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उत्तरकाण्ड · सर्ग 67

च्यवन द्वारा मान्धाता और लवण की कथा

सर्ग 66सर्ग-सूचीसर्ग 68

श्लोक 1 (uttara.67.1)

अथ रात्र्यां प्रवृत्तायां शत्रुघ्नो भृगुनन्दनम् । पप्रच्छ च्यवनं विप्रं लवणस्य यथा बलम् ।। 67.1 ।।

atha rātryāṃ pravṛttāyāṃ śatrughno bhṛgunandanam | papraccha cyavanaṃ vipraṃ lavaṇasya yathā balam || 67.1 ||

फिर रात्रि हो जाने पर, शत्रुघ्न ने भृगुवंशी ब्राह्मण च्यवन से पूछा कि लवण का बल किस प्रकार का है।

श्लोक 2 (uttara.67.2)

शूलस्य च बलं ब्रह्मन्के च पूर्वं विनाशिताः । अनेन शूलमुख्येन द्वन्द्वयुद्धमुपागताः ।। 67.2 ।।

śūlasya ca balaṃ brahmanke ca pūrvaṃ vināśitāḥ | anena śūlamukhyena dvandvayuddhamupāgatāḥ || 67.2 ||

"हे ब्रह्मन्! उस त्रिशूल का बल कैसा है, और इससे पूर्व द्वन्द्वयुद्ध में आकर इस उत्तम शूल से कौन-कौन नष्ट किए गए हैं?"

श्लोक 3 (uttara.67.3)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य महात्मनः । प्रत्युवाच महातेजाश्च्यवनो रघुनन्दनम् ।। 67.3 ।।

tasya tadvacanaṃ śrutvā śatrughnasya mahātmanaḥ | pratyuvāca mahātejāścyavano raghunandanam || 67.3 ||

महात्मा शत्रुघ्न के इस वचन को सुनकर, महातेजस्वी च्यवन ने रघुनन्दन को उत्तर दिया।

श्लोक 4 (uttara.67.4)

असङ्ख्येयानि कर्माणि यान्यस्य रघुनन्दन । इक्ष्वाकुवंशप्रभवे यद्वृत्तं तच्छृणष्व मे ।। 67.4 ।।

asaṅkhyeyāni karmāṇi yānyasya raghunandana | ikṣvākuvaṃśaprabhave yadvṛttaṃ tacchṛṇaṣva me || 67.4 ||

"हे रघुनन्दन! उसके असंख्य कर्म हैं। इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए एक राजा के साथ जो घटना हुई थी, वह मुझसे सुनो।

श्लोक 5 (uttara.67.5)

अयोध्यायां पुरा राजा युवनाश्वसुतो बली । मान्धातेति स विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ।। 67.5 ।।

ayodhyāyāṃ purā rājā yuvanāśvasuto balī | māndhāteti sa vikhyātastriṣu lokeṣu vīryavān || 67.5 ||

पूर्वकाल में अयोध्या में युवनाश्व का पुत्र, बलवान् राजा राज्य करता था, जो तीनों लोकों में मान्धाता के नाम से विख्यात और पराक्रमी था।

श्लोक 6 (uttara.67.6)

स कृत्वा पृथिवीं कृत्स्नां शासने पृथिवीपतिः । सुरलोकमितो जेतुमुद्योगमकरोन्नृपः ।। 67.6 ।।

sa kṛtvā pṛthivīṃ kṛtsnāṃ śāsane pṛthivīpatiḥ | suralokamito jetumudyogamakaronnṛpaḥ || 67.6 ||

उस राजा ने सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने शासन में करके, अब देवलोक को भी जीतने का प्रयत्न आरम्भ किया।

श्लोक 7 (uttara.67.7)

इन्द्रस्य च भयं तीव्रं सुराणां च महात्मनाम् । मान्धातरि कृतोद्योगे देवलोकजिगीषया ।। 67.7 ।।

indrasya ca bhayaṃ tīvraṃ surāṇāṃ ca mahātmanām | māndhātari kṛtodyoge devalokajigīṣayā || 67.7 ||

