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उत्तरकाण्ड · सर्ग 97

सीता की शपथ और पृथ्वी में प्रवेश

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श्लोक 1 (uttara.97.1)

वाल्मीकिनैवमुक्तस्तु राघवः प्रत्यभाषत । प्राञ्जलिर्जगतो मध्ये दृष्ट्वा तां वरवर्णिनीम् ।। ७.९७.१ ।।

vālmīkinaivam uktas tu rāghavaḥ pratyabhāṣata | prāñjalir jagato madhye dṛṣṭvā tāṃ varavarṇinīm || 7.97.1 ||

वाल्मीकि के इस प्रकार कहने पर, उस सुन्दर वर्ण वाली सीता को सभा के मध्य देखकर, हाथ जोड़े हुए राघव ने उत्तर दिया।

श्लोक 2 (uttara.97.2)

एवमेतन्महाभाग यथा वदसि धर्मवित् । प्रत्ययस्तु मम ब्रह्मंस्तव वाक्यैरकल्मषैः ।। ७.९७.२ ।।

evam etan mahābhāga yathā vadasi dharmavit | pratyayas tu mama brahmaṃs tava vākyair akalmaṣaiḥ || 7.97.2 ||

"हे महाभाग! यह वैसा ही है जैसा तुम कहते हो, हे धर्मज्ञ! हे ब्रह्मन्! तुम्हारे निष्कलंक वचनों से मुझे विश्वास हो गया है।"

श्लोक 3 (uttara.97.3)

प्रत्ययस्तु पुरा वृत्तो वैदेह्याः सुरसन्निधौ । शपथस्तु कृतस्तत्र तेन वेश्म प्रवेशिता । लोकापवादो बलवान्येन त्यक्ता हि मैथिली ।। ७.९७.३ ।।

pratyayas tu purā vṛtto vaidehyāḥ surasannidhau | śapathas tu kṛtas tatra tena veśma praveśitā | lokāpavādo balavān yena tyaktā hi maithilī || 7.97.3 ||

"पहले भी देवताओं की उपस्थिति में वैदेही का प्रमाण हो चुका था; वहाँ शपथ ली गई थी, जिसके कारण उसे अग्नि के गृह में प्रवेश कराया गया; परंतु लोकापवाद इतना प्रबल था कि जिसके कारण मैथिली को त्यागना पड़ा।"

श्लोक 4 (uttara.97.4)

सेयं लोकभयाद्ब्रह्मन्नपापेत्यभिजानता । परित्यक्ता मया सीता तद्भावन्क्षन्तुमर्हति ।। ७.९७.४ ।।

seyaṃ lokabhayād brahmann apāpety abhijānatā | parityaktā mayā sītā tad bhavān kṣantum arhati || 7.97.4 ||

"हे ब्रह्मन्! उसे निष्पाप जानते हुए भी, केवल लोकभय से मैंने सीता को त्याग दिया था -- इसे आप क्षमा करने योग्य हैं।"

श्लोक 5 (uttara.97.5)

जानामि चेमौ पुत्रौ मे यमजातौ कुशीलवौ । शुद्धायां जगतो मध्ये मैथिल्यां प्रीतिरस्तु मे ।। ७.९७.५ ।।

jānāmi cemau putrau me yamajātau kuśīlavau | śuddhāyāṃ jagato madhye maithilyāṃ prītir astu me || 7.97.5 ||

"मैं जानता हूँ कि ये कुश और लव जुड़वाँ पुत्र मेरे ही हैं; इस सभा के मध्य शुद्ध सिद्ध हुई मैथिली के प्रति मेरा प्रेम बना रहे।"

श्लोक 6 (uttara.97.6)

अभिप्रायं तु विज्ञाय रामस्य सुरसत्तमाः । सीतायाः शपथे तस्मिन् महेन्द्राद्या महौजसः ।। ७.९७.६ ।।

abhiprāyaṃ tu vijñāya rāmasya surasattamāḥ | sītāyāḥ śapathe tasmin mahendrādyā mahaujasaḥ || 7.97.6 ||

राम के इस अभिप्राय को जानकर, महेन्द्र आदि महातेजस्वी श्रेष्ठ देवगण सीता की उस शपथ के अवसर पर उपस्थित हुए।

श्लोक 7 (uttara.97.7)

