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उत्तरकाण्ड · सर्ग 82

राम की अयोध्या-वापसी

सर्ग 81सर्ग-सूचीसर्ग 83

श्लोक 1 (uttara.82.1)

ऋषेर्वचनमाज्ञाय रामः सन्ध्यामुपासितुम् । उपाक्रमत्सरः पुण्यमप्सरोगणसेवितम् ।। ७.८२.१ ।।

ṛṣervacanamājñāya rāmaḥ sandhyāmupāsitum | upākramatsaraḥ puṇyamapsarogaṇasevitam || 7.82.1 ||

ऋषि के वचन को समझकर, संध्योपासना करने के लिए राम अप्सराओं के समूहों से सेवित उस पवित्र सरोवर की ओर चले।

श्लोक 2 (uttara.82.2)

तत्रोदकमुपस्पृश्य सन्ध्यामन्वास्य पश्चिमाम् । आश्रमं प्राविशद्रामः कुम्भयोनेर्महात्मनः ।। ७.८२.२ ।।

tatrodakamupaspṛśya sandhyāmanvāsya paścimām | āśramaṃ prāviśadrāmaḥ kumbhayonermahātmanaḥ || 7.82.2 ||

वहाँ जल का स्पर्श करके और सायं-संध्या करके, राम कुम्भयोनि (अगस्त्य) उस महात्मा के आश्रम में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 3 (uttara.82.3)

तस्यागस्त्यो बहुगुणं कन्दमूलं तथौषधिम् । शाल्यादीनि पवित्राणि भोजनार्थमकल्पयत् ।। ७.८२.३ ।।

tasyāgastyo bahuguṇaṃ kandamūlaṃ tathauṣadhim | śālyādīni pavitrāṇi bhojanārthamakalpayat || 7.82.3 ||

उनके भोजन के लिए अगस्त्य ने अनेक गुणों वाले कन्द-मूल, औषधियाँ, तथा शालि आदि पवित्र अन्न तैयार करवाये।

श्लोक 4 (uttara.82.4)

स भुक्तवान्नरश्रेष्ठस्तदन्नममृतोपमम् । प्रीतश्च परितुष्टश्च तां रात्रिं समुपाविशत् ।। ७.८२.४ ।।

sa bhuktavānnaraśreṣṭhastadannamamṛtopamam | prītaśca parituṣṭaśca tāṃ rātriṃ samupāviśat || 7.82.4 ||

उन नरश्रेष्ठ ने अमृत के समान उस अन्न को खाया, और प्रसन्न व संतुष्ट होकर उस रात्रि को वहीं बिताया।

श्लोक 5 (uttara.82.5)

प्रभाते काल्यमुत्थाय कृत्वाह्निकमरिन्दमः । ऋषिं समुपचक्राम गमनाय रघूत्तमः ।। ७.८२.५ ।।

prabhāte kālyamutthāya kṛtvāhnikamarindamaḥ | ṛṣiṃ samupacakrāma gamanāya raghūttamaḥ || 7.82.5 ||

प्रातःकाल जल्दी उठकर और नित्यकर्म करके, वे शत्रुदमन रघुश्रेष्ठ प्रस्थान करने के लिए ऋषि के पास गये।

श्लोक 6 (uttara.82.6)

अभिवाद्याब्रवीद्रामो महर्षिं कुम्भसम्भवम् । आपृच्छे स्वां पुरीं गन्तुं मामनुज्ञातुमर्हसि ।। ७.८२.६ ।।

abhivādyābravīdrāmo maharṣiṃ kumbhasambhavam | āpṛcche svāṃ purīṃ gantuṃ māmanujñātumarhasi || 7.82.6 ||

प्रणाम करके राम ने कुम्भसंभव महर्षि (अगस्त्य) से कहा, "मैं अपनी नगरी को जाने के लिए आज्ञा माँगता हूँ; आप मुझे अनुमति दें।"

श्लोक 7 (uttara.82.7)

धन्यो ऽस्म्यनुगृहीतो ऽस्मि दर्शनेन महात्मनः । द्रष्टुं चैवागमिष्यामि पावनार्थमिहात्मनः ।। ७.८२.७ ।।

dhanyo 'smyanugṛhīto 'smi darśanena mahātmanaḥ | draṣṭuṃ caivāgamiṣyāmi pāvanārthamihātmanaḥ || 7.82.7 ||

"आप महात्मा के दर्शन से मैं धन्य हुआ, अनुगृहीत हुआ; और अपने आत्मा की पवित्रता के लिए मैं फिर आपके दर्शन को यहाँ आऊँगा।"

