उत्तरकाण्ड · सर्ग 70
मधुपुरी की स्थापना
श्लोक 1 (uttara.70.1)
हते तु लवणे देवाः सेन्द्राः साग्निपुरोगमाः । ऊचुः सुमधुरां वाणीं शत्रुघ्नं शत्रुतापनम् ।। 70.1 ।।
hate tu lavaṇe devāḥ sendrāḥ sāgnipurogamāḥ | ūcuḥ sumadhurāṃ vāṇīṃ śatrughnaṃ śatrutāpanam || 70.1 ||
लवण के मारे जाने पर, इन्द्र तथा अग्नि आदि देवगण आगे आकर, शत्रुओं को संतप्त करने वाले शत्रुघ्न से अत्यन्त मधुर वाणी में बोले।
श्लोक 2 (uttara.70.2)
दिष्ट्या ते विजयो वत्स दिष्ट्या लवणराक्षसः । हतः पुरुषशार्दूल वरं वरय सुव्रत ।। 70.2 ।।
diṣṭyā te vijayo vatsa diṣṭyā lavaṇarākṣasaḥ | hataḥ puruṣaśārdūla varaṃ varaya suvrata || 70.2 ||
"हे वत्स! यह बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हारी विजय हुई; बड़े सौभाग्य से ही राक्षस लवण मारा गया। हे पुरुषश्रेष्ठ, हे सुव्रत! अब कोई वरदान माँगो।
श्लोक 3 (uttara.70.3)
वरदास्तु महाबाहो सर्व एव समागताः । विजयाकाङ्क्षिणस्तुभ्यममोघं दर्शनं हि नः ।। 70.3 ।।
varadāstu mahābāho sarva eva samāgatāḥ | vijayākāṅkṣiṇastubhyamamoghaṃ darśanaṃ hi naḥ || 70.3 ||
हे महाबाहो! हम सब यहाँ वर देने के लिए ही एकत्र हुए हैं, तुम्हारी विजय की कामना करते हुए; हमारा दर्शन कभी निष्फल नहीं होता।
श्लोक 4 (uttara.70.4)
देवानां भाषितं श्रुत्वा शूरो मूर्ध्नि कृताञ्जलिः । प्रत्युवाच महाबाहुः शत्रुघ्नः प्रयतात्मवान् ।। 70.4 ।।
devānāṃ bhāṣitaṃ śrutvā śūro mūrdhni kṛtāñjaliḥ | pratyuvāca mahābāhuḥ śatrughnaḥ prayatātmavān || 70.4 ||
देवताओं की यह बात सुनकर, वह शूरवीर, संयतचित्त, महाबाहु शत्रुघ्न सिर पर हाथ जोड़कर बोले।
श्लोक 5 (uttara.70.5)
इयं मधुपुरी रस्या मधुरा देवनिर्मिता । निवेशं प्राप्नुयाच्छीघ्रमेष मे ऽस्तु वरः परः ।। 70.5 ।।
iyaṃ madhupurī rasyā madhurā devanirmitā | niveśaṃ prāpnuyācchīghrameṣa me 'stu varaḥ paraḥ || 70.5 ||
"यह रम्य और मधुर मधुपुरी नगरी देवताओं द्वारा निर्मित है; यह शीघ्र ही सुव्यवस्थित बस्ती को प्राप्त करे -- यही मेरा सर्वोत्तम वरदान हो।
श्लोक 6 (uttara.70.6)
तं देवाः प्रीतमनसो बाढमित्येव राघवम् । भविष्यति पुरी रम्या शूरसेना न संशयः ।। 70.6 ।।
taṃ devāḥ prītamanaso bāḍhamityeva rāghavam | bhaviṣyati purī ramyā śūrasenā na saṃśayaḥ || 70.6 ||
प्रसन्नचित्त देवताओं ने राघव से "ऐसा ही हो" कहा -- "यह नगरी रमणीय शूरसेन नाम से प्रसिद्ध होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।"
श्लोक 7 (uttara.70.7)
ते तथोक्त्वा महात्मानो दिवमारुरुहुस्तदा । शत्रुघ्नो ऽपि महातेजास्तां सेनां समुपानयत् ।। 70.7 ।।
te tathoktvā mahātmāno divamāruruhustadā | śatrughno 'pi mahātejāstāṃ senāṃ samupānayat || 70.7 ||
यह कहकर वे महात्मा देवगण स्वर्गलोक को चले गए। महातेजस्वी शत्रुघ्न ने भी अपनी सेना को वहाँ बुला लिया।
श्लोक 8 (uttara.70.8)
सा सेना शीघ्रमागच्छच्छ्रुत्वा शत्रुघ्नशासनम् । निवेशनं च शत्रुघ्नः श्रावणेन समारभत् ।। 70.8 ।।
sā senā śīghramāgacchacchrutvā śatrughnaśāsanam | niveśanaṃ ca śatrughnaḥ śrāvaṇena samārabhat || 70.8 ||
शत्रुघ्न की आज्ञा सुनकर वह सेना शीघ्र ही वहाँ आ पहुँची, और शत्रुघ्न ने श्रावण मास में नगर-निर्माण का कार्य आरम्भ किया।
श्लोक 9 (uttara.70.9)
सा पुरा दिव्यसङ्काशा वर्षे द्वादशमे शुभे । निविष्टा शूरसेनानां विषयश्चाकुतोभयः ।। 70.9 ।।
sā purā divyasaṅkāśā varṣe dvādaśame śubhe | niviṣṭā śūrasenānāṃ viṣayaścākutobhayaḥ || 70.9 ||
वह दिव्यकान्तिमान् नगरी बारहवें शुभ वर्ष में पूर्णतया बस गई, और शूरसेन देश निर्भय हो गया।
