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उत्तरकाण्ड · सर्ग 79

मनु और दण्ड की कथा

सर्ग 78सर्ग-सूचीसर्ग 80

श्लोक 1 (uttara.79.1)

तदद्भुततमं वाक्यं श्रुत्वागस्त्यस्य राघवः । गौरवाद्विस्मयाच्चैव पुनः प्रष्टुं प्रचक्रमे ।। ७.७९.१ ।।

tadadbhutatamaṃ vākyaṃ śrutvāgastyasya rāghavaḥ | gauravādvismayāccaiva punaḥ praṣṭuṃ pracakrame || 7.79.1 ||

अगस्त्य की उस अत्यन्त अद्भुत वाणी को सुनकर राघव आदर और विस्मय के कारण पुनः प्रश्न पूछने लगे।

श्लोक 2 (uttara.79.2)

भगवंस्तद्वनं घोरं तपस्तप्यति यत्र सः । श्वेतो वैदर्भको राजा कथं स्यादमृगद्विजम् ।। ७.७९.२ ।।

bhagavaṃstadvanaṃ ghoraṃ tapastapyati yatra saḥ | śveto vaidarbhako rājā kathaṃ syādamṛgadvijam || 7.79.2 ||

"हे भगवन्! वह भयानक वन, जहाँ विदर्भ के राजा श्वेत ने तप किया, वह मृग-पक्षियों से रहित कैसे हुआ?"

श्लोक 3 (uttara.79.3)

तद्वनं स कथ राजा शून्यं मनुजवर्जितम् । तपश्चर्तुं प्रविष्टः स श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। ७.७९.३ ।।

tadvanaṃ sa katha rājā śūnyaṃ manujavarjitam | tapaścartuṃ praviṣṭaḥ sa śrotumicchāmi tattvataḥ || 7.79.3 ||

"वह राजा उस शून्य, मनुष्यरहित वन में तप करने के लिए कैसे प्रविष्ट हुआ, यह मैं यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।"

श्लोक 4 (uttara.79.4)

रामस्य वचनं श्रुत्वा कौतूहलसमन्वितम् । वाक्यं परमतेजस्वी वक्तुमेवोपचक्रमे ।। ७.७९.४ ।।

rāmasya vacanaṃ śrutvā kautūhalasamanvitam | vākyaṃ paramatejasvī vaktumevopacakrame || 7.79.4 ||

राम की कुतूहलयुक्त बात सुनकर वह परमतेजस्वी मुनि यह वचन कहने लगे।

श्लोक 5 (uttara.79.5)

पुरा कृतयुगे राम मनुर्दण्डधरः प्रभुः । तस्य पुत्रो महानासीदिक्ष्वाकुः कुलनन्दनः ।। ७.७९.५ ।।

purā kṛtayuge rāma manurdaṇḍadharaḥ prabhuḥ | tasya putro mahānāsīdikṣvākuḥ kulanandanaḥ || 7.79.5 ||

"हे राम! पूर्वकाल सत्ययुग में मनु दण्डधारी प्रभु थे। उनका महान पुत्र, कुल का आनन्दवर्धक, इक्ष्वाकु था।"

श्लोक 6 (uttara.79.6)

तं पुत्रं पूर्वंकं राज्ये निक्षिप्य भुवि दुर्जयम् । पृथिव्यां राजवंशानां भव कर्तेत्युवाच ह ।। ७.७९.६ ।।

taṃ putraṃ pūrvaṃkaṃ rājye nikṣipya bhuvi durjayam | pṛthivyāṃ rājavaṃśānāṃ bhava kartetyuvāca ha || 7.79.6 ||

उस अजेय ज्येष्ठ पुत्र को पृथ्वी पर राज्य में स्थापित कर मनु ने कहा — "तुम पृथ्वी पर राजवंशों के संस्थापक बनो।"

श्लोक 7 (uttara.79.7)

तथैवेति प्रतिज्ञातं पितुः पुत्रेण राघव । ततः परमसन्तुष्टो मनुः पुत्रमुवाच ह ।। ७.७९.७ ।।

tathaiveti pratijñātaṃ pituḥ putreṇa rāghava | tataḥ paramasantuṣṭo manuḥ putramuvāca ha || 7.79.7 ||

