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उत्तरकाण्ड · सर्ग 71

शत्रुघ्न का वाल्मीकि-आश्रम में आगमन

सर्ग 70सर्ग-सूचीसर्ग 72

श्लोक 1 (uttara.71.1)

ततो द्वादशमे वर्षे शत्रुघ्नो रामपालिताम् । अयोध्यां चकमे गन्तुमल्पभृत्यबलानुगः ।। 71.1 ।।

tato dvādaśame varṣe śatrughno rāmapālitām | ayodhyāṃ cakame gantumalpabhṛtyabalānugaḥ || 71.1 ||

तब बारहवें वर्ष में, राम द्वारा पालित शत्रुघ्न अल्प सेवकों और सेना के साथ अयोध्या जाने की इच्छा करने लगे।

श्लोक 2 (uttara.71.2)

ततो मन्त्रिपुरोगांश्च बलमुख्यान्निवर्त्य च । जगाम हयमुख्यैश्च रथानां च शतेन सः ।। 71.2 ।।

tato mantripurogāṃśca balamukhyānnivartya ca | jagāma hayamukhyaiśca rathānāṃ ca śatena saḥ || 71.2 ||

तब मंत्रियों तथा सेनापतियों को लौटाकर वे उत्तम अश्वों और सौ रथों के साथ चल पड़े।

श्लोक 3 (uttara.71.3)

स गत्वा गणितान्वासान्सप्ताष्टौ रघुनन्दनः । वाल्मीक्याश्रममागत्य वासं चक्रे महायशाः ।। 71.3 ।।

sa gatvā gaṇitānvāsānsaptāṣṭau raghunandanaḥ | vālmīkyāśramamāgatya vāsaṃ cakre mahāyaśāḥ || 71.3 ||

राघुकुल के आनन्दवर्धक और महायशस्वी शत्रुघ्न ने सात-आठ रात्रियों की गिनी हुई यात्रा करके वाल्मीकि के आश्रम में पहुँचकर वहाँ निवास किया।

श्लोक 4 (uttara.71.4)

सो ऽभिवाद्य ततः पादौ वाल्मीकेः पुरुषर्षभः । पाद्यमर्ध्यं तथातिथ्यं जग्राह मुनिहस्ततः ।। 71.4 ।।

so 'bhivādya tataḥ pādau vālmīkeḥ puruṣarṣabhaḥ | pādyamardhyaṃ tathātithyaṃ jagrāha munihastataḥ || 71.4 ||

उस पुरुषश्रेष्ठ ने वाल्मीकि के चरणों में प्रणाम करके मुनि के हाथों से पाद्य, अर्घ्य और आतिथ्य ग्रहण किया।

श्लोक 5 (uttara.71.5)

बहुरूपाः सुमधुराः कथास्तत्र सहस्रशः । कथयामास स मुनिः शत्रुघ्नाय महात्मने ।। 71.5 ।।

bahurūpāḥ sumadhurāḥ kathāstatra sahasraśaḥ | kathayāmāsa sa muniḥ śatrughnāya mahātmane || 71.5 ||

वहाँ उस मुनि ने महात्मा शत्रुघ्न को नाना प्रकार की सहस्रों मधुर कथाएँ सुनाईं।

श्लोक 6 (uttara.71.6)

उवाच च मुनिर्वाक्यं लवणस्य वधाश्रितम् । सुदुष्करं कृतं कर्म लवणं निघ्नता त्वया ।। 71.6 ।।

uvāca ca munirvākyaṃ lavaṇasya vadhāśritam | suduṣkaraṃ kṛtaṃ karma lavaṇaṃ nighnatā tvayā || 71.6 ||

मुनि ने लवण के वध से संबंधित यह वचन कहा — "लवण का वध करके तुमने अत्यंत दुष्कर कार्य किया है।"

श्लोक 7 (uttara.71.7)

बहवः पार्थिवाः सौम्य हताः सबलवाहनाः । लवणेन महाबाहो युध्यमाना महाबलाः ।। 71.7 ।।

bahavaḥ pārthivāḥ saumya hatāḥ sabalavāhanāḥ | lavaṇena mahābāho yudhyamānā mahābalāḥ || 71.7 ||

हे सौम्य! हे महाबाहो! युद्ध करते हुए बहुत-से बलवान राजा अपनी सेना और वाहनों सहित लवण द्वारा मारे गए थे।

श्लोक 8 (uttara.71.8)

स त्वया निहतः पापो लीलया पुरुषर्षभ । जगतश्च भयं तत्र प्रशान्तं तव तेजसा ।। 71.8 ।।

sa tvayā nihataḥ pāpo līlayā puruṣarṣabha | jagataśca bhayaṃ tatra praśāntaṃ tava tejasā || 71.8 ||

हे पुरुषश्रेष्ठ! उस पापी को तुमने खेल-खेल में मार डाला और तुम्हारे तेज से संसार का भय शांत हो गया।

श्लोक 9 (uttara.71.9)

