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उत्तरकाण्ड · सर्ग 78

राजा श्वेत की क्षुधा-कथा

सर्ग 77सर्ग-सूचीसर्ग 79

श्लोक 1 (uttara.78.1)

श्रुत्वा तु भाषितं वाक्यं मम राम शुभाक्षरम् । प्राञ्जलिः प्रत्युवाचेदं स स्वर्गी रघुनन्दन ।। ७.७८.१ ।।

śrutvā tu bhāṣitaṃ vākyaṃ mama rāma śubhākṣaram | prāñjaliḥ pratyuvācedaṃ sa svargī raghunandana || 7.78.1 ||

हे राम! मेरी उस शुभ-वाणी को सुनकर वह स्वर्गवासी हाथ जोड़कर, हे रघुनन्दन, इस प्रकार बोला।

श्लोक 2 (uttara.78.2)

शृणु ब्रह्मन्पुरा वृत्तं ममैतत्सुखदुःखयोः । अनतिक्रमणीयं हि यथा पृच्छसि मां द्विज ।। ७.७८.२ ।।

śṛṇu brahmanpurā vṛttaṃ mamaitatsukhaduḥkhayoḥ | anatikramaṇīyaṃ hi yathā pṛcchasi māṃ dvija || 7.78.2 ||

"हे ब्रह्मन्! सुनिए, मेरे सुख-दुःख की यह पूर्वकथा — क्योंकि हे द्विज, जैसे आपने मुझसे पूछा है, इसे टाला नहीं जा सकता।"

श्लोक 3 (uttara.78.3)

पुरा वैदर्भको राजा पिता मम महायशाः । सुदेव इति विख्यातस्त्रिषु लोकेषु वीर्यवान् ।। ७.७८.३ ।।

purā vaidarbhako rājā pitā mama mahāyaśāḥ | sudeva iti vikhyātastriṣu lokeṣu vīryavān || 7.78.3 ||

"पूर्वकाल में विदर्भ का राजा, मेरा पिता, महायशस्वी था, जो तीनों लोकों में सुदेव नाम से विख्यात और पराक्रमी था।"

श्लोक 4 (uttara.78.4)

तस्य पुत्रद्वयं ब्रह्मन्द्वाभ्यां स्त्रीभ्यामजायत । अहं श्वेत इति ख्यातो यवीयान्सुरथो ऽभवत् ।। ७.७८.४ ।।

tasya putradvayaṃ brahmandvābhyāṃ strībhyāmajāyata | ahaṃ śveta iti khyāto yavīyānsuratho 'bhavat || 7.78.4 ||

"हे ब्रह्मन्! उससे दो पत्नियों द्वारा दो पुत्र उत्पन्न हुए। मैं श्वेत नाम से विख्यात हूँ, और छोटा सुरथ हुआ।"

श्लोक 5 (uttara.78.5)

ततः पितरि स्वर्याते पौरा मामभ्यषेचयन् । तत्राहं कृतवान्राज्यं धर्म्यं च सुसमाहितः ।। ७.७८.५ ।।

tataḥ pitari svaryāte paurā māmabhyaṣecayan | tatrāhaṃ kṛtavānrājyaṃ dharmyaṃ ca susamāhitaḥ || 7.78.5 ||

"तब पिता के स्वर्गवासी होने पर नगरवासियों ने मेरा राज्याभिषेक किया। वहाँ मैंने पूर्ण संयत होकर धर्मपूर्वक राज्य किया।"

श्लोक 6 (uttara.78.6)

एवं वर्षसहस्राणि समतीतानि सुव्रत । राज्यं कारयतो ब्रह्मन्प्रजा धर्मेण रक्षतः ।। ७.७८.६ ।।

evaṃ varṣasahasrāṇi samatītāni suvrata | rājyaṃ kārayato brahmanprajā dharmeṇa rakṣataḥ || 7.78.6 ||