पितामहं पुरस्कृत्य सर्व एव समागताः ।। ७.९७.७ ।।

pitāmahaṃ puraskṛtya sarva eva samāgatāḥ || 7.97.7 ||

पितामह ब्रह्मा को आगे करके, वे सभी वहाँ एकत्रित हुए।

श्लोक 8 (uttara.97.8)

आदित्या वसवो रुद्रा ह्यश्विनौ समरुद्गणाः । गन्धर्वाप्सरसश्चैव सर्व एव समागताः ।। ७.९७.८ ।।

ādityā vasavo rudrā hy aśvinau samarudgaṇāḥ | gandharvāpsarasaś caiva sarva eva samāgatāḥ || 7.97.8 ||

आदित्य, वसु, रुद्र, तथा मरुद्गणों सहित दोनों अश्विनीकुमार, और गन्धर्व तथा अप्सराएँ भी -- वे सभी वहाँ एकत्रित हुए।

श्लोक 9 (uttara.97.9)

साध्याश्च विश्वेदेवाश्च सर्वे च परमर्षयः । नागाः सुपर्णाः सिद्धाश्च ते सर्वे हृष्टमानसाः । सीताशपथसम्भ्रान्ताः सर्व एव समागताः ।। ७.९७.९ ।।

sādhyāś ca viśvedevāś ca sarve ca paramarṣayaḥ | nāgāḥ suparṇāḥ siddhāś ca te sarve hṛṣṭamānasāḥ | sītāśapathasambhrāntāḥ sarva eva samāgatāḥ || 7.97.9 ||

साध्यगण, विश्वेदेवगण, और समस्त परम ऋषि; नाग, सुपर्ण, और सिद्धगण -- वे सभी हर्षित मन से, सीता की शपथ के लिए उत्सुक होकर, वहाँ एकत्रित हुए।

श्लोक 10 (uttara.97.10)

दृष्ट्वा देवानृषींश्चैव राघवः पुनरब्रवीत् । प्रत्ययो मे नरश्रेष्ठा ऋषिवाक्यैरकल्मषैः ।। ७.९७.१० ।।

dṛṣṭvā devān ṛṣīṃś caiva rāghavaḥ punar abravīt | pratyayo me naraśreṣṭhā ṛṣivākyair akalmaṣaiḥ || 7.97.10 ||

देवताओं और ऋषियों को देखकर, राघव ने पुनः कहा -- "हे नरश्रेष्ठो! ऋषियों के निष्कलंक वचनों से मुझे विश्वास हो गया है।"

श्लोक 11 (uttara.97.11)

शुद्धायां जगतो मध्ये वैदेह्यां प्रीतिरस्तु मे ।। ७.९७.११ ।।

śuddhāyāṃ jagato madhye vaidehyāṃ prītir astu me || 7.97.11 ||

"इस सभा के मध्य शुद्ध सिद्ध हुई वैदेही के प्रति मेरा प्रेम बना रहे।"

श्लोक 12 (uttara.97.12)

ततो वायुः शुभः पुण्यो दिव्यगन्धो मनोरमः । तज्जनौघं सुरश्रेष्ठो ह्लादयामास सर्वतः ।। ७.९७.१२ ।।

tato vāyuḥ śubhaḥ puṇyo divyagandho manoramaḥ | taj janaughaṃ suraśreṣṭho hlādayām āsa sarvataḥ || 7.97.12 ||

तब एक शुभ, पवित्र, दिव्य सुगन्ध से युक्त और मनोरम वायु, देवताओं में श्रेष्ठ की भाँति, उस समस्त जनसमूह को चारों ओर से आह्लादित करने लगी।

श्लोक 13 (uttara.97.13)

तदद्भुतमिवाचिन्त्यं निरैक्षन्त समागताः । मानवाः सर्वराष्ट्रेभ्यः पूर्वं कृतयुगे यथा ।। ७.९७.१३ ।।

tad adbhutam ivācintyaṃ nirīkṣanta samāgatāḥ | mānavāḥ sarvarāṣṭrebhyaḥ pūrvaṃ kṛtayuge yathā || 7.97.13 ||

उस असाधारण और अचिन्त्य दृश्य को, वहाँ एकत्रित सभी देशों से आए हुए मनुष्य ऐसे निहारने लगे जैसे पूर्वकाल के कृतयुग में देखा जाता था।

