.65.14)
विनिपात्य तमेकं तु सौदासः पुरुषर्षभः । विज्वरो विगतामर्षो हतं रक्षो ह्युदैक्षत ।। 65.14 ।।
vinipātya tamekaṃ tu saudāsaḥ puruṣarṣabhaḥ | vijvaro vigatāmarṣo hataṃ rakṣo hyudaikṣata || 65.14 ||
पुरुषश्रेष्ठ सौदास ने उन दोनों में से एक को मारकर, निश्चिन्त और क्रोधरहित होकर उस मारे गए राक्षस को देखा।
श्लोक 15 (uttara.65.15)
निरीक्षमाणं तं दृष्ट्वा सहायं तस्य रक्षसः । सन्तापमकरोद्घोरं सौदासं चेदमब्रवीत् ।। 65.15 ।।
nirīkṣamāṇaṃ taṃ dṛṣṭvā sahāyaṃ tasya rakṣasaḥ | santāpamakarodghoraṃ saudāsaṃ cedamabravīt || 65.15 ||
उस देखते हुए सौदास को देखकर मारे गए राक्षस के साथी ने भयंकर संताप प्रकट किया और सौदास से यह कहा।
श्लोक 16 (uttara.65.16)
यस्मादनपराधं त्वं सहायं मम जघ्निवान् । तस्मात्तवापि पापिष्ठ प्रदास्यामि प्रतिक्रियाम् ।। 65.16 ।।
yasmādanaparādhaṃ tvaṃ sahāyaṃ mama jaghnivān | tasmāttavāpi pāpiṣṭha pradāsyāmi pratikriyām || 65.16 ||
"चूँकि तुमने मेरे निरपराध सहायक को मार डाला है, इसलिए हे पापी! मैं तुम्हें भी इसका प्रतिफल दूँगा।"
श्लोक 17 (uttara.65.17)
एवमुक्त्वा तु तद्राक्षस्तत्रैवान्तरधीयत । कालपर्याययोगेन राजा मित्रसहो ऽभवत् ।। 65.17 ।।
evamuktvā tu tadrākṣastatraivāntaradhīyata | kālaparyāyayogena rājā mitrasaho 'bhavat || 65.17 ||
यह कहकर वह राक्षस वहीं अन्तर्धान हो गया; और समय बीतने पर वह राजा मित्रसह कहलाए।
श्लोक 18 (uttara.65.18)
राजापि यजते यज्ञमस्याश्रमसमीपतः । अश्वमेधं महायज्ञं तं वसिष्ठो ऽभ्यपालयत् ।। 65.18 ।।
rājāpi yajate yajñamasyāśramasamīpataḥ | aśvamedhaṃ mahāyajñaṃ taṃ vasiṣṭho 'bhyapālayat || 65.18 ||
उस राजा ने इसी आश्रम के निकट अश्वमेध नामक महायज्ञ किया, जिसकी देखरेख वसिष्ठ ने की।
श्लोक 19 (uttara.65.19)
तत्र यज्ञो महानासीद्बहुवर्षगणायुतः । समृद्धः परया लक्ष्म्या देवयज्ञसमो ऽभवत् ।। 65.19 ।।
tatra yajño mahānāsīdbahuvarṣagaṇāyutaḥ | samṛddhaḥ parayā lakṣmyā devayajñasamo 'bhavat || 65.19 ||
वहाँ बहुत वर्षों में सम्पन्न होने वाला वह महान् यज्ञ हुआ, जो परम शोभा से युक्त और देवताओं के यज्ञ के समान था।
श्लोक 20 (uttara.65.20)
अथावसाने यज्ञस्य पूर्ववैरमनुस्मरन् । वसिष्ठरूपी राजानमिति होवाच राक्षसः ।। 65.20 ।।
athāvasāne yajñasya pūrvavairamanusmaran | vasiṣṭharūpī rājānamiti hovāca rākṣasaḥ || 65.20 ||
यज्ञ की समाप्ति पर, पूर्व वैर का स्मरण करते हुए, वह राक्षस वसिष्ठ का रूप धारण कर राजा से इस प्रकार बोला।