"इस प्रकार, हे सुव्रत, हे ब्रह्मन्! राज्य करते और धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करते हुए मुझे हज़ार वर्ष बीत गए।"

श्लोक 7 (uttara.78.7)

सो ऽहं निमित्ते कस्मिंश्चिद्विज्ञातायुर्द्विजोत्तम । कालधर्मं हृदि न्यस्य ततो वनमुपागमम् ।। ७.७८.७ ।।

so 'haṃ nimitte kasmiṃścidvijñātāyurdvijottama | kāladharmaṃ hṛdi nyasya tato vanamupāgamam || 7.78.7 ||

"हे द्विजोत्तम! फिर किसी निमित्त से अपनी आयु का ज्ञान होने पर, मृत्यु-धर्म को हृदय में धारण कर मैं वन को चला गया।"

श्लोक 8 (uttara.78.8)

सो ऽहं वनमिदं दुर्गं मृगपक्षिविवर्जितम् । तपश्चर्तुं प्रविष्टो ऽस्मि समीपे सरसः शुभे ।। ७.७८.८ ।।

so 'haṃ vanamidaṃ durgaṃ mṛgapakṣivivarjitam | tapaścartuṃ praviṣṭo 'smi samīpe sarasaḥ śubhe || 7.78.8 ||

"मैं इस दुर्गम वन में, जो मृग-पक्षियों से रहित है, इस शुभ सरोवर के समीप तप करने के लिए प्रविष्ट हुआ।"

श्लोक 9 (uttara.78.9)

भ्रातरं सुरथं राज्ये ह्यभिषिच्य महीपतिम् । इदं सरः समासाद्य तपस्तप्तं मया चिरम् ।। ७.७८.९ ।।

bhrātaraṃ surathaṃ rājye hyabhiṣicya mahīpatim | idaṃ saraḥ samāsādya tapastaptaṃ mayā ciram || 7.78.9 ||

"अपने भाई सुरथ को भूपति के रूप में राज्य पर अभिषिक्त कर, इस सरोवर में आकर मैंने दीर्घकाल तक तप किया।"

श्लोक 10 (uttara.78.10)

सो ऽहं वर्षसहस्राणि तपस्त्रीणि महावने । तप्त्वा सुदुष्करं प्राप्तो ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ।। ७.७८.१० ।।

so 'haṃ varṣasahasrāṇi tapastrīṇi mahāvane | taptvā suduṣkaraṃ prāpto brahmalokamanuttamam || 7.78.10 ||

"इस महावन में तीन हज़ार वर्षों तक अत्यन्त दुष्कर तप करके मैंने अनुपम ब्रह्मलोक को प्राप्त किया।"

श्लोक 11 (uttara.78.11)

तस्य मे स्वर्गभूतस्य क्षुत्पिपासे द्विजोत्तम । बाधेते परमोदार ततो ऽहं व्यथितेन्द्रियः । गत्वा त्रिभुवनश्रेष्ठं पितामहमुवाच ह ।। ७.७८.११ ।।

tasya me svargabhūtasya kṣutpipāse dvijottama | bādhete paramodāra tato 'haṃ vyathitendriyaḥ | gatvā tribhuvanaśreṣṭhaṃ pitāmahamuvāca ha || 7.78.11 ||

"किन्तु स्वर्गवासी हो जाने पर भी, हे द्विजोत्तम, हे परमोदार, भूख-प्यास मुझे सताने लगीं। तब मैं व्याकुल इन्द्रियों वाला होकर त्रिभुवनश्रेष्ठ पितामह के पास जाकर बोला।"

श्लोक 12 (uttara.78.12)

भगवन्ब्रह्मलोको ऽयं क्षुत्पिपासाविवर्जितः । कस्यायं कर्मणः पाकः क्षुत्पिपासानुगो ह्यहम् ।। ७.७८.१२ ।।

bhagavanbrahmaloko 'yaṃ kṣutpipāsāvivarjitaḥ | kasyāyaṃ karmaṇaḥ pākaḥ kṣutpipāsānugo hyaham || 7.78.12 ||

"'हे भगवन्! यह ब्रह्मलोक तो भूख-प्यास से रहित है। यह किस कर्म का फल है कि मैं भूख-प्यास के अधीन हूँ?'"

