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उत्तरकाण्ड · सर्ग 96

वाल्मीकि द्वारा सीता का प्रस्तुतीकरण

सर्ग 95सर्ग-सूचीसर्ग 97

श्लोक 1 (uttara.96.1)

तस्यां रजन्यां व्युष्टायां यज्ञवाटगतो नृपः । ऋषीन्सर्वान्महातेजाः शब्दापयति राघवः ।। ७.९६.१ ।।

tasyāṃ rajanyāṃ vyuṣṭāyāṃ yajñavāṭagato nṛpaḥ | ṛṣīn sarvān mahātejāḥ śabdāpayati rāghavaḥ || 7.96.1 ||

वह रात्रि बीत जाने पर, यज्ञशाला में स्थित महातेजस्वी राजा राघव ने समस्त ऋषियों को बुलवाया।

श्लोक 2 (uttara.96.2)

वसिष्ठो वामदेवश्च जाबालिरथ काश्यपः । विश्वामित्रो दीर्घतपा दुर्वासाश्च महातपाः ।। ७.९६.२ ।।

vasiṣṭho vāmadevaś ca jābālir atha kāśyapaḥ | viśvāmitro dīrghatapā durvāsāś ca mahātapāḥ || 7.96.2 ||

वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, दीर्घतपस्वी विश्वामित्र, और महान् तपस्वी दुर्वासा -- ये सब वहाँ आए।

श्लोक 3 (uttara.96.3)

पुलस्त्यो ऽपि तथा शक्तिर्भार्गवश्चैव वामनः । मार्कण्डेयश्च दीर्घायुर्मौद्गल्यश्च महायशाः ।। ७.९६.३ ।।

pulastyo 'pi tathā śaktir bhārgavaś caiva vāmanaḥ | mārkaṇḍeyaś ca dīrghāyur maudgalyaś ca mahāyaśāḥ || 7.96.3 ||

पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, वामन, दीर्घायु मार्कण्डेय, और महायशस्वी मौद्गल्य भी वहाँ थे।

श्लोक 4 (uttara.96.4)

गर्गश्च च्यवनश्चैव शतानन्दश्च धर्मवित् । भरद्वाजश्च तेजस्वी ह्यग्निपुत्रश्च सुप्रभः ।। ७.९६.४ ।।

gargaś ca cyavanaś caiva śatānandaś ca dharmavit | bharadvājaś ca tejasvī hy agniputraś ca suprabhaḥ || 7.96.4 ||

गर्ग, च्यवन, धर्मज्ञ शतानन्द, तेजस्वी भरद्वाज, और तेजस्वी अग्निपुत्र भी वहाँ थे।

श्लोक 5 (uttara.96.5)

नारदः पर्वतश्चैव गौतमश्च महायशाः । कात्यायनः सुयज्ञश्च ह्यगस्त्यस्तपसां निधिः ।। ७.९६.५ ।।

nāradaḥ parvataś caiva gautamaś ca mahāyaśāḥ | kātyāyanaḥ suyajñaś ca hy agastyas tapasāṃ nidhiḥ || 7.96.5 ||

नारद, पर्वत, महायशस्वी गौतम, कात्यायन, सुयज्ञ, और तपस्या के निधिस्वरूप अगस्त्य भी वहाँ आए।

श्लोक 6 (uttara.96.6)

एते चान्ये च बहवो मुनयः संशितव्रताः । कौतूहलसमाविष्टाः सर्व एव समागताः ।। ७.९६.६ ।।

ete cānye ca bahavo munayaḥ saṃśitavratāḥ | kautūhalasamāviṣṭāḥ sarva eva samāgatāḥ || 7.96.6 ||

ये और इनके अतिरिक्त अनेक कठोर व्रतधारी मुनि, कौतूहल से भरकर, सभी वहाँ एकत्रित हुए।

श्लोक 7 (uttara.96.7)

राक्षसाश्च महावीर्या वानराश्च महाबलाः । सर्व एव समाजग्मुर्महात्मानः कुतूहलात् ।। ७.९६.७ ।।

rākṣasāś ca mahāvīryā vānarāś ca mahābalāḥ | sarva eva samājagmur mahātmānaḥ kutūhalāt || 7.96.7 ||

महापराक्रमी राक्षस और महाबली वानर -- वे सभी महात्मा कौतूहलवश एकत्रित हुए।

श्लोक 8 (uttara.96.8)

क्षत्रिया ये च शूद्राश्च वैश्याश्चैव सहस्रशः । नानादेशगताश्चैव ब्राह्मणाः संशितव्रताः ।। ७.९६.८ ।।

kṣatriyā ye ca śūdrāś ca vaiśyāś caiva sahasraśaḥ | nānādeśagatāś caiva brāhmaṇāḥ saṃśitavratāḥ || 7.96.8 ||

क्षत्रिय, शूद्र, तथा वैश्य सहस्रों की संख्या में, और नाना देशों से आए हुए कठोर व्रतधारी ब्राह्मण भी वहाँ थे।

श्लोक 9 (uttara.96.9)

