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उत्तरकाण्ड · सर्ग 74

नारद का युगधर्म-प्रवचन

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श्लोक 1 (uttara.74.1)

तथा तु करुणं तस्य द्विजस्य परिदेवनम् । शुश्राव राघवः सर्वं दुःखशोकसमन्वितम् ।। 74.1 ।।

tathā tu karuṇaṃ tasya dvijasya paridevanam | śuśrāva rāghavaḥ sarvaṃ duḥkhaśokasamanvitam || 74.1 ||

राघव ने उस ब्राह्मण के दुःख और शोक से भरे हुए उस करुण विलाप को पूरी तरह सुना।

श्लोक 2 (uttara.74.2)

स दुःखेन च सन्तप्तो मन्त्रिणस्तानुपाह्वयत् । वसिष्ठं वामदेवं च भ्रातरौ सह नैगमान् ।। 74.2 ।।

sa duḥkhena ca santapto mantriṇastānupāhvayat | vasiṣṭhaṃ vāmadevaṃ ca bhrātarau saha naigamān || 74.2 ||

दुःख से संतप्त होकर उन्होंने अपने मंत्रियों — वसिष्ठ और वामदेव — को तथा अपने भाइयों एवं नगर के प्रमुख जनों को बुलवाया।

श्लोक 3 (uttara.74.3)

ततो द्विजा वसिष्ठेन सार्धमष्टौ प्रवेशिताः । राजानं देवसङ्काशं वर्धस्वेति ततो ऽब्रुवन् ।। 74.3 ।।

tato dvijā vasiṣṭhena sārdhamaṣṭau praveśitāḥ | rājānaṃ devasaṅkāśaṃ vardhasveti tato 'bruvan || 74.3 ||

तब वसिष्ठ सहित आठ ब्राह्मणों को भीतर लाया गया, जिन्होंने देवतुल्य राजा से कहा — "आपकी जय हो!"

श्लोक 4 (uttara.74.4)

मार्कण्डेयो ऽथ मौद्गल्यो वामदेवश्च काश्यपः । कात्यायनो ऽथ जाबालिर्गौतमो नारदस्तथा । एते द्विजर्षभाः सर्वे आसनेषूपवेशिताः ।। 74.4 ।।

mārkaṇḍeyo 'tha maudgalyo vāmadevaśca kāśyapaḥ | kātyāyano 'tha jābālirgautamo nāradastathā | ete dvijarṣabhāḥ sarve āsaneṣūpaveśitāḥ || 74.4 ||

मार्कण्डेय, मौद्गल्य, वामदेव, काश्यप, कात्यायन, जाबालि, गौतम तथा नारद — ये सभी श्रेष्ठ द्विज अपने-अपने आसनों पर बिठाए गए।

श्लोक 5 (uttara.74.5)

महर्षीन्समनुप्राप्तानभिवाद्य कृताञ्जलिः । मन्त्रिणो नैगमांश्चैव यथार्हमनुकूलतः ।। 74.5 ।।

maharṣīnsamanuprāptānabhivādya kṛtāñjaliḥ | mantriṇo naigamāṃścaiva yathārhamanukūlataḥ || 74.5 ||

हाथ जोड़कर उन्होंने आए हुए महर्षियों को तथा मंत्रियों और नगरजनों को यथोचित रूप से प्रणाम किया।

श्लोक 6 (uttara.74.6)

तेषां समुपविष्टानां सर्वेषां दीप्ततेजसाम् । राघवः सर्वमाचष्टे द्विजो ऽयमुपरोधते ।। 74.6 ।।

teṣāṃ samupaviṣṭānāṃ sarveṣāṃ dīptatejasām | rāghavaḥ sarvamācaṣṭe dvijo 'yamuparodhate || 74.6 ||

जब तेजस्वी सभी लोग बैठ गए, तब राघव ने सारा वृत्तांत सुनाया — "यह ब्राह्मण मुझे अत्यंत विवश कर रहा है।"

श्लोक 7 (uttara.74.7)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राज्ञो दीनस्य नारदः । प्रत्युवाच शुभं वाक्यमृषीणां सन्निधौ नृपम् ।। 74.7 ।।

tasya tadvacanaṃ śrutvā rājño dīnasya nāradaḥ | pratyuvāca śubhaṃ vākyamṛṣīṇāṃ sannidhau nṛpam || 74.7 ||

