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उत्तरकाण्ड · सर्ग 81

शुक्र का शाप: दण्डकारण्य की उत्पत्ति

सर्ग 80सर्ग-सूचीसर्ग 82

श्लोक 1 (uttara.81.1)

स मुहूर्तादुपश्रुत्य देवर्षिरमितप्रभः । स्वमाश्रमं शिष्यवृतः क्षुधार्तः सन्न्यवर्तत ।। ७.८१.१ ।।

sa muhūrtādupaśrutya devarṣiramitaprabhaḥ | svamāśramaṃ śiṣyavṛtaḥ kṣudhārtaḥ sannyavartata || 7.81.1 ||

वह अमित प्रभावाले देवर्षि (शुक्राचार्य), कुछ ही क्षणों में सब सुनकर, अपने शिष्यों से घिरे हुए और भूख से व्याकुल होकर अपने आश्रम को लौट आये।

श्लोक 2 (uttara.81.2)

सो ऽपश्यदरजां दीनां रजसा समभिप्लुताम् । ज्योत्स्नामिव ग्रहग्रस्तां प्रत्यूषे न विराजतीम् ।। ७.८१.२ ।।

so 'paśyadarajāṃ dīnāṃ rajasā samabhiplutām | jyotsnāmiva grahagrastāṃ pratyūṣe na virājatīm || 7.81.2 ||

उन्होंने दीन-दशा को प्राप्त अरजा को देखा, जो रज से आप्लावित हो चुकी थी -- मानो ग्रहण से ग्रस्त चाँदनी, जो प्रातःकाल शोभा नहीं पा रही हो।

श्लोक 3 (uttara.81.3)

तस्य रोषः समभवत्क्षुधार्तस्य विशेषतः । निर्दहन्निव लोकांस्त्रीञ्छिष्यांश्चैतदुवाच ह ।। ७.८१.३ ।।

tasya roṣaḥ samabhavatkṣudhārtasya viśeṣataḥ | nirdahanniva lokāṃstrīñchiṣyāṃścaitaduvāca ha || 7.81.3 ||

भूख से पीड़ित उन्हें और भी अधिक क्रोध हो आया, और मानो तीनों लोकों को भस्म करते हुए उन्होंने अपने शिष्यों से यह वचन कहा।

श्लोक 4 (uttara.81.4)

पश्यध्वं विपरीतस्य दण्डस्याविजितात्मनः । विपत्तिं घोरसङ्काशां क्रुद्धामग्निशिखामिव ।। ७.८१.४ ।।

paśyadhvaṃ viparītasya daṇḍasyāvijitātmanaḥ | vipattiṃ ghorasaṅkāśāṃ kruddhāmagniśikhāmiva || 7.81.4 ||

"देखो, विपरीत बुद्धि और अजितेन्द्रिय दण्ड पर आने वाली भयंकर विपत्ति को, जो क्रुद्ध अग्निशिखा के समान है।"

श्लोक 5 (uttara.81.5)

क्षयो ऽस्य दुर्मतेः प्राप्तः सानुगस्य दुरात्मनः । यः प्रदीप्तां हुताशस्य शिखां वै स्प्रष्टुमिच्छति ।। ७.८१.५ ।।

kṣayo 'sya durmateḥ prāptaḥ sānugasya durātmanaḥ | yaḥ pradīptāṃ hutāśasya śikhāṃ vai spraṣṭumicchati || 7.81.5 ||

"इस दुर्बुद्धि, दुरात्मा और अपने अनुचरों सहित विनाश को प्राप्त हुए दण्ड ने मानो प्रज्वलित अग्नि की शिखा को ही छूने की इच्छा की है।"

श्लोक 6 (uttara.81.6)

यस्मात्स कृतवान्पापमीदृशं घोरसंहितम् । तस्मात्प्राप्स्यति दुर्मेधाः फलं पापस्य कर्मणः ।। ७.८१.६ ।।

yasmātsa kṛtavānpāpamīdṛśaṃ ghorasaṃhitam | tasmātprāpsyati durmedhāḥ phalaṃ pāpasya karmaṇaḥ || 7.81.6 ||

"चूँकि उसने ऐसा भयानक और घोर पाप किया है, इसलिए वह दुर्बुद्धि अपने पापकर्म का फल अवश्य पाएगा।"

श्लोक 7 (uttara.81.7)

सप्तरात्रेण राजासौ सभृत्यबलवाहनः । पापकर्मसमाचारो वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः ।। ७.८१.७ ।।

saptarātreṇa rājāsau sabhṛtyabalavāhanaḥ | pāpakarmasamācāro vadhaṃ prāpsyati durmatiḥ || 7.81.7 ||

"सात रात्रियों के भीतर वह दुर्बुद्धि राजा, अपने सेवकों, सेना और वाहनों सहित, पापाचारी होने के कारण वध को प्राप्त होगा।"