श्लोक 14 (uttara.97.14)

सर्वान्समागतान्दृष्ट्वा सीता काषायवासिनी । अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यमधोदृष्टिरवाङ्मुखी ।। ७.९७.१४ ।।

sarvān samāgatān dṛṣṭvā sītā kāṣāyavāsinī | abravīt prāñjalir vākyam adhodṛṣṭir avāṅmukhī || 7.97.14 ||

उस समस्त एकत्रित सभा को देखकर, गेरुए वस्त्र पहने सीता ने, हाथ जोड़कर, दृष्टि नीचे किए हुए, मुख झुकाए हुए यह वचन कहा।

श्लोक 15 (uttara.97.15)

यथा ऽहं राघवादन्यं मनसापि न चिन्तये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ।। ७.९७.१५ ।।

yathāhaṃ rāghavād anyaṃ manasāpi na cintaye | tathā me mādhavī devī vivaraṃ dātum arhati || 7.97.15 ||

"जैसे मैंने मन से भी राघव के अतिरिक्त किसी अन्य का चिन्तन कभी नहीं किया, वैसे ही देवी माधवी मुझे स्थान देने योग्य हों।"

श्लोक 16 (uttara.97.16)

मनसा कर्मणा वाचा यथा रामं समर्चये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ।। ७.९७.१६ ।।

manasā karmaṇā vācā yathā rāmaṃ samarcaye | tathā me mādhavī devī vivaraṃ dātum arhati || 7.97.16 ||

"जैसे मैं मन, कर्म, और वाणी से राम की ही आराधना करती हूँ, वैसे ही देवी माधवी मुझे स्थान देने योग्य हों।"

श्लोक 17 (uttara.97.17)

यथैतत्सत्यमुक्तं मे वेद्मि रामात्परं न च । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ।। ७.९७.१७ ।।

yathaitat satyam uktaṃ me vedmi rāmāt paraṃ na ca | tathā me mādhavī devī vivaraṃ dātum arhati || 7.97.17 ||

"जैसा यह सत्य मैंने कहा है -- कि मैं राम के अतिरिक्त किसी और को नहीं जानती -- वैसे ही देवी माधवी मुझे स्थान देने योग्य हों।"

श्लोक 18 (uttara.97.18)

तथा शपन्त्यां वैदेह्यां प्रादुरासीत्तदद्भुतम् । भूतलादुत्थितं दिव्यं सिंहासनमनुत्तमम् ।। ७.९७.१८ ।।

tathā śapantyāṃ vaidehyāṃ prādurāsīt tad adbhutam | bhūtalād utthitaṃ divyaṃ siṃhāsanam anuttamam || 7.97.18 ||

वैदेही के इस प्रकार शपथ लेते ही, वह अद्भुत घटना घटित हुई -- पृथ्वीतल से एक दिव्य, अनुपम सिंहासन उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 19 (uttara.97.19)

ध्रियमाणं शिरोभिस्तु नागैरमितविक्रमैः । दिव्यं दिव्येन वपुषा दिव्यरत्नविभूषितैः ।। ७.९७.१९ ।।

dhriyamāṇaṃ śirobhis tu nāgair amitavikramaiḥ | divyaṃ divyena vapuṣā divyaratnavibhūṣitaiḥ || 7.97.19 ||

वह सिंहासन, अपार पराक्रमी नागों द्वारा अपने फणों पर धारण किया हुआ था, और दिव्य रत्नों से विभूषित दिव्य शरीर वाला, दिव्य था।

श्लोक 20 (uttara.97.20)

तस्मिंस्तु धरणी देवी बाहुभ्यां गृह्य मैथिलीम् । स्वागतेनाभिनन्द्यैनामासने चोपवेशयत् ।। ७.९७.२० ।।

tasmiṃs tu dharaṇī devī bāhubhyāṃ gṛhya maithilīm | svāgatenābhinandyaināmāsane copaveśayat || 7.97.20 ||

उस सिंहासन पर, धरणी देवी ने अपनी दोनों भुजाओं से मैथिली को ग्रहण करके, स्वागत के साथ उसका अभिनन्दन करते हुए, उसे आसन पर बिठाया।

श्लोक 21 (uttara.97.21)