ज्ञाननिष्ठाः कर्मनिष्ठाः योगनिष्ठास्तथापरे । सीताशपथवीक्षार्थं सर्व एव समागताः ।। ७.९६.९ ।।

jñānaniṣṭhāḥ karmaniṣṭhāḥ yoganiṣṭhās tathāpare | sītāśapathavīkṣārthaṃ sarva eva samāgatāḥ || 7.96.9 ||

ज्ञाननिष्ठ, कर्मनिष्ठ, तथा योगनिष्ठ अन्य लोग भी -- सभी सीता की शपथ देखने के लिए एकत्रित हुए।

श्लोक 10 (uttara.96.10)

तदा समागतं सर्वमश्मभूतमिवाचलम् । श्रुत्वा मुनिवरस्तूर्णं ससीतः समुपागमत् ।। ७.९६.१० ।।

tadā samāgataṃ sarvam aśmabhūtam ivācalam | śrutvā munivaras tūrṇaṃ sasītaḥ samupāgamat || 7.96.10 ||

तब उस समस्त एकत्रित जनसमूह को, जो पत्थर के समान अचल हो गया था, सुनकर, श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकि शीघ्र ही सीता के साथ वहाँ पधारे।

श्लोक 11 (uttara.96.11)

तमृषिं पृष्ठतः सीता त्वन्वगच्छदवाङ्मुखी । कृताञ्जलिर्बाष्पगला कृत्वा रामं मनोगतम् ।। ७.९६.११ ।।

tam ṛṣiṃ pṛṣṭhataḥ sītā tv anvagacchad avāṅmukhī | kṛtāñjalir bāṣpagalā kṛtvā rāmaṃ manogatam || 7.96.11 ||

सीता, मुख नीचे किए हुए, उस ऋषि के पीछे-पीछे चलीं -- हाथ जोड़े हुए, अश्रुगद्गद कण्ठ से, और मन में राम का ही ध्यान करते हुए।

श्लोक 12 (uttara.96.12)

दृष्ट्वा श्रुतिमिवायान्तीं ब्रह्माणमनुगामिनीम् । वाल्मीकेः पृष्ठतः सीतां साधुवादो महानभूत् ।। ७.९६.१२ ।।

dṛṣṭvā śrutim ivāyāntīṃ brahmāṇam anugāminīm | vālmīkeḥ pṛṣṭhataḥ sītāṃ sādhuvādo mahān abhūt || 7.96.12 ||

वाल्मीकि के पीछे आती हुई सीता को, मानो ब्रह्मा के पीछे चलती हुई श्रुति के समान देखकर, वहाँ महान् साधुवाद गूँज उठा।

श्लोक 13 (uttara.96.13)

ततो हलहलाशब्दः सर्वेषामेवमाबभौ । दुःखजन्मविशालेन शोकेनाकुलितात्मनाम् ।। ७.९६.१३ ।।

tato halahalāśabdaḥ sarveṣām evam ābabhau | duḥkhajanmaviśālena śokenākulitātmanām || 7.96.13 ||

तब सबके हृदय दुःख से उत्पन्न विशाल शोक से व्याकुल हो उठे, और चारों ओर एक कोलाहल-सा शब्द गूँज उठा।

श्लोक 14 (uttara.96.14)

साधु रामेति केचित्तु साधु सीतेति चापरे । उभावेव च तत्रान्ये प्रेक्षकाः सम्प्रचुक्रुशुः ।। ७.९६.१४ ।।

sādhu rāmeti kecit tu sādhu sīteti cāpare | ubhāv eva ca tatrānye prekṣakāḥ sampracukruśuḥ || 7.96.14 ||

कुछ लोग "साधु राम!" पुकार उठे तो कुछ "साधु सीता!", और अन्य दर्शक वहाँ दोनों के लिए ही जयजयकार करने लगे।

श्लोक 15 (uttara.96.15)

ततो मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः । सीतासहायो वाल्मीकिरिति होवाच राघवम् ।। ७.९६.१५ ।।

tato madhye janaughasya praviśya munipuṅgavaḥ | sītāsahāyo vālmīkir iti hovāca rāghavam || 7.96.15 ||

तब मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकि, सीता को साथ लिए हुए, उस विशाल जनसमूह के मध्य प्रवेश करके, राघव से इस प्रकार बोले।

श्लोक 16 (uttara.96.16)

इयं दाशरथे सीता सुव्रता धर्मचारिणी । अपवादैः परित्यक्ता ममाश्रमसमीपतः ।। ७.९६.१६ ।।

iyaṃ dāśarathe sītā suvratā dharmacāriṇī | apavādaiḥ parityaktā mamāśramasamīpataḥ || 7.96.16 ||

"हे दाशरथि! यह सीता है, जो सुव्रता और धर्मचारिणी है, जिसे लोकापवाद के कारण मेरे आश्रम के समीप त्याग दिया गया था।"

श्लोक 17 (uttara.96.17)