श्लोक 13 (uttara.78.13)

आहारः कश्च मे देव तन्मे ब्रूहि पितामह ।। ७.७८.१३ ।।

āhāraḥ kaśca me deva tanme brūhi pitāmaha || 7.78.13 ||

"'हे देव! मेरा भोजन क्या होगा? हे पितामह, यह मुझे बताइए।'"

श्लोक 14 (uttara.78.14)

पितामहस्तु मामाह तवाहारः सुदेवज । स्वादूनि स्वानि मांसानि तानि भक्षय नित्यशः ।। ७.७८.१४ ।।

pitāmahastu māmāha tavāhāraḥ sudevaja | svādūni svāni māṃsāni tāni bhakṣaya nityaśaḥ || 7.78.14 ||

"तब पितामह ने मुझसे कहा — 'हे सुदेवपुत्र! तुम्हारा आहार तुम्हारा ही स्वादिष्ट मांस है; उसी को सदा खाओ।'"

श्लोक 15 (uttara.78.15)

स्वशरीरं त्वया पुष्टं कुर्वता तप उत्तमम् । अनुप्तं रोहते श्वेत न कदाचिन्महामते ।। ७.७८.१५ ।।

svaśarīraṃ tvayā puṣṭaṃ kurvatā tapa uttamam | anuptaṃ rohate śveta na kadācinmahāmate || 7.78.15 ||

"'हे श्वेत, हे महामते! उत्तम तप करते हुए तुमने अपने शरीर को जिस प्रकार पुष्ट किया है, वह बिना बोए भी सदा फिर से उग आएगा, कभी घटेगा नहीं।'"

श्लोक 16 (uttara.78.16)

तृप्तिर्न ते ऽस्ति सूक्ष्मा ऽपि वने सत्वनिषेविते । पुरा तु भिक्षमाणाय भिक्षा वै यतये नृप । न हि दत्ता त्वयेन्द्राभ यस्मादतिथये ऽपि वै ।। ७.७८.१६ ।।

tṛptirna te 'sti sūkṣmā 'pi vane satvaniṣevite | purā tu bhikṣamāṇāya bhikṣā vai yataye nṛpa | na hi dattā tvayendrābha yasmādatithaye 'pi vai || 7.78.16 ||

"'इस जीव-बसे वन में तुम्हें तनिक भी तृप्ति नहीं होगी, क्योंकि हे राजन्! पूर्वकाल में माँगते हुए किसी यति को तुमने भिक्षा नहीं दी थी, और हे इन्द्रतुल्य! एक अतिथि को भी तुमने कुछ नहीं दिया था।'"

श्लोक 17 (uttara.78.17)

दत्तं न ते ऽस्ति सूक्ष्मो ऽपि तप एव निषेवसे । तेन स्वर्गगतो वत्स बाध्यसे क्षुत्पिपासया ।। ७.७८.१७ ।।

dattaṃ na te 'sti sūkṣmo 'pi tapa eva niṣevase | tena svargagato vatsa bādhyase kṣutpipāsayā || 7.78.17 ||

"'तुमने तनिक भी दान नहीं दिया, केवल तप ही किया। इसीलिए, हे वत्स, स्वर्ग में जाकर भी तुम भूख-प्यास से पीड़ित हो।'"

श्लोक 18 (uttara.78.18)

स त्वं सुपुष्टमाहारैः स्वशरीरमनुत्तमम् । भक्षयित्वामृतरसं तेन तृप्तिर्भविष्यति ।। ७.७८.१८ ।।

sa tvaṃ supuṣṭamāhāraiḥ svaśarīramanuttamam | bhakṣayitvāmṛtarasaṃ tena tṛptirbhaviṣyati || 7.78.18 ||