जब मान्धाता देवलोक को जीतने की इच्छा से यह प्रयत्न करने लगे, तब इन्द्र तथा अन्य महात्मा देवताओं को घोर भय हुआ।

श्लोक 8 (uttara.67.8)

अर्धासनेन शक्रस्य राज्यार्धेन च पार्थिवः । वन्द्यमानः सुरगणैः प्रतिज्ञामध्यरोहत ।। 67.8 ।।

ardhāsanena śakrasya rājyārdhena ca pārthivaḥ | vandyamānaḥ suragaṇaiḥ pratijñāmadhyarohata || 67.8 ||

देवगणों द्वारा शक्र के आधे सिंहासन और आधे राज्य की पेशकश से सम्मानित किए जाने पर भी, वह राजा अपनी उसी प्रतिज्ञा पर अड़ा रहा।

श्लोक 9 (uttara.67.9)

तस्य पापमभिप्रायं विदित्वा पाकशासनः । सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमुवाच युवनाश्वजम् ।। 67.9 ।।

tasya pāpamabhiprāyaṃ viditvā pākaśāsanaḥ | sāntvapūrvamidaṃ vākyamuvāca yuvanāśvajam || 67.9 ||

उसके इस अनुचित अभिप्राय को जानकर, इन्द्र ने युवनाश्व-पुत्र मान्धाता से सान्त्वनापूर्वक यह वचन कहा।

श्लोक 10 (uttara.67.10)

राजा त्वं मानुषे लोके न तावत्पुरुषर्षभ । अकृत्वा पृथिवीं वश्यां देवराज्यमिहेच्छसि ।। 67.10 ।।

rājā tvaṃ mānuṣe loke na tāvatpuruṣarṣabha | akṛtvā pṛthivīṃ vaśyāṃ devarājyamihecchasi || 67.10 ||

"हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम मनुष्यलोक में अभी सम्पूर्ण पृथ्वी को भी अपने वश में नहीं कर पाए हो, और यहाँ देवताओं का राज्य पाना चाहते हो!

श्लोक 11 (uttara.67.11)

यदि वीर समग्रा ते मेदिनी निखिला वशे । देवराज्यं कुरुष्वेह सभृत्यबलवाहनः ।। 67.11 ।।

yadi vīra samagrā te medinī nikhilā vaśe | devarājyaṃ kuruṣveha sabhṛtyabalavāhanaḥ || 67.11 ||

हे वीर! यदि सम्पूर्ण पृथ्वी पूर्णतः तुम्हारे वश में आ जाए, तो अपने सेवकों, सेना और वाहनों सहित यहाँ आकर देवताओं का राज्य करना।

श्लोक 12 (uttara.67.12)

इन्द्रमेवं ब्रुवाणं तं मान्धाता वाक्यमब्रवीत् । क्व मे शक्र प्रतिहतं शासनं पृथिवीतले ।। 67.12 ।।

indramevaṃ bruvāṇaṃ taṃ māndhātā vākyamabravīt | kva me śakra pratihataṃ śāsanaṃ pṛthivītale || 67.12 ||

इस प्रकार कहते हुए इन्द्र से मान्धाता ने कहा -- "हे शक्र! पृथ्वीतल पर मेरा शासन कहाँ अस्वीकृत हुआ है?

श्लोक 13 (uttara.67.13)

तमुवाच सहस्राक्षो लवणो नाम राक्षसः । मधुपुत्रो मधुवने न ते ऽऽज्ञां कुरुते ऽनघ ।। 67.13 ।।

tamuvāca sahasrākṣo lavaṇo nāma rākṣasaḥ | madhuputro madhuvane na te ''jñāṃ kurute 'nagha || 67.13 ||

सहस्राक्ष (इन्द्र) ने उससे कहा -- "हे निष्पाप! मधु का पुत्र, लवण नामक राक्षस, मधुवन में तुम्हारी आज्ञा नहीं मानता।"

श्लोक 14 (uttara.67.14)