श्लोक 21 (uttara.65.21)
अस्य यज्ञस्य जातो ऽन्तः सामिषं भोजनं मम । दीयतामिह शीघ्रं वै नात्र कार्या विचारणा ।। 65.21 ।।
asya yajñasya jāto 'ntaḥ sāmiṣaṃ bhojanaṃ mama | dīyatāmiha śīghraṃ vai nātra kāryā vicāraṇā || 65.21 ||
"इस यज्ञ के अन्त में मेरे लिए मांसयुक्त भोजन तैयार हुआ है, वह मुझे शीघ्र यहीं दे दिया जाए; इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।"
श्लोक 22 (uttara.65.22)
तच्छ्रुत्वा व्याहृतं वाक्यं रक्षसा ब्रह्मरूपिणा । भक्ष्यसंस्कारकुशलमुवाच पृथिवीपतिः ।। 65.22 ।।
tacchrutvā vyāhṛtaṃ vākyaṃ rakṣasā brahmarūpiṇā | bhakṣyasaṃskārakuśalamuvāca pṛthivīpatiḥ || 65.22 ||
ब्राह्मणरूपधारी राक्षस के इस वचन को सुनकर, राजा ने भोजन बनाने में कुशल रसोइए से यह कहा।
श्लोक 23 (uttara.65.23)
हविष्यं सामिषं स्वादु यथा भवति भोजनम् । तथा कुरुष्व शीघ्रं वै परितुष्येद्यथा गुरुः ।। 65.23 ।।
haviṣyaṃ sāmiṣaṃ svādu yathā bhavati bhojanam | tathā kuruṣva śīghraṃ vai parituṣyedyathā guruḥ || 65.23 ||
"जिस प्रकार यह मांसयुक्त हविष्य स्वादिष्ट भोजन बने, उसी प्रकार शीघ्र तैयार करो, जिससे गुरुजी संतुष्ट हों।"
श्लोक 24 (uttara.65.24)
शासनात्पार्थिवेन्द्रस्य सूदः सम्भ्रान्तमानसः । स राक्षसः पुनस्तत्र सूदवेषमथाकरोत् ।। 65.24 ।।
śāsanātpārthivendrasya sūdaḥ sambhrāntamānasaḥ | sa rākṣasaḥ punastatra sūdaveṣamathākarot || 65.24 ||
राजा की इस आज्ञा से घबराए हुए रसोइए के स्थान पर, वह राक्षस स्वयं वहाँ रसोइए का रूप धारण कर गया।
श्लोक 25 (uttara.65.25)
स मानुषमथो मांसं पार्थिवाय न्यवेदयत् । इदं स्वादु हविष्यं च सामिषं चान्नमाहृतम् ।। 65.25 ।।
sa mānuṣamatho māṃsaṃ pārthivāya nyavedayat | idaṃ svādu haviṣyaṃ ca sāmiṣaṃ cānnamāhṛtam || 65.25 ||
उसने मानव-मांस राजा को अर्पित करते हुए कहा, "यह स्वादिष्ट हविष्य तथा मांसयुक्त अन्न लाया गया है।"
श्लोक 26 (uttara.65.26)
स भोजनं वसिष्ठाय पत्न्या सार्धमुपाहरत् । मदयन्त्या नरव्याघ्र सामिषं रक्षसा हृतम् ।। 65.26 ।।
sa bhojanaṃ vasiṣṭhāya patnyā sārdhamupāharat | madayantyā naravyāghra sāmiṣaṃ rakṣasā hṛtam || 65.26 ||
हे नरव्याघ्र! राजा ने वह राक्षस द्वारा लाया हुआ मांसयुक्त भोजन अपनी पत्नी मदयन्ती के साथ वसिष्ठ को परोसा।
श्लोक 27 (uttara.65.27)
ज्ञात्वा तदामिषं विप्रो मानुषं भाजनं गतम् । क्रोधेन महताविष्टो व्याहर्तुमुपचक्रमे ।। 65.27 ।।