"'इसलिए तुम अपने ही सुपुष्ट, अनुपम शरीर को अमृत-रस के समान खाओ; उसी से तुम्हें तृप्ति मिलेगी।'"

श्लोक 19 (uttara.78.19)

यदा तु तद्वनं श्वेत अगस्त्यः सुमहानृषिः । आगमिष्यति दुर्धर्षस्तदा कृच्छ्राद्विमोक्ष्यते ।। ७.७८.१९ ।।

yadā tu tadvanaṃ śveta agastyaḥ sumahānṛṣiḥ | āgamiṣyati durdharṣastadā kṛcchrādvimokṣyate || 7.78.19 ||

"'किन्तु, हे श्वेत, जब वह दुर्धर्ष महर्षि अगस्त्य इस वन में आएँगे, तब तुम इस कष्ट से मुक्त हो जाओगे।'"

श्लोक 20 (uttara.78.20)

स हि तारयितुं सौम्य शक्तः सुरगणानपि । किं पुनस्त्वां महाबाहो क्षुत्पिपासावशं गतम् ।। ७.७८.२० ।।

sa hi tārayituṃ saumya śaktaḥ suragaṇānapi | kiṃ punastvāṃ mahābāho kṣutpipāsāvaśaṃ gatam || 7.78.20 ||

"'हे सौम्य! वे तो देवगणों को भी तारने में समर्थ हैं — फिर हे महाबाहो, भूख-प्यास के वशीभूत तुम्हें तारना उनके लिए क्या बड़ी बात है!'"

श्लोक 21 (uttara.78.21)

सो ऽहं भगवतः श्रुत्वा देवदेवस्य निश्चयम् । आहारं गर्हितं स्वशरीरं द्विजोत्तम ।। ७.७८.२१ ।।

so 'haṃ bhagavataḥ śrutvā devadevasya niścayam | āhāraṃ garhitaṃ svaśarīraṃ dvijottama || 7.78.21 ||

"हे द्विजोत्तम! देवाधिदेव भगवान् का यह निश्चय सुनकर मैंने अपने ही शरीर को निन्दित आहार के रूप में स्वीकार किया।"

श्लोक 22 (uttara.78.22)

बहून्वर्षगणान्ब्रह्मन्भुज्यमानमिदं मया । क्षयं नाभ्येति ब्रह्मर्षे तृप्तिश्चापि ममोत्तमा ।। ७.७८.२२ ।।

bahūnvarṣagaṇānbrahmanbhujyamānamidaṃ mayā | kṣayaṃ nābhyeti brahmarṣe tṛptiścāpi mamottamā || 7.78.22 ||

"हे ब्रह्मन्, हे ब्रह्मर्षे! बहुत वर्षों से इस प्रकार मेरे द्वारा खाए जाने पर भी यह क्षीण नहीं होता, और न ही मुझे पूर्ण तृप्ति मिलती है।"

श्लोक 23 (uttara.78.23)

तस्य मे कृच्छ्रभूतस्य कृच्छ्रादस्माद्विमोचय । अन्येषां न गतिर्ह्यत्र कुम्भयोनिमृते द्विजम् ।। ७.७८.२३ ।।

tasya me kṛcchrabhūtasya kṛcchrādasmādvimocaya | anyeṣāṃ na gatirhyatra kumbhayonimṛte dvijam || 7.78.23 ||

"मुझ इस कष्टग्रस्त को इस कष्ट से मुक्त कीजिए। यहाँ कुम्भयोनि द्विज (आपके) सिवा और किसी की शरण नहीं है।"

श्लोक 24 (uttara.78.24)

इदमाभरणं सौम्य तारणार्थं द्विजोत्तम । प्रतिगृह्णीष्व भद्रं ते प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। ७.७८.२४ ।।

idamābharaṇaṃ saumya tāraṇārthaṃ dvijottama | pratigṛhṇīṣva bhadraṃ te prasādaṃ kartumarhasi || 7.78.24 ||