रावणस्य वधो घोरो यत्नेन महता कृतः । इदं तु सुमहत्कर्म त्वया कृतमयत्नतः ।। 71.9 ।।

rāvaṇasya vadho ghoro yatnena mahatā kṛtaḥ | idaṃ tu sumahatkarma tvayā kṛtamayatnataḥ || 71.9 ||

रावण का भयंकर वध बड़े प्रयत्न से किया गया था, किन्तु यह अत्यंत महान कार्य तुमने बिना किसी प्रयास के कर दिखाया।

श्लोक 10 (uttara.71.10)

प्रीतिश्चास्मिन्परा जाता देवानां लवणे हते । भूतानां चैव सर्वेषां जगतश्च प्रियं कृतम् ।। 71.10 ।।

prītiścāsminparā jātā devānāṃ lavaṇe hate | bhūtānāṃ caiva sarveṣāṃ jagataśca priyaṃ kṛtam || 71.10 ||

लवण के मारे जाने पर देवताओं को परम प्रसन्नता हुई है और यह समस्त प्राणियों तथा जगत के लिए हितकारी कार्य हुआ है।

श्लोक 11 (uttara.71.11)

तच्च युद्धं मया दृष्टं यथावत्पुरुषर्षभ । सभायां वासवस्याथ उपविष्टेन राघव ।। 71.11 ।।

tacca yuddhaṃ mayā dṛṣṭaṃ yathāvatpuruṣarṣabha | sabhāyāṃ vāsavasyātha upaviṣṭena rāghava || 71.11 ||

हे पुरुषश्रेष्ठ राघव! वह युद्ध मैंने इन्द्र की सभा में बैठे हुए यथावत् देखा था।

श्लोक 12 (uttara.71.12)

ममापि परमा प्रीतिर्हृदि शत्रुघ्न वर्तते । उपाघ्रास्यामि ते मूर्ध्नि स्नेहस्यैषा परा गतिः ।। 71.12 ।।

mamāpi paramā prītirhṛdi śatrughna vartate | upāghrāsyāmi te mūrdhni snehasyaiṣā parā gatiḥ || 71.12 ||

हे शत्रुघ्न! मेरे हृदय में भी परम प्रसन्नता है। मैं तुम्हारे मस्तक को सूँघूँगा (आशीर्वाद स्वरूप) — यही स्नेह की चरम अभिव्यक्ति है।

श्लोक 13 (uttara.71.13)

इत्युक्त्वा मूर्ध्नि शत्रुघ्नमुपाघ्राय महामुनिः । आतिथ्यमकरोत्तस्य ये च तस्य पदानुगाः ।। 71.13 ।।

ityuktvā mūrdhni śatrughnamupāghrāya mahāmuniḥ | ātithyamakarottasya ye ca tasya padānugāḥ || 71.13 ||

ऐसा कहकर उस महामुनि ने शत्रुघ्न के मस्तक को चूमा और उनका तथा उनके साथ आए हुए अनुचरों का आतिथ्य-सत्कार किया।

श्लोक 14 (uttara.71.14)

स भुक्तवान्नरश्रेष्ठो गीतमाधुर्यमुत्तमम् । शुश्राव रामचरितं तस्मिन्काले यथाकृमम् ।। 71.14 ।।

sa bhuktavānnaraśreṣṭho gītamādhuryamuttamam | śuśrāva rāmacaritaṃ tasminkāle yathākṛmam || 71.14 ||

वह नरश्रेष्ठ भोजन करने के पश्चात् उस समय गीत की उत्तम मधुरता में क्रमशः वर्णित रामचरित को सुनने लगे।

श्लोक 15 (uttara.71.15)

तन्त्रीलयसमायुक्तं त्रिस्थानकरणान्वितम् । संस्कृतं लक्षणोपेतं समतालसमन्वितम् । शुश्राव रामचरितं तस्मिन्काले पुरा कृतम् ।। 71.15 ।।

tantrīlayasamāyuktaṃ tristhānakaraṇānvitam | saṃskṛtaṃ lakṣaṇopetaṃ samatālasamanvitam | śuśrāva rāmacaritaṃ tasminkāle purā kṛtam || 71.15 ||

वह वीणा की लय से युक्त, त्रिस्थानसंचारी स्वरों से सम्पन्न, परिष्कृत, लक्षणयुक्त तथा समतालबद्ध रामचरित को, जो पूर्वकाल में ही रचा जा चुका था, उस समय सुनने लगे।

श्लोक 16 (uttara.71.16)

तान्यक्षराणि सत्यानि यथावृत्तानि पूर्वशः । श्रुत्वा पुरुषशार्दूलो विसञ्ज्ञो बाष्पलोचनः ।। 71.16 ।।

tānyakṣarāṇi satyāni yathāvṛttāni pūrvaśaḥ | śrutvā puruṣaśārdūlo visañjño bāṣpalocanaḥ || 71.16 ||

उन सत्य शब्दों को, जो पूर्व में घटित घटनाओं के अनुरूप ही थे, सुनकर वह पुरुषसिंह चेतनाशून्य-सा हो गया और उसके नेत्रों में आँसू भर आए।

श्लोक 17 (uttara.71.17)