श्लोक 8 (uttara.82.8)

तथा वदति काकुत्स्थे वाक्यमद्भुतदर्शनम् । उवाच परमप्रीतो धर्मनेत्रस्तपोधनः ।। ७.८२.८ ।।

tathā vadati kākutsthe vākyamadbhutadarśanam | uvāca paramaprīto dharmanetrastapodhanaḥ || 7.82.8 ||

काकुत्स्थ के इस प्रकार कहने पर, धर्म के पथप्रदर्शक और तपोधन उन ऋषि ने अत्यंत प्रसन्न होकर यह आश्चर्यजनक वचन कहा।

श्लोक 9 (uttara.82.9)

अत्यद्भुतमिदं वाक्यं तव राम शुभाक्षरम् । पावनः सर्वभूतानां त्वमेव रघुनन्दन ।। ७.८२.९ ।।

atyadbhutamidaṃ vākyaṃ tava rāma śubhākṣaram | pāvanaḥ sarvabhūtānāṃ tvameva raghunandana || 7.82.9 ||

"हे राम! तुम्हारा यह शुभ अक्षरों से युक्त वचन अत्यन्त अद्भुत है; हे रघुनन्दन! तुम स्वयं ही समस्त प्राणियों के पवित्र करनेवाले हो।"

श्लोक 10 (uttara.82.10)

मुहूर्तमपि राम त्वां ये च पश्यन्ति केचन । पाविताः स्वर्गभूताश्च पूज्यास्ते सर्वदैवतैः ।। ७.८२.१० ।।

muhūrtamapi rāma tvāṃ ye ca paśyanti kecana | pāvitāḥ svargabhūtāśca pūjyāste sarvadaivataiḥ || 7.82.10 ||

"हे राम! जो भी लोग तुम्हें एक क्षण भर भी देख लेते हैं, वे पवित्र हो जाते हैं, स्वर्गतुल्य हो जाते हैं, और सभी देवताओं द्वारा पूजनीय हो जाते हैं।"

श्लोक 11 (uttara.82.11)

ये च त्वां घोरचक्षुर्भिः पश्यन्ति प्राणिनो भुवि । हतास्ते यमदण्डेन सद्यो निरयगामिनः ।। ७.८२.११ ।।

ye ca tvāṃ ghoracakṣurbhiḥ paśyanti prāṇino bhuvi | hatāste yamadaṇḍena sadyo nirayagāminaḥ || 7.82.11 ||

"और जो प्राणी भूतल पर तुम्हें भयंकर दृष्टि से देखते हैं, वे यम के दण्ड से आहत होकर तुरंत नरकगामी हो जाते हैं।"

श्लोक 12 (uttara.82.12)

ईदृशस्त्वं रघुश्रेष्ठ पावनः सर्वदेहिनाम् । भुवि त्वां कथयन्तो ऽपि सिद्धिमेष्यन्ति राघव ।। ७.८२.१२ ।।

īdṛśastvaṃ raghuśreṣṭha pāvanaḥ sarvadehinām | bhuvi tvāṃ kathayanto 'pi siddhimeṣyanti rāghava || 7.82.12 ||

"हे रघुश्रेष्ठ! तुम ऐसे ही समस्त देहधारियों के पवित्र करनेवाले हो; हे राघव! पृथ्वी पर जो केवल तुम्हारी चर्चा भी करते हैं, वे सिद्धि को प्राप्त होंगे।"

श्लोक 13 (uttara.82.13)

गच्छ चारिष्टमव्याग्रः पन्थानमकुतोभयम् । प्रशाधि राज्यं धर्मेण गतिर्हि जगतो भवान् ।। ७.८२.१३ ।।

gaccha cāriṣṭamavyāgraḥ panthānamakutobhayam | praśādhi rājyaṃ dharmeṇa gatirhi jagato bhavān || 7.82.13 ||

"निश्चिन्त होकर उस अनिष्टरहित और निर्भय मार्ग से जाओ; धर्मपूर्वक राज्य का पालन करो, क्योंकि तुम ही संसार की गति हो।"

श्लोक 14 (uttara.82.14)

एवमुक्तस्तु मुनिना प्राञ्जलिः प्रग्रहो नृपः । अभ्यवादयत प्राज्ञस्तमृषिं पुण्यशालिनम् ।। ७.८२.१४ ।।

evamuktastu muninā prāñjaliḥ pragraho nṛpaḥ | abhyavādayata prājñastamṛṣiṃ puṇyaśālinam || 7.82.14 ||