jñātvā tadāmiṣaṃ vipro mānuṣaṃ bhājanaṃ gatam | krodhena mahatāviṣṭo vyāhartumupacakrame || 65.27 ||
उस थाली में रखे हुए मांस को मानव-मांस जानकर, विप्र वसिष्ठ भारी क्रोध से भरकर बोलने लगे।
श्लोक 28 (uttara.65.28)
यस्मात्त्वं भोजनं राजन्ममैतद्दातुमिच्छसि । तस्माद्भोजनमेतत्ते भविष्यति न संशयः ।। 65.28 ।।
yasmāttvaṃ bhojanaṃ rājanmamaitaddātumicchasi | tasmādbhojanametatte bhaviṣyati na saṃśayaḥ || 65.28 ||
"हे राजन्! चूँकि तुम मुझे यह भोजन देना चाहते हो, इसलिए निःसंदेह यही भोजन तुम्हें भी प्राप्त होगा।"
श्लोक 29 (uttara.65.29)
ततः क्रुद्धस्तु सौदासस्तोयं जग्राह पाणिना । वसिष्ठं शप्तुमारेभे भार्या चैनमवारयत् ।। 65.29 ।।
tataḥ kruddhastu saudāsastoyaṃ jagrāha pāṇinā | vasiṣṭhaṃ śaptumārebhe bhāryā cainamavārayat || 65.29 ||
तब कुपित सौदास ने हाथ में जल लेकर वसिष्ठ को शाप देना आरम्भ किया, परन्तु उनकी पत्नी ने उन्हें रोक दिया।
श्लोक 30 (uttara.65.30)
राजन्प्रभुर्यतो ऽस्माकं वसिष्ठो भगवानृषिः । प्रतिशप्तुं न शक्तस्त्वं देवतुल्यं पुरोधसम् ।। 65.30 ।।
rājanprabhuryato 'smākaṃ vasiṣṭho bhagavānṛṣiḥ | pratiśaptuṃ na śaktastvaṃ devatulyaṃ purodhasam || 65.30 ||
"हे राजन्! भगवान् वसिष्ठ ऋषि तो हमारे स्वामी हैं; तुम देवतुल्य उस पुरोहित को शाप देने में समर्थ नहीं हो।"
श्लोक 31 (uttara.65.31)
ततः क्रोधमयं तोयं तेजोबलसमन्वितम् । व्यसर्जयत धर्मात्मा ततः पादौ सिषेच च ।। 65.31 ।।
tataḥ krodhamayaṃ toyaṃ tejobalasamanvitam | vyasarjayata dharmātmā tataḥ pādau siṣeca ca || 65.31 ||
तब उस धर्मात्मा राजा ने, बाहर न छोड़ पाने पर, तेज और बल से युक्त उस क्रोधयुक्त जल को अपने ही दोनों पैरों पर सींच दिया।
श्लोक 32 (uttara.65.32)
तेनास्य राज्ञस्तौ पादौ तदा कल्माषतां गतौ । तदाप्रभृति राजा ऽसौ सौदासः सुमहायशाः । कल्माषपादः संवृत्तः ख्यातश्चैव तथा नृपः ।। 65.32 ।।
tenāsya rājñastau pādau tadā kalmāṣatāṃ gatau | tadāprabhṛti rājā 'sau saudāsaḥ sumahāyaśāḥ | kalmāṣapādaḥ saṃvṛttaḥ khyātaścaiva tathā nṛpaḥ || 65.32 ||
उस जल के प्रभाव से राजा के दोनों पैर उसी समय चितकबरे हो गए; तभी से वह अत्यन्त यशस्वी राजा सौदास 'कल्माषपाद' के नाम से प्रसिद्ध हो गए।
श्लोक 33 (uttara.65.33)
स राजा सह पत्न्या वै प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः । पुनर्वसिष्ठं प्रोवाच यदुक्तं ब्रह्मरूपिणा ।। 65.33 ।।
sa rājā saha patnyā vai praṇipatya muhurmuhuḥ | punarvasiṣṭhaṃ provāca yaduktaṃ brahmarūpiṇā || 65.33 ||