तच्छ्रुत्वा विप्रियं घोरं सहस्राक्षेण भाषितम् । व्रीडितो ऽवाङ्मुखो राजा व्याहर्तुं न शशाक ह ।। 67.14 ।।

tacchrutvā vipriyaṃ ghoraṃ sahasrākṣeṇa bhāṣitam | vrīḍito 'vāṅmukho rājā vyāhartuṃ na śaśāka ha || 67.14 ||

सहस्राक्ष के मुख से यह अप्रिय और भयंकर बात सुनकर, राजा लज्जित होकर मुख नीचा किए रह गया, और कुछ भी कहने में समर्थ न हो सका।

श्लोक 15 (uttara.67.15)

आमन्त्र्य तु सहस्राक्षं ह्रिया किञ्चिदवाङ्मुखः । पुनरेवागमच्छ्रीमानिमं लोकं नरेश्वरः ।। 67.15 ।।

āmantrya tu sahasrākṣaṃ hriyā kiñcidavāṅmukhaḥ | punarevāgamacchrīmānimaṃ lokaṃ nareśvaraḥ || 67.15 ||

लज्जा से कुछ मुख नीचा किए हुए ही उस श्रीमान् नरेश्वर ने सहस्राक्ष से विदा ली, और पुनः इस लोक में लौट आया।

श्लोक 16 (uttara.67.16)

स कृत्वा हृदये ऽमर्षं सभृत्यबलवाहनः । आजगाम मधोः पुत्रं वशे कर्तुमरिन्दमः ।। 67.16 ।।

sa kṛtvā hṛdaye 'marṣaṃ sabhṛtyabalavāhanaḥ | ājagāma madhoḥ putraṃ vaśe kartumarindamaḥ || 67.16 ||

अपने हृदय में असहनीय क्रोध धारण करके, वह शत्रुदमन राजा अपने सेवकों, सेना और वाहनों सहित मधुपुत्र को वश में करने के लिए वहाँ आया।

श्लोक 17 (uttara.67.17)

स काङ्क्षमाणो लवणं युद्धाय पुरुषर्षभः । दूतं सम्प्रेषयामास सकाशं लवणस्य हि ।। 67.17 ।।

sa kāṅkṣamāṇo lavaṇaṃ yuddhāya puruṣarṣabhaḥ | dūtaṃ sampreṣayāmāsa sakāśaṃ lavaṇasya hi || 67.17 ||

युद्ध की इच्छा रखने वाले उस पुरुषश्रेष्ठ ने लवण के पास एक दूत भेजा।

श्लोक 18 (uttara.67.18)

स गत्वा विप्रियाण्याह बहूनि मधुनः सुतम् । वदन्तमेवं तं दूतं भक्षयामास राक्षसः ।। 67.18 ।।

sa gatvā vipriyāṇyāha bahūni madhunaḥ sutam | vadantamevaṃ taṃ dūtaṃ bhakṣayāmāsa rākṣasaḥ || 67.18 ||

वह दूत जाकर मधुपुत्र से बहुत-सी अप्रिय बातें कहने लगा; ऐसा कहते हुए ही उस दूत को राक्षस ने खा लिया।

श्लोक 19 (uttara.67.19)

चिरायमाणे दूते तु राजा क्रोधसमन्वितः । अर्दयामास तद्रक्षः शरवृष्ट्या समन्ततः ।। 67.19 ।।

cirāyamāṇe dūte tu rājā krodhasamanvitaḥ | ardayāmāsa tadrakṣaḥ śaravṛṣṭyā samantataḥ || 67.19 ||

जब दूत बहुत देर तक नहीं लौटा, तब क्रोध से भरे राजा ने उस राक्षस को चारों ओर से बाणों की वर्षा से पीड़ित करना आरम्भ किया।

श्लोक 20 (uttara.67.20)

ततः प्रहस्य तद्रक्षः शूलं जग्राह पाणिना । वधाय सानुबन्धस्य मुमोचायुधमुत्तमम् ।। 67.20 ।।

tataḥ prahasya tadrakṣaḥ śūlaṃ jagrāha pāṇinā | vadhāya sānubandhasya mumocāyudhamuttamam || 67.20 ||