दुःखी राजा की उस बात को सुनकर नारद ने ऋषियों की उपस्थिति में राजा को शुभ वचन कहे।

श्लोक 8 (uttara.74.8)

शृणु राजन्यथाकाले प्राप्तो बालस्य सङ्क्षयः । श्रुत्वा कर्तव्यतां राजन्कुरुष्वरघुनन्दन ।। 74.8 ।।

śṛṇu rājanyathākāle prāpto bālasya saṅkṣayaḥ | śrutvā kartavyatāṃ rājankuruṣvaraghunandana || 74.8 ||

"हे राजन्! सुनो, बालक का यह असामयिक विनाश किस प्रकार हुआ। हे रघुनन्दन! यह सुनकर जो कर्तव्य हो, वह करना।"

श्लोक 9 (uttara.74.9)

पुरा कृतयुगे राजन्ब्राह्मणा वै तपस्विनः । अब्राह्मणस्तदा राजन्न तपस्वी कथञ्चन ।। 74.9 ।।

purā kṛtayuge rājanbrāhmaṇā vai tapasvinaḥ | abrāhmaṇastadā rājanna tapasvī kathañcana || 74.9 ||

"हे राजन्! पूर्वकाल में, कृतयुग में, केवल ब्राह्मण ही तपस्या करते थे। हे राजन्! उस समय कोई भी अब्राह्मण किसी भी प्रकार तपस्वी नहीं होता था।"

श्लोक 10 (uttara.74.10)

तस्मिन्युगे प्रज्वलिते ब्रह्मभूते त्वनावृते । अमृत्यवस्तदा सर्वे जज्ञिरे दीर्घदर्शिनः ।। 74.10 ।।

tasminyuge prajvalite brahmabhūte tvanāvṛte | amṛtyavastadā sarve jajñire dīrghadarśinaḥ || 74.10 ||

"उस प्रज्वलित, ब्रह्ममय तथा अनावृत युग में, उस समय सभी प्राणी मृत्युरहित तथा दूरदर्शी उत्पन्न होते थे।"

श्लोक 11 (uttara.74.11)

ततस्त्रेतायुगं नाम मानवानां वपुष्मताम् । क्षत्रियास्तत्र जायन्ते पूर्णेन तपसा ऽन्विताः ।। 74.11 ।।

tatastretāyugaṃ nāma mānavānāṃ vapuṣmatām | kṣatriyāstatra jāyante pūrṇena tapasā 'nvitāḥ || 74.11 ||

"उसके पश्चात् मनुष्यों का त्रेतायुग नामक युग आया, जिसमें क्षत्रिय भी पूर्ण तपस्या से युक्त होकर उत्पन्न होने लगे।"

श्लोक 12 (uttara.74.12)

वीर्येण तपसा चैव ते ऽधिकाः पूर्वजन्मनि । मानवा ये महात्मानस्त्वत्र त्रेतायुगे युगे ।। 74.12 ।।

vīryeṇa tapasā caiva te 'dhikāḥ pūrvajanmani | mānavā ye mahātmānastvatra tretāyuge yuge || 74.12 ||

"उस त्रेतायुग में जो महात्मा मनुष्य थे, वे अपने पूर्वजन्म के कारण पराक्रम और तप दोनों में अधिक थे।"

श्लोक 13 (uttara.74.13)

ब्रह्मक्षत्रं च तत्सर्वं यत्पूर्वमपरं च यत् । युगयोरुभयोरासीत्समवीर्यसमन्वितम् ।। 74.13 ।।

brahmakṣatraṃ ca tatsarvaṃ yatpūrvamaparaṃ ca yat | yugayorubhayorāsītsamavīryasamanvitam || 74.13 ||

"उस समय ब्राह्मण और क्षत्रिय — दोनों वर्ग — चाहे पूर्वयुग के हों या परवर्ती, दोनों ही युगों में समान पराक्रम से युक्त थे।"

श्लोक 14 (uttara.74.14)