श्लोक 8 (uttara.81.8)

समन्ताद्योजनशतं विषयं चास्य दुर्मतेः । धक्ष्यते पांसुवर्षेण महता पाकशासनः ।। ७.८१.८ ।।

samantādyojanaśataṃ viṣayaṃ cāsya durmateḥ | dhakṣyate pāṃsuvarṣeṇa mahatā pākaśāsanaḥ || 7.81.8 ||

"और इस दुर्बुद्धि के राज्य को, चारों ओर सौ योजन तक, इन्द्र महान् धूलिवर्षा से भस्म कर देंगे।"

श्लोक 9 (uttara.81.9)

सर्वसत्वानि यानीह स्थावराणि चराणि च । महता पांसुवर्षेण विलयं सर्वतो ऽगमन् ।। ७.८१.९ ।।

sarvasatvāni yānīha sthāvarāṇi carāṇi ca | mahatā pāṃsuvarṣeṇa vilayaṃ sarvato 'gaman || 7.81.9 ||

"यहाँ जो भी स्थावर और जंगम प्राणी हैं, वे सब उस महान् धूलिवर्षा से सब ओर से विनाश को प्राप्त होंगे।"

श्लोक 10 (uttara.81.10)

दण्डस्य विषयो यावत्तावत्सर्वसमुच्छ्रयम् । पांसुवर्षमिवालक्ष्यं सप्तरात्रं भविष्यति ।। ७.८१.१० ।।

daṇḍasya viṣayo yāvattāvatsarvasamucchrayam | pāṃsuvarṣamivālakṣyaṃ saptarātraṃ bhaviṣyati || 7.81.10 ||

"दण्ड का राज्य जहाँ तक फैला है, वहाँ तक की समस्त ऊँची भूमि भी धूलिवर्षा से ढँककर सात रात्रियों तक अलक्षित -- अदृश्य -- हो जाएगी।"

श्लोक 11 (uttara.81.11)

इत्युक्त्वा क्रोधताम्राक्षस्तदाश्रमनिवासिनम् । जनं जनपदान्तेषु स्थीयतामिति चाब्रवीत् ।। ७.८१.११ ।।

ityuktvā krodhatāmrākṣastadāśramanivāsinam | janaṃ janapadānteṣu sthīyatāmiti cābravīt || 7.81.11 ||

ऐसा कहकर, क्रोध से लाल आँखों वाले उन्होंने उस आश्रम में रहने वाले लोगों से कहा कि वे जनपद की सीमा पर जाकर ठहरें।

श्लोक 12 (uttara.81.12)

श्रुत्वा तूशनसो वाक्यं स आश्रमावसथो जनः । निष्क्रान्तो विषयात्तस्मात्स्थानं चक्रे ऽथ बाह्यतः ।। ७.८१.१२ ।।

śrutvā tūśanaso vākyaṃ sa āśramāvasatho janaḥ | niṣkrānto viṣayāttasmātsthānaṃ cakre 'tha bāhyataḥ || 7.81.12 ||

उशना (शुक्राचार्य) के वचन सुनकर आश्रम में रहने वाले वे लोग उस प्रदेश से निकल गये और बाहर जाकर बस गये।

श्लोक 13 (uttara.81.13)

स तथोक्त्वा मुनिजनमरजामिदमब्रवीत् । इहैव वस दुर्मेधे आश्रमे सुसमाहिता ।। ७.८१.१३ ।।

sa tathoktvā munijanamarajāmidamabravīt | ihaiva vasa durmedhe āśrame susamāhitā || 7.81.13 ||

मुनिजनों से इस प्रकार कहकर, उन्होंने अरजा से यह कहा, "हे अभागिनी! तुम यहीं इस आश्रम में शान्तचित्त होकर निवास करो।"

श्लोक 14 (uttara.81.14)

इदं योजनपर्यन्तं सरः सुरुचिरप्रभम् । अरजे विज्वरा भुङ्क्ष्व कालश्चात्र प्रतीक्ष्यताम् ।। ७.८१.१४ ।।

idaṃ yojanaparyantaṃ saraḥ suruciraprabham | araje vijvarā bhuṅkṣva kālaścātra pratīkṣyatām || 7.81.14 ||

"हे अरजे! एक योजन तक फैला यह अत्यन्त शोभायमान सरोवर है; व्यथारहित होकर इसका उपभोग करो, और यहीं उस समय की प्रतीक्षा करो।"

श्लोक 15 (uttara.81.15)

त्वत्समीपे च ये सत्त्वा वासमेष्यन्ति तां निशाम् । अवध्याः पांसुवर्षेण ते भविष्यन्ति नित्यदा ।। ७.८१.१५ ।।

tvatsamīpe ca ye sattvā vāsameṣyanti tāṃ niśām | avadhyāḥ pāṃsuvarṣeṇa te bhaviṣyanti nityadā || 7.81.15 ||