तब वह राक्षस हँसकर अपने हाथ में त्रिशूल ले आया, और राजा तथा उसके परिजनों के वध के लिए उस उत्तम अस्त्र को चला दिया।

श्लोक 21 (uttara.67.21)

तच्छूलं दीप्यमानं तु सभृत्यबलवाहनम् । भस्मीकृत्वा नृपं भूयो लवणस्यागमत्करम् ।। 67.21 ।।

tacchūlaṃ dīpyamānaṃ tu sabhṛtyabalavāhanam | bhasmīkṛtvā nṛpaṃ bhūyo lavaṇasyāgamatkaram || 67.21 ||

वह जाज्वल्यमान त्रिशूल, राजा को उसके सेवकों, सेना और वाहनों सहित भस्म करके, पुनः लवण के हाथ में लौट आया।

श्लोक 22 (uttara.67.22)

एवं स राजा सुमहान्हतः सबलवाहनः । शूलस्य तु बलं सौम्य अप्रमेयमनुत्तमम् ।। 67.22 ।।

evaṃ sa rājā sumahānhataḥ sabalavāhanaḥ | śūlasya tu balaṃ saumya aprameyamanuttamam || 67.22 ||

इस प्रकार वह महान् राजा अपनी सेना और वाहनों सहित नष्ट हो गया। हे सौम्य! उस त्रिशूल का बल अतुलनीय और सर्वोत्तम है।

श्लोक 23 (uttara.67.23)

श्वः प्रभाते तु लवणं वधिष्यसि न संशयः । अगृहीतायुधं क्षिप्रं ध्रुवो हि विजयस्तव ।। 67.23 ।।

śvaḥ prabhāte tu lavaṇaṃ vadhiṣyasi na saṃśayaḥ | agṛhītāyudhaṃ kṣipraṃ dhruvo hi vijayastava || 67.23 ||

किन्तु कल प्रातःकाल तुम निश्चय ही लवण का वध कर दोगे, यदि वह शीघ्र ही शस्त्रहीन मिल जाए; तुम्हारी विजय निश्चित है।

श्लोक 24 (uttara.67.24)

लोकानां स्वस्ति चैव स्यात्कृते कर्मणि च त्वया । एतत्ते सर्वमाख्यातं लवणस्य दुरात्मनः ।। 67.24 ।।

lokānāṃ svasti caiva syātkṛte karmaṇi ca tvayā | etatte sarvamākhyātaṃ lavaṇasya durātmanaḥ || 67.24 ||

यह कार्य तुम्हारे द्वारा सम्पन्न होने पर संसार का कल्याण होगा। यह मैंने तुम्हें उस दुरात्मा लवण के विषय में सब कुछ बता दिया है।

श्लोक 25 (uttara.67.25)

शूलस्य च बलं घोरमप्रमेयं नरर्षभ । विनाशश्चैव मान्धातुर्यत्तेनाभूच्च पार्थिव ।। 67.25 ।।

śūlasya ca balaṃ ghoramaprameyaṃ nararṣabha | vināśaścaiva māndhāturyattenābhūcca pārthiva || 67.25 ||

हे नरश्रेष्ठ! उस त्रिशूल का बल भयंकर और अतुलनीय है, और उसी के कारण, हे राजन्, मान्धाता का विनाश हुआ था।

श्लोक 26 (uttara.67.26)

त्वं श्वः प्रभाते लवणं महात्मन्वधिष्यसे नात्र तु संशयो मे । शूलं विना निर्गतमामिषार्थे ध्रुवो जयस्ते भविता नरेन्द्र ।। 67.26 ।।

tvaṃ śvaḥ prabhāte lavaṇaṃ mahātmanvadhiṣyase nātra tu saṃśayo me | śūlaṃ vinā nirgatamāmiṣārthe dhruvo jayaste bhavitā narendra || 67.26 ||

हे महात्मन्! कल प्रातःकाल तुम लवण का वध करोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है; क्योंकि वह आहार की खोज में त्रिशूल के बिना ही निकलेगा। हे नरेन्द्र! तुम्हारी विजय निश्चित है।

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