अपश्यंस्तु न ते सर्वे विशेषमधिकं ततः । स्थापनं चक्रिरे तत्र चातुर्वर्ण्यस्य सम्मतम् ।। 74.14 ।।

apaśyaṃstu na te sarve viśeṣamadhikaṃ tataḥ | sthāpanaṃ cakrire tatra cāturvarṇyasya sammatam || 74.14 ||

"चूँकि उन्हें इससे अधिक कोई विशेष भेद दिखाई नहीं दिया, इसलिए उन्होंने वहाँ चातुर्वर्ण्य की सर्वसम्मत व्यवस्था स्थापित की।"

श्लोक 15 (uttara.74.15)

तस्मिन्युगे प्रज्वलिते धर्मभूते ह्यनावृते । अधर्मः पादमेकं तु पातयत्पृथिवीतले ।। 74.15 ।।

tasminyuge prajvalite dharmabhūte hyanāvṛte | adharmaḥ pādamekaṃ tu pātayatpṛthivītale || 74.15 ||

"उस प्रज्वलित, धर्ममय तथा अनावृत युग में भी अधर्म ने पृथ्वीतल पर अपना एक पैर रख दिया।"

श्लोक 16 (uttara.74.16)

अधर्मेण हि संयुक्तस्तेजो मन्दं भविष्यति ।। 74.16 ।।

adharmeṇa hi saṃyuktastejo mandaṃ bhaviṣyati || 74.16 ||

"क्योंकि अधर्म से युक्त होने के कारण तेज मंद हो जाने वाला था।"

श्लोक 17 (uttara.74.17)

आमिषं यच्च पूर्वेषां राजसं च मलं भृशम् । अनृतं नाम तद्भूतं पादेन पृथिवीतले ।। 74.17 ।।

āmiṣaṃ yacca pūrveṣāṃ rājasaṃ ca malaṃ bhṛśam | anṛtaṃ nāma tadbhūtaṃ pādena pṛthivītale || 74.17 ||

"पूर्वजनों में जो लोभ (आमिष) तथा राजसिक मल प्रबल रूप में था, वही असत्य (अनृत) के रूप में पृथ्वीतल पर [अधर्म का] एक पैर बन गया।"

श्लोक 18 (uttara.74.18)

अनृतं पातयित्वा तु पादमेकमधर्मतः । ततः प्रादुष्कृतं पूर्वमायुषः परिनिष्ठितम् ।। 74.18 ।।

anṛtaṃ pātayitvā tu pādamekamadharmataḥ | tataḥ prāduṣkṛtaṃ pūrvamāyuṣaḥ pariniṣṭhitam || 74.18 ||

"इस प्रकार अधर्मवश असत्य को अपना एक पैर बनाकर स्थापित करने के बाद, इससे पहले जो आयु पूर्ण और सुनिश्चित थी, वह क्षीण होने लगी।"

श्लोक 19 (uttara.74.19)

पतिते त्वनृते तस्मिन्नधर्मे च महीतले । शुभान्येवाचरँल्लोकः सत्यधर्मपरायणः ।। 74.19 ।।

patite tvanṛte tasminnadharme ca mahītale | śubhānyevācara~llokaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ || 74.19 ||

"इस प्रकार असत्य और अधर्म के पृथ्वी पर आ जाने पर भी, लोग सत्य और धर्म में परायण रहते हुए केवल शुभ कर्म ही करते रहे।"

श्लोक 20 (uttara.74.20)

त्रेतायुगे च वर्तन्ते ब्राह्मणाः क्षत्रियाश्च ये । तपो ऽतप्यन्त ते सर्वे शुश्रूषामपरे जनाः ।। 74.20 ।।

tretāyuge ca vartante brāhmaṇāḥ kṣatriyāśca ye | tapo 'tapyanta te sarve śuśrūṣāmapare janāḥ || 74.20 ||

"त्रेतायुग में जो ब्राह्मण और क्षत्रिय थे, वे सभी तपस्या करते थे, और शेष लोग सेवा-कार्य में लगे रहते थे।"

श्लोक 21 (uttara.74.21)