"और जो भी प्राणी उस रात्रि में तुम्हारे समीप निवास करने आयेंगे, वे सदा के लिए उस धूलिवर्षा से अवध्य हो जाएँगे।"

श्लोक 16 (uttara.81.16)

श्रुत्वा नियोगं ब्रह्मर्षेः सा ऽरजा भार्गवी तदा । तथेति पितरं प्राह भार्गवं भृशदुःखिता । इत्युक्त्वा भार्गवो वासमन्यत्र समकारयत् ।। ७.८१.१६ ।।

śrutvā niyogaṃ brahmarṣeḥ sā 'rajā bhārgavī tadā | tatheti pitaraṃ prāha bhārgavaṃ bhṛśaduḥkhitā | ityuktvā bhārgavo vāsamanyatra samakārayat || 7.81.16 ||

ब्रह्मर्षि की इस आज्ञा को सुनकर, अत्यन्त दुःखी हुई वह भार्गवकन्या अरजा ने अपने पिता भार्गव से "ऐसा ही हो" कहा। ऐसा कहकर भार्गव ने अन्यत्र अपना निवास बना लिया।

श्लोक 17 (uttara.81.17)

तच्च राज्यं नरेन्द्रस्य सभृत्यबलवाहनम् । सप्ताहाद्भस्मसाद्भूतं यथोक्तं ब्रह्मवादिना ।। ७.८१.१७ ।।

tacca rājyaṃ narendrasya sabhṛtyabalavāhanam | saptāhādbhasmasādbhūtaṃ yathoktaṃ brahmavādinā || 7.81.17 ||

और उस राजा का राज्य, अपने सेवकों, सेना और वाहनों सहित, सात दिनों के बाद भस्म हो गया, ठीक वैसे ही जैसा उस ब्रह्मवादी ने कहा था।

श्लोक 18 (uttara.81.18)

तस्यासौ दण्डविषयो विन्ध्यशैवलयोर्नृप । शप्तो ब्रह्मर्षिणा तेन वैधर्म्ये सहिते कृते ।। ७.८१.१८ ।।

tasyāsau daṇḍaviṣayo vindhyaśaivalayornṛpa | śapto brahmarṣiṇā tena vaidharmye sahite kṛte || 7.81.18 ||

"हे राजन्! विन्ध्य और शैवल पर्वतों के बीच स्थित दण्ड का वह राज्य, अधर्म के आचरण से युक्त कर्म किये जाने पर, उस ब्रह्मर्षि द्वारा शापित हुआ।"

श्लोक 19 (uttara.81.19)

ततः प्रभृति काकुत्स्थ दण्डकारण्यमुच्यते । तपस्विनः स्थिता ह्यत्र जनस्थानमतो ऽभवत् ।। ७.८१.१९ ।।

tataḥ prabhṛti kākutstha daṇḍakāraṇyamucyate | tapasvinaḥ sthitā hyatra janasthānamato 'bhavat || 7.81.19 ||

"हे काकुत्स्थ! तभी से यह दण्डकारण्य कहलाता है; यहाँ तपस्वी लोग बस गये, इसीलिए यह जनस्थान भी कहलाया।"

श्लोक 20 (uttara.81.20)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि राघव । सन्ध्यामुपासितुं वीर समयो ह्यतिवर्तते ।। ७.८१.२० ।।

etatte sarvamākhyātaṃ yanmāṃ pṛcchasi rāghava | sandhyāmupāsituṃ vīra samayo hyativartate || 7.81.20 ||

"हे राघव! जो कुछ तुमने मुझसे पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। हे वीर! अब संध्योपासना का समय बीता जा रहा है।"

श्लोक 21 (uttara.81.21)

एते महर्षयः सर्वे पूर्णकुम्भाः समन्ततः । कृतोदका नरव्याघ्र आदित्यं पर्युपासते ।। ७.८१.२१ ।।

ete maharṣayaḥ sarve pūrṇakumbhāḥ samantataḥ | kṛtodakā naravyāghra ādityaṃ paryupāsate || 7.81.21 ||

"हे नरव्याघ्र! ये सभी महर्षि, अपने कलशों को जल से भरकर और जलतर्पण करके, चारों ओर सूर्य की उपासना कर रहे हैं।"

श्लोक 22 (uttara.81.22)

स तैर्ब्राह्मणमभ्यस्तं सहितैर्ब्रह्मवित्तमैः । रविरस्तं गतो राम गच्छोदकमुपस्पृश ।। ७.८१.२२ ।।

sa tairbrāhmaṇamabhyastaṃ sahitairbrahmavittamaiḥ | ravirastaṃ gato rāma gacchodakamupaspṛśa || 7.81.22 ||

"हे राम! ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ उन ब्राह्मणों के साथ जिसका सत्कार हुआ है, वह सूर्य अस्त हो चुका है; जाओ, जल का स्पर्श करो।"

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