उत्तरकाण्ड · सर्ग 95
राम द्वारा सीता की शपथ की मांग
श्लोक 1 (uttara.95.1)
रामो बहून्यहान्येवं तद्गीतं परमं शुभम् । शुश्राव मुनिभिः सार्धं पार्थिवैः सह वानरैः ।। ७.९५.१ ।।
rāmo bahūny ahāny evaṃ tad gītaṃ paramaṃ śubham | śuśrāva munibhiḥ sārdhaṃ pārthivaiḥ saha vānaraiḥ || 7.95.1 ||
इस प्रकार राम ने अनेक दिनों तक, मुनियों, राजाओं और वानरों के साथ, उस परम शुभ गान को सुना।
श्लोक 2 (uttara.95.2)
तस्मिन्गीते तु विज्ञाय सीतापुत्रौ कुशीलवौ । तस्याः परिषदो मध्ये रामो वचनमब्रवीत् । दूताञ्छुद्धसमाचारानाहूयात्ममनीषया ।। ७.९५.२ ।।
tasmin gīte tu vijñāya sītāputrau kuśīlavau | tasyāḥ pariṣado madhye rāmo vacanam abravīt | dūtāñ śuddhasamācārān āhūyātmamanīṣayā || 7.95.2 ||
उस गान में, कुश और लव को सीता के पुत्र जानकर, राम ने अपनी बुद्धि से शुद्ध आचरण वाले दूतों को बुलाकर, उस सभा के मध्य यह वचन कहा।
श्लोक 3 (uttara.95.3)
मद्वचो ब्रूत गच्छध्वमितो भगवतो ऽन्तिकम् ।। ७.९५.३ ।।
madvaco brūta gacchadhvam ito bhagavato 'ntikam || 7.95.3 ||
"जाओ, यहाँ से भगवान (वाल्मीकि) के पास जाकर मेरा यह वचन कहो।"
श्लोक 4 (uttara.95.4)
यदि शुद्धसमाचारा यदि वा वीतकल्मषा । करोत्विहात्मनः शुद्धिमनुमान्य महामुनिम् ।। ७.९५.४ ।।
yadi śuddhasamācārā yadi vā vītakalmaṣā | karotv ihātmanaḥ śuddhim anumānya mahāmunim || 7.95.4 ||
"यदि वह (सीता) शुद्ध आचरण वाली है, यदि वह पापरहित है, तो महामुनि की अनुमति लेकर, वह यहाँ अपनी शुद्धि करे।"
श्लोक 5 (uttara.95.5)
छन्दं मुनेश्च विज्ञाय सीतायाश्च मनोगतम् । प्रत्ययं दातुकामायास्ततः शंसत मे लघु ।। ७.९५.५ ।।
chandaṃ muneś ca vijñāya sītāyāś ca manogatam | pratyayaṃ dātukāmāyās tataḥ śaṃsata me laghu || 7.95.5 ||
"मुनि की सम्मति और सीता के मन के भाव को जानकर -- यदि वह विश्वास दिलाना चाहती हो -- तो मुझे शीघ्र सूचित करो।"
श्लोक 6 (uttara.95.6)
श्वः प्रभाते तु शपथं मैथिली जनकात्मजा । करोतु परिषन्मध्ये शोधनार्थं ममैव च ।। ७.९५.६ ।।
śvaḥ prabhāte tu śapathaṃ maithilī janakātmajā | karotu pariṣanmadhye śodhanārthaṃ mamaiva ca || 7.95.6 ||
"कल प्रातःकाल, जनकपुत्री मैथिली, इस सभा के मध्य, अपनी और मेरी शुद्धि के लिए शपथ ले।"
श्लोक 7 (uttara.95.7)
श्रुत्वा तु ऱागवस्यैतद्वचः परममद्भुतम् । दूताः सम्प्रययुर्बाटं यत्रास्ते मुनिपुङ्गवः ।। ७.९५.७ ।।
śrutvā tu rāghavasyaitad vacaḥ paramam adbhutam | dūtāḥ samprayayur vāṭaṃ yatrāste munipuṅgavaḥ || 7.95.7 ||
राघव के इस परम अद्भुत वचन को सुनकर, दूत उस शिविर की ओर गए जहाँ मुनिश्रेष्ठ (वाल्मीकि) निवास करते थे।
श्लोक 8 (uttara.95.8)
ते प्रणम्य महात्मानं ज्वलन्तममितप्रभम् । ऊचुस्ते रामवाक्यानि मृदूनि मधुराणि च ।। ७.९५.८ ।।
te praṇamya mahātmānaṃ jvalantam amitaprabham | ūcus te rāmavākyāni mṛdūni madhurāṇi ca || 7.95.8 ||
उस तेजस्वी, अपार प्रभावशाली महात्मा (वाल्मीकि) को प्रणाम करके, उन्होंने राम के कोमल और मधुर वचन कहे।
श्लोक 9 (uttara.95.9)
तेषां तद्व्याहृतं श्रुत्वा रामस्य च मनोगतम् । विज्ञाय सुमहातेजा मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ।। ७.९५.९ ।।
teṣāṃ tad vyāhṛtaṃ śrutvā rāmasya ca manogatam | vijñāya sumahātejā munir vākyam athābravīt || 7.95.9 ||
उनकी उस बात को सुनकर, राम के मन के भाव को जानकर, वह महातेजस्वी मुनि तब यह वचन बोले।