हे राघव! पुत्र ने पिता से "ऐसा ही होगा" यह प्रतिज्ञा की। तब अत्यन्त संतुष्ट होकर मनु ने पुत्र से कहा।

श्लोक 8 (uttara.79.8)

प्रीतो ऽस्मि परमोदार त्वं कर्ता ऽसि न संशयः । दण्डेन च प्रजा रक्ष मा च दण्डमकारणे ।। ७.७९.८ ।।

prīto 'smi paramodāra tvaṃ kartā 'si na saṃśayaḥ | daṇḍena ca prajā rakṣa mā ca daṇḍamakāraṇe || 7.79.8 ||

"हे परमोदार! मैं प्रसन्न हूँ, निःसंदेह तुम ही (वंश के) संस्थापक हो। दण्ड से प्रजा की रक्षा करो, परन्तु अकारण दण्ड मत दो।"

श्लोक 9 (uttara.79.9)

अपराधिषु यो दण्डः पात्यते मानवेषु वै । स दण्डो विधिवन्मुक्तः स्वर्गं नयति पार्थिवम् ।। ७.७९.९ ।।

aparādhiṣu yo daṇḍaḥ pātyate mānaveṣu vai | sa daṇḍo vidhivanmuktaḥ svargaṃ nayati pārthivam || 7.79.9 ||

"जो दण्ड अपराधी मनुष्यों पर विधिपूर्वक डाला जाता है, वह दण्ड राजा को स्वर्ग में ले जाता है।"

श्लोक 10 (uttara.79.10)

तस्माद्दण्डे महाबाहो यत्नवान्भव पुत्रक । धर्मो हि परमो लोके कुर्वतस्ते भविष्यति ।। ७.७९.१० ।।

tasmāddaṇḍe mahābāho yatnavānbhava putraka | dharmo hi paramo loke kurvataste bhaviṣyati || 7.79.10 ||

"अतः हे महाबाहो पुत्र! दण्ड के विषय में सावधान रहो, क्योंकि ऐसा करने से तुम्हें लोक में परम धर्म की प्राप्ति होगी।"

श्लोक 11 (uttara.79.11)

इति तं बहु सन्दिश्य मनुः पुत्रं समाधिना । जगाम त्रिदिवं हृष्टो ब्रह्मलोकं सनातनम् ।। ७.७९.११ ।।

iti taṃ bahu sandiśya manuḥ putraṃ samādhinā | jagāma tridivaṃ hṛṣṭo brahmalokaṃ sanātanam || 7.79.11 ||

इस प्रकार पुत्र को बहुत उपदेश देकर मनु एकाग्रचित्त होकर हर्षपूर्वक सनातन ब्रह्मलोक, स्वर्ग को चले गए।

श्लोक 12 (uttara.79.12)

प्रयाते त्रिदिवं तस्मिन्निक्ष्वाकुरमितप्रभः । जनयिष्ये कथं पुत्रानिति चिन्तापरो ऽभवत् ।। ७.७९.१२ ।।

prayāte tridivaṃ tasminnikṣvākuramitaprabhaḥ | janayiṣye kathaṃ putrāniti cintāparo 'bhavat || 7.79.12 ||

उनके स्वर्गगमन के पश्चात् अमितप्रभावी इक्ष्वाकु यह सोचकर चिन्तामग्न हो गए कि "मैं पुत्रों को कैसे उत्पन्न करूँ?"

श्लोक 13 (uttara.79.13)

कर्मभिर्बहुरूपैश्च तैस्तैर्मनुसुतस्सुतान् । जनयामास धर्मात्मा शतं देवसुतोपमान् ।। ७.७९.१३ ।।

karmabhirbahurūpaiśca taistairmanusutassutān | janayāmāsa dharmātmā śataṃ devasutopamān || 7.79.13 ||

मनुपुत्र धर्मात्मा इक्ष्वाकु ने विविध प्रकार के कर्मों (यज्ञों) द्वारा देवपुत्रों के समान सौ पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 14 (uttara.79.14)

तेषामवरजस्तात सर्वेषां रघुनन्दन । मूढश्चाकृतविद्यश्च न शुश्रूषति पूर्वजान् ।। ७.७९.१४ ।।

teṣāmavarajastāta sarveṣāṃ raghunandana | mūḍhaścākṛtavidyaśca na śuśrūṣati pūrvajān || 7.79.14 ||