"हे सौम्य, हे द्विजोत्तम! मेरी मुक्ति के लिए यह आभूषण स्वीकार कीजिए। आपका कल्याण हो, मुझ पर यह अनुग्रह कीजिए।"

श्लोक 25 (uttara.78.25)

इदं तावत्सुवर्णं च धनं वस्त्राणि च द्विज । भक्ष्यं भोज्यं च ब्रह्मर्षे ददात्याभरणानि च ।। ७.७८.२५ ।।

idaṃ tāvatsuvarṇaṃ ca dhanaṃ vastrāṇi ca dvija | bhakṣyaṃ bhojyaṃ ca brahmarṣe dadātyābharaṇāni ca || 7.78.25 ||

"हे द्विज! यह स्वर्ण, धन, वस्त्र, तथा हे ब्रह्मर्षे, भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और आभूषण भी — यह सब मैं आपको देता हूँ।"

श्लोक 26 (uttara.78.26)

सर्वान्कामान्प्रयच्छामि भोगांश्च मुनिपुङ्गव । तारणे भगवन्मह्यं प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। ७.७८.२६ ।।

sarvānkāmānprayacchāmi bhogāṃśca munipuṅgava | tāraṇe bhagavanmahyaṃ prasādaṃ kartumarhasi || 7.78.26 ||

"हे मुनिपुंगव! मैं आपको सभी वांछित वस्तुएँ और भोग अर्पित करता हूँ। हे भगवन्! मुझे तारने में यह अनुग्रह कीजिए।"

श्लोक 27 (uttara.78.27)

तस्याहं स्वर्गिणो वाक्यं श्रुत्वा दुःखसमन्वितम् । तारणायोपजग्राह तदाभरणमुत्तमम् ।। ७.७८.२७ ।।

tasyāhaṃ svargiṇo vākyaṃ śrutvā duḥkhasamanvitam | tāraṇāyopajagrāha tadābharaṇamuttamam || 7.78.27 ||

उस स्वर्गवासी की दुःखयुक्त वाणी सुनकर मैंने उसकी मुक्ति के लिए वह उत्तम आभूषण ग्रहण कर लिया।

श्लोक 28 (uttara.78.28)

मया प्रतिगृहीते तु तस्मिन्नाभरणे शुभे । मानुषः पूर्वको देहो राजर्षेर्विननाश ह ।। ७.७८.२८ ।।

mayā pratigṛhīte tu tasminnābharaṇe śubhe | mānuṣaḥ pūrvako deho rājarṣervinanāśa ha || 7.78.28 ||

मेरे उस शुभ आभूषण को स्वीकार करते ही उस राजर्षि का पूर्व मानव शरीर विलीन हो गया।

श्लोक 29 (uttara.78.29)

प्रनष्टे तु शरीरे ऽसौ राजर्षिः परया मुदा । तृप्तः प्रमुदितो राजा जगाम त्रिदिवं सुखम् ।। ७.७८.२९ ।।

pranaṣṭe tu śarīre 'sau rājarṣiḥ parayā mudā | tṛptaḥ pramudito rājā jagāma tridivaṃ sukham || 7.78.29 ||

उस शरीर के नष्ट हो जाने पर, वह राजर्षि, परम हर्ष के साथ, तृप्त और प्रमुदित होकर, सुखपूर्वक स्वर्गलोक को चला गया।

श्लोक 30 (uttara.78.30)

तेनेदं शक्रतुल्येन दिव्यमाभरणं मम । तस्मिन्निमित्ते काकुत्स्थ दत्तमद्भुतदर्शनम् ।। ७.७८.३० ।।

tenedaṃ śakratulyena divyamābharaṇaṃ mama | tasminnimitte kākutstha dattamadbhutadarśanam || 7.78.30 ||

हे काकुत्स्थ! उसी इन्द्रतुल्य राजा ने उस अवसर पर मुझे यह अद्भुत दर्शन वाला दिव्य आभूषण दिया था।

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