तामासनगतां दृष्ट्वा प्रविशन्तीं रसातलम् । पुष्पवृष्टिरविच्छिन्ना दिव्या सीतामवाकिरत् ।। ७.९७.२१ ।।

tām āsanagatāṃ dṛṣṭvā praviśantīṃ rasātalam | puṣpavṛṣṭir avicchinnā divyā sītām avākirat || 7.97.21 ||

उस आसन पर बैठी और रसातल में प्रवेश करती हुई सीता को देखकर, एक अविरल दिव्य पुष्पवृष्टि उन्हें ढक देने लगी।

श्लोक 22 (uttara.97.22)

साधुकारश्च सुमहान्देवानां सहसोत्थितः । साधु साध्विति वै सीते यस्यास्ते शीलमीदृशम् ।। ७.९७.२२ ।।

sādhukāraś ca sumahān devānāṃ sahasotthitaḥ | sādhu sādhv iti vai sīte yasyās te śīlam īdṛśam || 7.97.22 ||

देवताओं का एक महान् साधुवाद एक साथ उठा -- "साधु, साधु, हे सीते! तुम्हारा शील ऐसा ही है।"

श्लोक 23 (uttara.97.23)

एवं बहुविधा वाचो ह्यन्तरिक्षगताः सुराः । व्याजह्रुर्हृष्टमनसो दृष्ट्वा सीताप्रवेशनम् ।। ७.९७.२३ ।।

evaṃ bahuvidhā vāco hy antarikṣagatāḥ surāḥ | vyājahrur hṛṣṭamanaso dṛṣṭvā sītāpraveśanam || 7.97.23 ||

इस प्रकार आकाश में स्थित देवगण, सीता के पृथ्वी में प्रवेश को देखकर, प्रसन्नचित्त होकर अनेक प्रकार के वचन बोलने लगे।

श्लोक 24 (uttara.97.24)

यज्ञवाटगताश्चापि मुनयः सर्व एव ते । राजानश्च नरव्याघ्रा विस्मयान्नोपरेमिरे ।। ७.९७.२४ ।।

yajñavāṭagatāś cāpi munayaḥ sarva eva te | rājānaś ca naravyāghrā vismayān noparemire || 7.97.24 ||

यज्ञशाला में उपस्थित वे समस्त मुनि, तथा नरव्याघ्र राजा भी, विस्मय से उपरत न हो सके।

श्लोक 25 (uttara.97.25)

अन्तरिक्षे च भूमौ च सर्वे स्थावरजङ्गमाः । दानवाश्च महाकायाः पाताले पन्नगाधिपाः ।। ७.९७.२५ ।।

antarikṣe ca bhūmau ca sarve sthāvarajaṅgamāḥ | dānavāś ca mahākāyāḥ pātāle pannagādhipāḥ || 7.97.25 ||

आकाश में और पृथ्वी पर सभी चराचर प्राणी, महाकाय दानव, और पाताल में सर्पराज -- सभी विस्मित हुए।

श्लोक 26 (uttara.97.26)

केचिद्विनेदुः संहृष्टाः केचिद्ध्यानपरायणाः । केचिद्रामं निरीक्षन्ते केचित्सीतामचेतनाः ।। ७.९७.२६ ।।

kecid vinedus saṃhṛṣṭāḥ kecid dhyānaparāyaṇāḥ | kecid rāmaṃ nirīkṣante kecit sītām acetanāḥ || 7.97.26 ||

कुछ हर्षित होकर गरज उठे, कुछ ध्यानमग्न हो गए; कुछ राम को ही निहारते रहे, तो कुछ सीता को देखते हुए ही मानो चेतनाशून्य हो गए।

श्लोक 27 (uttara.97.27)

सीताप्रवेशनं दृष्ट्वा तेषामासीत्समागमः । तन्मुहूर्तमिवात्यर्थं समं सम्मोहितं जगत् ।। ७.९७.२७ ।।

sītāpraveśanaṃ dṛṣṭvā teṣām āsīt samāgamaḥ | tan muhūrtam ivātyarthaṃ samaṃ sammohitaṃ jagat || 7.97.27 ||

सीता के उस प्रवेश को देखकर उन सबका ऐसा जमघट हो गया कि उस क्षण भर के लिए सम्पूर्ण जगत् एक साथ अत्यन्त सम्मोहित हो गया।

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