हे तात रघुनन्दन! उन सबमें सबसे छोटा पुत्र मूर्ख और अशिक्षित था, और अपने बड़े भाइयों की बात नहीं मानता था।

श्लोक 15 (uttara.79.15)

नाम तस्य च दण्डेति पिता चक्रे ऽल्पमेधसः । अवश्यं दण्डपतनं शरीरे ऽस्य भविष्यति ।। ७.७९.१५ ।।

nāma tasya ca daṇḍeti pitā cakre 'lpamedhasaḥ | avaśyaṃ daṇḍapatanaṃ śarīre 'sya bhaviṣyati || 7.79.15 ||

उस अल्पबुद्धि पुत्र का नाम पिता ने दण्ड रखा, यह सोचकर कि इसके शरीर पर अवश्य ही दण्ड का प्रहार होगा।

श्लोक 16 (uttara.79.16)

अपश्यमानस्तं देशं घोरं पुत्रस्य राघव । विन्ध्यशैवलयोर्मध्ये राज्यं प्रादादरिन्दम ।। ७.७९.१६ ।।

apaśyamānastaṃ deśaṃ ghoraṃ putrasya rāghava | vindhyaśaivalayormadhye rājyaṃ prādādarindama || 7.79.16 ||

हे शत्रुदमन राघव! पुत्र के लिए उस भयंकर प्रदेश के परिणाम को न देखते हुए (इक्ष्वाकु ने) विन्ध्य और शैवल पर्वतों के मध्य उसे राज्य दे दिया।

श्लोक 17 (uttara.79.17)

स दण्डस्तत्र राजाभूद्रम्ये पर्वतरोधसि । पुरं चाप्रतिमं राम न्यवेशयदनुत्तमम् ।। ७.७९.१७ ।।

sa daṇḍastatra rājābhūdramye parvatarodhasi | puraṃ cāpratimaṃ rāma nyaveśayadanuttamam || 7.79.17 ||

वह दण्ड वहाँ, एक रमणीय पर्वत-तट पर राजा हुआ, और हे राम, उसने एक अनुपम, सर्वोत्तम नगर बसाया।

श्लोक 18 (uttara.79.18)

पुरस्य चाकरोन्नाम मधुमन्तमिति प्रभो । पुरोहितं तूशनसं वरयामास सुव्रतम् ।। ७.७९.१८ ।।

purasya cākaronnāma madhumantamiti prabho | purohitaṃ tūśanasaṃ varayāmāsa suvratam || 7.79.18 ||

हे प्रभो! उसने नगर का नाम मधुमन्त रखा, और सुव्रती उशना (शुक्राचार्य) को अपना पुरोहित चुना।

श्लोक 19 (uttara.79.19)

एवं स राजा तद्राज्यमकरोत्सपुरोहितः । प्रहृष्टमनुजाकीर्णं देवराजं यथा वृषा ।। ७.७९.१९ ।।

evaṃ sa rājā tadrājyamakarotsapurohitaḥ | prahṛṣṭamanujākīrṇaṃ devarājaṃ yathā vṛṣā || 7.79.19 ||

इस प्रकार वह राजा अपने पुरोहित सहित, हर्षित प्रजाजनों से भरे उस राज्य पर, वृषभ के समान देवराज इन्द्र की भाँति शासन करने लगा।

श्लोक 20 (uttara.79.20)

ततः स राजा मनुजेन्द्रपुत्रः सार्धं च तेनोशनसा तदानीम् । चकार राज्यं सुमहान्महात्मा शक्रो दिवीवोशनसा समेतः ।। ७.७९.२० ।।

tataḥ sa rājā manujendraputraḥ sārdhaṃ ca tenośanasā tadānīm | cakāra rājyaṃ sumahānmahātmā śakro divīvośanasā sametaḥ || 7.79.20 ||

तब उस नरेन्द्र-पुत्र, महान् एवं महात्मा राजा ने उस समय उशना के साथ उसी प्रकार राज्य किया, जैसे स्वर्ग में उशना (शुक्र) के साथ इन्द्र राज्य करते हैं।

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