मुनि के इस प्रकार कहने पर, वे प्राज्ञ राजा हाथ जोड़कर और विनम्र होकर उस पुण्यशाली ऋषि को प्रणाम करने लगे।

श्लोक 15 (uttara.82.15)

अभिवाद्य मुनिश्रेष्ठं तांश्च सर्वांस्तपोधनान् । अध्यारोहत्तदव्यग्रः पुष्पकं हेमभूषितम् ।। ७.८२.१५ ।।

abhivādya muniśreṣṭhaṃ tāṃśca sarvāṃstapodhanān | adhyārohattadavyagraḥ puṣpakaṃ hemabhūṣitam || 7.82.15 ||

मुनिश्रेष्ठ और उन सभी तपोधनों को प्रणाम करके, वे शान्तचित्त होकर स्वर्णभूषित पुष्पक विमान पर आरूढ़ हुए।

श्लोक 16 (uttara.82.16)

तं प्रयान्तं मुनिगणा ह्याशीर्वादैः समन्ततः । अपूजयन्महेन्द्राभं सहस्राक्षमिवामराः ।। ७.८२.१६ ।।

taṃ prayāntaṃ munigaṇā hyāśīrvādaiḥ samantataḥ | apūjayanmahendrābhaṃ sahasrākṣamivāmarāḥ || 7.82.16 ||

प्रस्थान करते हुए महेन्द्र के समान तेजस्वी उन्हें, मुनिगणों ने चारों ओर से आशीर्वादों द्वारा वैसे ही पूजा जैसे देवगण सहस्राक्ष (इन्द्र) की पूजा करते हैं।

श्लोक 17 (uttara.82.17)

स्वस्थः स ददृशे रामः पुष्पके हेमभूषिते । शशी मेघसमीपस्थो यथा जलधरागमे ।। ७.८२.१७ ।।

svasthaḥ sa dadṛśe rāmaḥ puṣpake hemabhūṣite | śaśī meghasamīpastho yathā jaladharāgame || 7.82.17 ||

स्वर्णभूषित पुष्पक पर स्थित प्रसन्नचित्त राम ऐसे शोभित हो रहे थे, जैसे वर्षाकाल के आगमन पर बादल के समीप स्थित चन्द्रमा।

श्लोक 18 (uttara.82.18)

ततो ऽर्धदिवसे प्राप्ते पूज्यमानस्ततस्ततः । अयोध्यां प्राप्य काकुत्स्थो मध्यकक्ष्यामवारुहत् ।। ७.८२.१८ ।।

tato 'rdhadivase prāpte pūjyamānastatastataḥ | ayodhyāṃ prāpya kākutstho madhyakakṣyāmavāruhat || 7.82.18 ||

तब मध्याह्न के समय स्थान-स्थान पर पूजित होते हुए, अयोध्या पहुँचकर काकुत्स्थ (राम) भीतरी आँगन में उतरे।

श्लोक 19 (uttara.82.19)

ततो विसृज्य रुचिरं पुष्पकं कामगामि तत् । विसर्जयित्वा गच्छेति स्वस्ति ते ऽस्त्विति च प्रभुः ।। ७.८२.१९ ।।

tato visṛjya ruciraṃ puṣpakaṃ kāmagāmi tat | visarjayitvā gaccheti svasti te 'stviti ca prabhuḥ || 7.82.19 ||

फिर उस सुन्दर, इच्छानुसार चलने वाले पुष्पक को विदा करते हुए, प्रभु ने कहा, "जाओ, और तुम्हारा कल्याण हो" -- ऐसा कहकर उसे भेज दिया।

श्लोक 20 (uttara.82.20)

कक्षान्तरविनिक्षिप्तं द्वास्स्थं रामो ऽब्रवीद्वचः । लक्ष्मणं भरतं चैव गत्वा तौ लघुविक्रमौ । ममागमनमाख्याय शब्दापयत मा चिरम् ।। ७.८२.२० ।।

kakṣāntaravinikṣiptaṃ dvāssthaṃ rāmo 'bravīdvacaḥ | lakṣmaṇaṃ bharataṃ caiva gatvā tau laghuvikramau | mamāgamanamākhyāya śabdāpayata mā ciram || 7.82.20 ||

तब भीतरी आँगन में नियुक्त द्वारपाल से राम ने यह वचन कहा, "जाकर उन शीघ्रगामी वीर लक्ष्मण और भरत को मेरे आगमन की सूचना देकर बिना विलम्ब के बुला लाओ।"

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