स धर्मः परमस्तेषां वैश्यशूद्रं समागमत् । पूजां च सर्ववर्णानां शूद्राश्चक्रुर्विशेषतः ।। 74.21 ।।

sa dharmaḥ paramasteṣāṃ vaiśyaśūdraṃ samāgamat | pūjāṃ ca sarvavarṇānāṃ śūdrāścakrurviśeṣataḥ || 74.21 ||

"यही उनका सर्वोच्च धर्म था, जो वैश्य और शूद्र में भी समान रूप से व्याप्त था; और शूद्र विशेष रूप से सभी वर्णों की सेवा-पूजा करते थे।"

श्लोक 22 (uttara.74.22)

एतस्मिन्नन्तरे तेषामधर्मे चानृते च ह । ततः पूर्वे भृशं ह्रासमगमन्नृपसत्तम ।। 74.22 ।।

etasminnantare teṣāmadharme cānṛte ca ha | tataḥ pūrve bhṛśaṃ hrāsamagamannṛpasattama || 74.22 ||

"हे नृपश्रेष्ठ! इसी बीच अधर्म और असत्य के बढ़ने से पूर्वकालीन धर्म और आयु में अत्यधिक ह्रास होने लगा।"

श्लोक 23 (uttara.74.23)

ततः पादमधर्मस्स द्वितीयमवतारयत् । ततो द्वापरसञ्ज्ञा ऽस्य युगस्य समजायत ।। 74.23 ।।

tataḥ pādamadharmassa dvitīyamavatārayat | tato dvāparasañjñā 'sya yugasya samajāyata || 74.23 ||

"तब अधर्म ने अपना दूसरा पैर भी रख दिया, और तभी से इस युग का नाम द्वापर हुआ।"

श्लोक 24 (uttara.74.24)

तस्मिन्द्वापरसञ्ज्ञे तु वर्तमाने युगक्षये । अधर्मश्चानृतं चैव ववृधे पुरुषर्षभ ।। 74.24 ।।

tasmindvāparasañjñe tu vartamāne yugakṣaye | adharmaścānṛtaṃ caiva vavṛdhe puruṣarṣabha || 74.24 ||

"हे पुरुषर्षभ! उस द्वापर नामक युग के आने पर, जो पूर्वयुग का क्षय था, अधर्म और असत्य दोनों बढ़ते चले गए।"

श्लोक 25 (uttara.74.25)

तस्मिन्द्वापरसङ्ख्याते तपो वैश्यान्समाविशत् । त्रिभ्यो युगेभ्यस्त्रीन्वर्णान्क्रमाद्वै तप आविशत् ।। 74.25 ।।

tasmindvāparasaṅkhyāte tapo vaiśyānsamāviśat | tribhyo yugebhyastrīnvarṇānkramādvai tapa āviśat || 74.25 ||

"उस द्वापर नामक युग में तपस्या वैश्यों में भी प्रविष्ट हो गई; तीन युगों में क्रमशः तीन वर्णों में तप का प्रवेश हुआ।"

श्लोक 26 (uttara.74.26)

त्रिभ्यो युगेभ्यस्त्रीन्वर्णान्धर्मश्च परिनिष्ठितः । न शुद्धो लभते धर्मं युगतस्तु नरर्षभ । हीनवर्णो नृपश्रेष्ठ तप्यते सुमहत्तपः ।। 74.26 ।।

tribhyo yugebhyastrīnvarṇāndharmaśca pariniṣṭhitaḥ | na śuddho labhate dharmaṃ yugatastu nararṣabha | hīnavarṇo nṛpaśreṣṭha tapyate sumahattapaḥ || 74.26 ||

"तीन युगों में क्रमशः तीन वर्णों में धर्म भी स्थिर हो गया। हे नरश्रेष्ठ! हे नृपश्रेष्ठ! अब युग के अनुसार शुद्ध वर्ण वाला भी धर्म प्राप्त नहीं करता, अपितु हीन वर्ण वाला भी महान तपस्या करने लगता है।"

श्लोक 27 (uttara.74.27)

भविष्यच्छूद्रयोन्यां वै तपश्चर्या कलौ युगे । अधर्मः परमो राजन्द्वापरे शूद्रजन्मनः ।। 74.27 ।।

bhaviṣyacchūdrayonyāṃ vai tapaścaryā kalau yuge | adharmaḥ paramo rājandvāpare śūdrajanmanaḥ || 74.27 ||