लोकापवादभीतस्य तव राम महाव्रत । प्रत्ययं दास्यते सीता तदनुज्ञातुमर्हसि ।। ७.९६.१७ ।।

lokāpavādabhītasya tava rāma mahāvrata | pratyayaṃ dāsyate sītā tad anujñātum arhasi || 7.96.17 ||

"हे महाव्रत राम! लोकापवाद से भयभीत तुम्हें सीता प्रमाण देगी -- अतः तुम इसकी अनुमति देने योग्य हो।"

श्लोक 18 (uttara.96.18)

इमौ तु जानकीपुत्रावुभौ च यमजातकौ । सुतौ तवैव दुर्धर्षौ सत्यमेतद्ब्रवीमि ते ।। ७.९६.१८ ।।

imau tu jānakīputrāv ubhau ca yamajātakau | sutau tavaiva durdharṣau satyam etad bravīmi te || 7.96.18 ||

"जानकी के ये दोनों पुत्र, जो जुड़वाँ जन्मे हैं, वस्तुतः तुम्हारे ही दुर्जय पुत्र हैं -- यह सत्य मैं तुमसे कहता हूँ।"

श्लोक 19 (uttara.96.19)

प्रचेतसो ऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन । न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ ।। ७.९६.१९ ।।

pracetaso 'haṃ daśamaḥ putro rāghavanandana | na smarāmy anṛtaṃ vākyam imau tu tava putrakau || 7.96.19 ||

"हे राघवनन्दन! मैं प्रचेता का दसवाँ पुत्र हूँ; मुझे कभी असत्य वचन बोलना स्मरण नहीं है -- ये दोनों निश्चय ही तुम्हारे पुत्र हैं।"

श्लोक 20 (uttara.96.20)

बहुवर्षसहस्राणि तपश्चर्या मया कृता । नोपाश्नीयां फलं तस्या दुष्टेयं यदि मैथिली ।। ७.९६.२० ।।

bahuvarṣasahasrāṇi tapaścaryā mayā kṛtā | nopāśnīyāṃ phalaṃ tasyā duṣṭeyaṃ yadi maithilī || 7.96.20 ||

"मैंने अनेक सहस्र वर्षों तक तपस्या की है; यदि यह मैथिली दोषयुक्त हो, तो मुझे उसका फल प्राप्त न हो।"

श्लोक 21 (uttara.96.21)

मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्वं न किल्बिषम् । तस्याः फलमुपाश्नीयामपापा मैथिली यदि ।। ७.९६.२१ ।।

manasā karmaṇā vācā bhūtapūrvaṃ na kilbiṣam | tasyāḥ phalam upāśnīyām apāpā maithilī yadi || 7.96.21 ||

"मन, कर्म, और वाणी से इसमें पहले कभी कोई दोष नहीं रहा है -- यदि मैथिली निष्पाप है, तो मुझे उस तपस्या का फल प्राप्त हो।"

श्लोक 22 (uttara.96.22)

अहं पञ्चसु भूतेषु मनष्षष्ठेषु राघव । विचिन्त्य सीतां शुद्धेति जग्राह वननिर्झरे ।। ७.९६.२२ ।।

ahaṃ pañcasu bhūteṣu manaḥṣaṣṭheṣu rāghava | vicintya sītāṃ śuddheti jagrāha vananirjhare || 7.96.22 ||

"हे राघव! पाँचों भूतों में और छठे मन में भलीभाँति विचार करके, सीता को शुद्ध जानते हुए ही मैंने उसे वन के झरने के समीप ग्रहण किया था।"

श्लोक 23 (uttara.96.23)

इयं शुद्धसमाचारा अपापा पतिदेवता । लोकापवादभीतस्य प्रत्ययं तव दास्यति ।। ७.९६.२३ ।।

iyaṃ śuddhasamācārā apāpā patidevatā | lokāpavādabhītasya pratyayaṃ tava dāsyati || 7.96.23 ||

"शुद्ध आचरण वाली, निष्पाप, और पति को ही देवता मानने वाली यह सीता, लोकापवाद से भयभीत तुम्हें प्रमाण देगी।"

श्लोक 24 (uttara.96.24)

तस्मादियं नरवरात्मज शुद्धभावा दिव्येन दृष्टिविषयेण तदा प्रविष्टा । लोकापवादकलुषीकृतचेतसा या त्यक्ता त्वया प्रियतमा विदिता ऽपि शुद्धा ।। ७.९६.२४ ।।

tasmād iyaṃ naravarātmaja śuddhabhāvā divyena dṛṣṭiviṣayeṇa tadā praviṣṭā | lokāpavādakaluṣīkṛtacetasā yā tyaktā tvayā priyatamā viditā 'pi śuddhā || 7.96.24 ||

"अतः हे नरश्रेष्ठ के पुत्र! यह शुद्धभावा उस समय मेरी दिव्य दृष्टि के विषय में प्रविष्ट हुई थी -- वह, जिसे लोकापवाद से कलुषित चित्त वाले तुमने, अत्यन्त प्रिय और शुद्ध जानते हुए भी, त्याग दिया था।"

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