श्लोक 10 (uttara.95.10)
एवं भवतु भद्रं वो यथा वदति राघवः । तथा करिष्यते सीता दैवतं हि पतिः स्त्रियाः ।। ७.९५.१० ।।
evaṃ bhavatu bhadraṃ vo yathā vadati rāghavaḥ | tathā kariṣyate sītā daivataṃ hi patiḥ striyāḥ || 7.95.10 ||
"ऐसा ही हो, तुम्हारा कल्याण हो। जैसा राघव कहते हैं, वैसा ही सीता करेगी, क्योंकि पति ही स्त्री का देवता होता है।"
श्लोक 11 (uttara.95.11)
तथोक्ता मुनिना सर्वे राजदूता महौजसम् । प्रत्येत्य राघवं क्षिप्रं मुनिवाक्यं बभाषिरे ।। ७.९५.११ ।।
tathoktā muninā sarve rājadūtā mahaujasam | pratyetya rāghavaṃ kṣipraṃ munivākyaṃ babhāṣire || 7.95.11 ||
मुनि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, राजा के वे सभी दूत, महातेजस्वी राघव के पास शीघ्र लौटकर, मुनि के वचन को उनसे कह सुनाया।
श्लोक 12 (uttara.95.12)
ततः प्रहृष्टः काकुत्स्थः श्रुत्वा वाक्यं महात्मनः । ऋषींस्तत्र समेतांश्च राज्ञश्चैवाभ्यभाषत ।। ७.९५.१२ ।।
tataḥ prahṛṣṭaḥ kākutsthaḥ śrutvā vākyaṃ mahātmanaḥ | ṛṣīṃs tatra sametāṃś ca rājñaś caivābhyabhāṣata || 7.95.12 ||
तब उस महात्मा के वचन को सुनकर, प्रसन्न होकर काकुत्स्थ (राम) ने वहाँ एकत्रित ऋषियों और राजाओं से यह कहा।
श्लोक 13 (uttara.95.13)
भगवन्तः सशिष्या वै सानुगाश्च नराधिपाः । पश्यन्तु सीताशपथं यश्चैवान्यो ऽपि काङ्क्षते ।। ७.९५.१३ ।।
bhagavantaḥ saśiṣyā vai sānugāś ca narādhipāḥ | paśyantu sītāśapathaṃ yaś caivānyo 'pi kāṅkṣate || 7.95.13 ||
"आदरणीय ऋषिगण अपने शिष्यों सहित, तथा राजा लोग अपने अनुचरों सहित, सीता की शपथ को देखें, और जो अन्य कोई भी देखना चाहे वह भी देखे।"
श्लोक 14 (uttara.95.14)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा राघवस्य महात्मनः । सर्वेषामृषिमुख्यानां साधुवादो महानभूत् ।। ७.९५.१४ ।।
tasya tad vacanaṃ śrutvā rāghavasya mahātmanaḥ | sarveṣām ṛṣimukhyānāṃ sādhuvādo mahān abhūt || 7.95.14 ||
उस महात्मा राघव के इस वचन को सुनकर, समस्त श्रेष्ठ ऋषियों में महान साधुवाद उठा।
श्लोक 15 (uttara.95.15)
राजानश्च महात्मानः प्रशंसन्ति स्म राघवम् । उपपन्नं नरश्रेष्ठ त्वय्येव भुवि नान्यतः ।। ७.९५.१५ ।।
rājānaś ca mahātmānaḥ praśaṃsanti sma rāghavam | upapannaṃ naraśreṣṭha tvayy eva bhuvi nānyataḥ || 7.95.15 ||
और महात्मा राजा लोग भी राघव की प्रशंसा करने लगे -- "हे नरश्रेष्ठ! यह उचित ही है, पृथ्वी पर केवल आप में ही, अन्य किसी में नहीं।"
श्लोक 16 (uttara.95.16)
एवं विनिश्चयं कृत्वा श्वोभूत इति राघवः । विसर्जयामास तदा सर्वांस्ताञ्छत्रुसूदनः ।। ७.९५.१६ ।।
evaṃ viniścayaṃ kṛtvā śvobhūta iti rāghavaḥ | visarjayām āsa tadā sarvāṃs tāñ chatrusūdanaḥ || 7.95.16 ||
इस प्रकार "कल यह होगा" ऐसा निश्चय करके, शत्रुसूदन राघव ने तब उन सबको विदा किया।
श्लोक 17 (uttara.95.17)
इति सम्प्रविचार्य राजसिंहः श्वोभूते शपथस्य निश्चयं वै । विससर्ज मुनीन्नृपांश्च सर्वान्स महात्मा महतो महानुभावः ।। ७.९५.१७ ।।
iti sampravicārya rājasiṃhaḥ śvobhūte śapathasya niścayaṃ vai | visasarja munīn nṛpāṃś ca sarvān sa mahātmā mahato mahānubhāvaḥ || 7.95.17 ||
इस प्रकार, कल होने वाली शपथ के निश्चय पर भलीभाँति विचार करके, वह महात्मा, महानुभाव, राजाओं में सिंह के समान राम ने सभी मुनियों और राजाओं को विदा किया।