"कलियुग में तो शूद्रयोनि में उत्पन्न लोगों द्वारा भी तपस्या का आचरण होगा; किन्तु हे राजन्! द्वापरयुग में शूद्र-जन्म वाले के लिए तपस्या करना परम अधर्म है।"

श्लोक 28 (uttara.74.28)

स वै विषयपर्यन्ते तव राजन्महातपाः । अद्य तप्यति दुर्बुद्धिस्तेन बालवधो ह्ययम् ।। 74.28 ।।

sa vai viṣayaparyante tava rājanmahātapāḥ | adya tapyati durbuddhistena bālavadho hyayam || 74.28 ||

"हे राजन्! तुम्हारे राज्य की सीमा पर ही इस समय वह दुर्बुद्धि पुरुष महान तपस्या कर रहा है, और उसी के कारण यह बालवध हुआ है।"

श्लोक 29 (uttara.74.29)

यो ह्यधर्ममकार्यं वा विषये पार्थिवस्य तु । करोति चाश्रीमूलं तत्पुरे वा दुर्मतिर्नरः । क्षिप्रं च नरकं याति स च राजा न संशयः ।। 74.29 ।।

yo hyadharmamakāryaṃ vā viṣaye pārthivasya tu | karoti cāśrīmūlaṃ tatpure vā durmatirnaraḥ | kṣipraṃ ca narakaṃ yāti sa ca rājā na saṃśayaḥ || 74.29 ||

"जो भी दुर्बुद्धि मनुष्य राजा के राज्य में अथवा नगर में अधर्म या अकरणीय कार्य करता है, जो राज्य की समृद्धि को नष्ट करने वाला होता है, वह शीघ्र ही नरक को प्राप्त होता है, और निःसंदेह वह राजा भी।"

श्लोक 30 (uttara.74.30)

अधीतस्य च तप्तस्य कर्मणः सुकृतस्य च । षष्ठं भजति भागं तु प्रजा धर्मेण पालयन् ।। 74.30 ।।

adhītasya ca taptasya karmaṇaḥ sukṛtasya ca | ṣaṣṭhaṃ bhajati bhāgaṃ tu prajā dharmeṇa pālayan || 74.30 ||

"जो राजा धर्मपूर्वक प्रजा का पालन करता है, वह प्रजा के अध्ययन, तप तथा सत्कर्मों के फल का छठा भाग प्राप्त करता है।"

श्लोक 31 (uttara.74.31)

षङ्भागस्य न भोक्ता ऽसौ रक्षते न प्रजाः कथम् ।। 74.31 ।।

ṣaṅbhāgasya na bhoktā 'sau rakṣate na prajāḥ katham || 74.31 ||

"किन्तु जो प्रजा की रक्षा नहीं करता, वह उस छठे भाग का भोक्ता कैसे हो सकता है?"

श्लोक 32 (uttara.74.32)

स त्वं पुरुषशार्दूल मार्गस्व विषयं स्वकम् । दुष्कृतं यत्र पश्येथास्तत्र यत्नं समाचर ।। 74.32 ।।

sa tvaṃ puruṣaśārdūla mārgasva viṣayaṃ svakam | duṣkṛtaṃ yatra paśyethāstatra yatnaṃ samācara || 74.32 ||

"अतः हे पुरुषश्रेष्ठ! तुम अपने राज्य में खोज करो; जहाँ भी दुष्कर्म देखो, वहाँ प्रयत्नपूर्वक उसका निवारण करो।"

श्लोक 33 (uttara.74.33)

एवं चेद्धर्मवृद्धिश्च नृणां चायुर्विवर्धनम् । भविष्यति नरश्रेष्ठ बालस्यास्य च जीवितम् ।। 74.33 ।।

evaṃ ceddharmavṛddhiśca nṛṇāṃ cāyurvivardhanam | bhaviṣyati naraśreṣṭha bālasyāsya ca jīvitam || 74.33 ||

"हे नरश्रेष्ठ! ऐसा करने पर धर्म की वृद्धि होगी, मनुष्यों की आयु बढ़ेगी, और इस बालक का जीवन भी लौट आएगा।"

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