उस राजा ने अपनी पत्नी सहित बार-बार प्रणाम करते हुए, ब्राह्मणरूपधारी राक्षस द्वारा कहे गए वचन को वसिष्ठ से पुनः निवेदन किया।
श्लोक 34 (uttara.65.34)
तच्छ्रुत्वा पार्थिवेन्द्रस्य रक्षसा विकृतं च तत् । पुनः प्रोवाच राजानं वसिष्ठः पुरुषर्षभम् ।। 65.34 ।।
tacchrutvā pārthivendrasya rakṣasā vikṛtaṃ ca tat | punaḥ provāca rājānaṃ vasiṣṭhaḥ puruṣarṣabham || 65.34 ||
राजा के इस वृत्तान्त को और राक्षस द्वारा किए गए उस छल को सुनकर, वसिष्ठ ने पुनः उस पुरुषश्रेष्ठ राजा से कहा।
श्लोक 35 (uttara.65.35)
मया रोषपरीतेन यदिदं व्याहृतं वचः । नैतच्छक्यं वृथा कर्तुं प्रदास्यामि च ते वरम् ।। 65.35 ।।
mayā roṣaparītena yadidaṃ vyāhṛtaṃ vacaḥ | naitacchakyaṃ vṛthā kartuṃ pradāsyāmi ca te varam || 65.35 ||
"क्रोध से भरकर मैंने जो यह वचन कहा है, वह व्यर्थ नहीं किया जा सकता; परन्तु मैं तुम्हें एक वरदान भी दूँगा।
श्लोक 36 (uttara.65.36)
कालो द्वादश वर्षाणि शापस्यान्तो भविष्यति । मत्प्रासादाच्च राजेन्द्र व्यतीतं न स्मरिष्यसि ।। 65.36 ।।
kālo dvādaśa varṣāṇi śāpasyānto bhaviṣyati | matprāsādācca rājendra vyatītaṃ na smariṣyasi || 65.36 ||
बारह वर्षों के पश्चात् इस शाप का अन्त होगा; और हे राजेन्द्र! मेरी कृपा से तुम बीते हुए समय की बात याद भी नहीं रखोगे।"
श्लोक 37 (uttara.65.37)
एवं स राजा तं शापमुपभुज्यारिसूदनः । प्रतिलेभे पुना राज्यं प्रजाश्चैवान्वपालयत् ।। 65.37 ।।
evaṃ sa rājā taṃ śāpamupabhujyārisūdanaḥ | pratilebhe punā rājyaṃ prajāścaivānvapālayat || 65.37 ||
इस प्रकार शत्रुओं का नाश करने वाले उस राजा ने उस शाप को भोगकर पुनः अपना राज्य प्राप्त किया और प्रजा का पालन किया।
श्लोक 38 (uttara.65.38)
तस्य कल्माषपादस्य यज्ञस्यायतनं शुभम् । आश्रमस्य समीपे ऽस्य यन्मां पृच्छसि राघव ।। 65.38 ।।
tasya kalmāṣapādasya yajñasyāyatanaṃ śubham | āśramasya samīpe 'sya yanmāṃ pṛcchasi rāghava || 65.38 ||
हे राघव! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह उसी कल्माषपाद के यज्ञ का यह पवित्र स्थान है, जो इस आश्रम के निकट है।"
श्लोक 39 (uttara.65.39)
तस्य तां पार्थिवेन्द्रस्य कथां श्रुत्वा सुदारुणाम् । विवेश पर्णशालायां महर्षिमभिवाद्य च ।। 65.39 ।।
tasya tāṃ pārthivendrasya kathāṃ śrutvā sudāruṇām | viveśa parṇaśālāyāṃ maharṣimabhivādya ca || 65.39 ||
उस राजा की वह अत्यन्त भयंकर कथा सुनकर, शत्रुघ्न ने महर्षि को प्रणाम कर पर्णशाला में प्रवेश किया।