स मुहूर्तमिवासञ्ज्ञो विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः । तस्मिन् गीते यथावृत्तं वर्तमानमिवाशृणोत् ।। 71.17 ।।

sa muhūrtamivāsañjño viniḥśvasya muhurmuhuḥ | tasmin gīte yathāvṛttaṃ vartamānamivāśṛṇot || 71.17 ||

वह क्षणभर के लिए मानो चेतनाशून्य हो गया और बार-बार दीर्घ श्वास लेने लगा; उस गीत में वर्णित बीती हुई घटनाओं को मानो वर्तमान में घटित होते हुए सुन रहा हो।

श्लोक 18 (uttara.71.18)

पदानुगाश्च ये राज्ञस्तां श्रुत्वा गीतिसम्पदम् । अवाङ्मुखाश्च दीनाश्च ह्याश्चर्यमिति चाब्रुवन् ।। 71.18 ।।

padānugāśca ye rājñastāṃ śrutvā gītisampadam | avāṅmukhāśca dīnāśca hyāścaryamiti cābruvan || 71.18 ||

राजा के अनुगामी भी उस गीत-संपदा को सुनकर सिर झुकाए हुए दीन हो गए और कहने लगे — "यह कैसा आश्चर्य है!"

श्लोक 19 (uttara.71.19)

परस्परं च ये तत्र सैनिकाः सम्बभाषिरे । किमिदं क्व च वर्तामः किमेतत्स्वप्नदर्शनम् ।। 71.19 ।।

parasparaṃ ca ye tatra sainikāḥ sambabhāṣire | kimidaṃ kva ca vartāmaḥ kimetatsvapnadarśanam || 71.19 ||

वहाँ उपस्थित सैनिक आपस में कहने लगे — "यह क्या है? हम कहाँ हैं? क्या यह कोई स्वप्न-दर्शन है?"

श्लोक 20 (uttara.71.20)

अर्थो यो नः पुरा दृष्टस्तमाश्रमपदे पुनः । शृणुमः किमिदं स्वप्नो गीतबन्धं श्रियो भवेत् ।। 71.20 ।।

artho yo naḥ purā dṛṣṭastamāśramapade punaḥ | śṛṇumaḥ kimidaṃ svapno gītabandhaṃ śriyo bhavet || 71.20 ||

जो घटना हमने पहले प्रत्यक्ष देखी थी, वही अब हम इस आश्रम-स्थल में गीत के रूप में पुनः सुन रहे हैं। क्या यह स्वप्न है? यह कैसा वैभव संभव हो सका?

श्लोक 21 (uttara.71.21)

विस्मयं ते परं गत्वा शत्रुघ्नमिदमब्रुवन् । साधु पृच्छ नरश्रेष्ठ वाल्मीकिं मुनिपुङ्गवम् ।। 71.21 ।।

vismayaṃ te paraṃ gatvā śatrughnamidamabruvan | sādhu pṛccha naraśreṣṭha vālmīkiṃ munipuṅgavam || 71.21 ||

अत्यंत विस्मय में पड़कर उन्होंने शत्रुघ्न से कहा — "हे नरश्रेष्ठ! मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि से भलीभाँति पूछिए।"

श्लोक 22 (uttara.71.22)

शत्रुघ्नस्त्वब्रवीत्सर्वान्कौतूहलसमन्वितान् । सैनिका न क्षमो ऽस्माकं परिप्रष्टुमिहेदृशः ।। 71.22 ।।

śatrughnastvabravītsarvānkautūhalasamanvitān | sainikā na kṣamo 'smākaṃ paripraṣṭumihedṛśaḥ || 71.22 ||

शत्रुघ्न ने कौतूहल से भरे हुए उन सबसे कहा — "हे सैनिको! ऐसे महापुरुष से इस प्रकार पूछना हमारे लिए उचित नहीं है।"

श्लोक 23 (uttara.71.23)

आश्चर्याणि बहूनीह भवन्त्यस्याश्रमे मुनेः । न तु कौतूहलाद्युक्तमन्वेष्टुं तं महामुनिम् ।। 71.23 ।।

āścaryāṇi bahūnīha bhavantyasyāśrame muneḥ | na tu kautūhalādyuktamanveṣṭuṃ taṃ mahāmunim || 71.23 ||

इस मुनि के आश्रम में ऐसे अनेक आश्चर्य होते रहते हैं, किन्तु केवल कौतूहलवश उस महामुनि से पूछना उचित नहीं है।

श्लोक 24 (uttara.71.24)

एवं तद्वाक्यमुक्त्वा च सैनिकान्रघुनन्दनः । अभिवाद्य महर्षिं तं स्वं निवेशं ययौ तदा ।। 71.24 ।।

evaṃ tadvākyamuktvā ca sainikānraghunandanaḥ | abhivādya maharṣiṃ taṃ svaṃ niveśaṃ yayau tadā || 71.24 ||

सैनिकों से इस प्रकार कहकर रघुनन्दन शत्रुघ्न ने उस महर्षि को प्रणाम किया और तत्पश्चात् अपने निवास-स्थान को चले गए।

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