श्लोक 10 (uttara.70.10)
क्षेत्राणि सस्ययुक्तानि काले वर्षति वासवः । अरोगवीरपुरुषा शत्रुघ्नभुजपालिता ।। 70.10 ।।
kṣetrāṇi sasyayuktāni kāle varṣati vāsavaḥ | arogavīrapuruṣā śatrughnabhujapālitā || 70.10 ||
उस देश के खेत फसलों से भरे रहते थे, इन्द्रदेव समय पर वर्षा करते थे, वहाँ के लोग नीरोग और वीर थे, और वह सारा प्रदेश शत्रुघ्न की भुजाओं से पालित था।
श्लोक 11 (uttara.70.11)
अर्धचन्द्रप्रतीकाशा यमुनातीरशोभिता । शोभिता गृहमुख्यैश्च चत्वरापणवीथिकैः । चातुर्वर्ण्यसमायुक्ता नानावाणिज्यशोभिता ।। 70.11 ।।
ardhacandrapratīkāśā yamunātīraśobhitā | śobhitā gṛhamukhyaiśca catvarāpaṇavīthikaiḥ | cāturvarṇyasamāyuktā nānāvāṇijyaśobhitā || 70.11 ||
वह नगरी अर्धचन्द्र के समान सुशोभित थी, यमुना के तट पर शोभायमान थी, उत्तम भवनों, चौराहों, बाज़ारों तथा गलियों से सुसज्जित थी, चारों वर्णों से युक्त थी, और नाना प्रकार के व्यापार से समृद्ध थी।
श्लोक 12 (uttara.70.12)
यच्च तेन पुरा शुभ्रं लवणेन कृतं महत् । तच्छोभयति शत्रुघ्नो नानावर्णोपशोभिताम् ।। 70.12 ।।
yacca tena purā śubhraṃ lavaṇena kṛtaṃ mahat | tacchobhayati śatrughno nānāvarṇopaśobhitām || 70.12 ||
जो कुछ उस लवण ने पूर्व में उस विशाल एवं भव्य नगरी में बनवाया था, शत्रुघ्न ने उसी को नाना वर्णों से सुसज्जित करके और भी शोभायमान बना दिया।
श्लोक 13 (uttara.70.13)
आरामैश्च विहारैश्च शोभमानं समन्ततः । शोभितां शोभनीयैश्च तथा ऽन्यैर्दैवमानुषैः ।। 70.13 ।।
ārāmaiśca vihāraiśca śobhamānaṃ samantataḥ | śobhitāṃ śobhanīyaiśca tathā 'nyairdaivamānuṣaiḥ || 70.13 ||
वह नगरी चारों ओर उद्यानों और विहार-स्थलों से सुशोभित थी, तथा अन्य देवकृत और मनुष्यकृत सुन्दर वस्तुओं से भी अलंकृत थी।
श्लोक 14 (uttara.70.14)
तां पुरीं दिव्यसङ्काशां नानापण्योपशोभिताम् । नानादेशागतैश्चापि वणिग्भिरुपशोभिताम् ।। 70.14 ।।
tāṃ purīṃ divyasaṅkāśāṃ nānāpaṇyopaśobhitām | nānādeśāgataiścāpi vaṇigbhirupaśobhitām || 70.14 ||
वह दिव्यकान्तिमान् नगरी नाना प्रकार की वस्तुओं से सुशोभित थी, तथा विभिन्न देशों से आए हुए व्यापारियों से भी सुसज्जित थी।
श्लोक 15 (uttara.70.15)
तां समृद्धां समृद्धार्थः शत्रुघ्नो भरतानुजः । निरीक्ष्य परमप्रीतः परं हर्षमुपागमत् ।। 70.15 ।।
tāṃ samṛddhāṃ samṛddhārthaḥ śatrughno bharatānujaḥ | nirīkṣya paramaprītaḥ paraṃ harṣamupāgamat || 70.15 ||
उस समृद्ध नगरी को देखकर, स्वयं समृद्धिशाली भरत के छोटे भाई शत्रुघ्न को अत्यन्त प्रसन्नता हुई, और वे परम हर्ष को प्राप्त हुए।
श्लोक 16 (uttara.70.16)
तस्य बुद्धिः समुत्पन्ना निवेश्य मधुरां पुरीम् । रामपादौ निरीक्षे ऽहं वर्षे द्वादश आगते ।। 70.16 ।।
tasya buddhiḥ samutpannā niveśya madhurāṃ purīm | rāmapādau nirīkṣe 'haṃ varṣe dvādaśa āgate || 70.16 ||
मधुरा नगरी को इस प्रकार बसाकर, उनके मन में यह विचार उत्पन्न हुआ -- "अब बारहवाँ वर्ष आ जाने पर मैं राम के चरणों के दर्शन करूँगा।"
श्लोक 17 (uttara.70.17)
ततः स ताममरपुरोपमां पुरीं निवेश्य वै विविधजनाभिसंवृताम् । नराधिपो रघुपतिपाददर्शने दधे मतिं रघुकुलवंशवर्धनः ।। 70.17 ।।
tataḥ sa tāmamarapuropamāṃ purīṃ niveśya vai vividhajanābhisaṃvṛtām | narādhipo raghupatipādadarśane dadhe matiṃ raghukulavaṃśavardhanaḥ || 70.17 ||
इस प्रकार देवनगरी के समान उस नगरी को नाना प्रकार के लोगों से भरकर बसाने के बाद, रघुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले उस राजा ने रघुपति के चरण-दर्शन का ही मन में संकल्प किया।