उत्तरकाण्ड · सर्ग 99
राम का दीर्घ एवं धर्मपूर्ण राज्यशासन
श्लोक 1 (uttara.99.1)
रजन्यां तु प्रभातायां समानीय महामुनीन् । गीयतामविशङ्काभ्यां रामः पुत्रावुवाच ह ।। ७.९९.१ ।।
rajanyāṃ tu prabhātāyāṃ samānīya mahāmunīn | gīyatām aviśaṅkābhyāṃ rāmaḥ putrāv uvāca ha || 7.99.1 ||
रात्रि के प्रभात होने पर, महामुनियों को बुलाकर, राम ने अपने दोनों पुत्रों से कहा -- "निर्भय होकर गाओ।"
श्लोक 2 (uttara.99.2)
ततः समुपविष्टेषु ब्रह्मर्षिषु महात्मसु । भविष्यदुत्तरं काव्यं जगतुस्तौ कुशीलवौ ।। ७.९९.२ ।।
tataḥ samupaviṣṭeṣu brahmarṣiṣu mahātmasu | bhaviṣyad uttaraṃ kāvyaṃ jagatus tau kuśīlavau || 7.99.2 ||
तब उन महात्मा ब्रह्मर्षियों के बैठ जाने पर, कुश और लव ने उस भावी उत्तरकाण्ड काव्य का गान किया।
श्लोक 3 (uttara.99.3)
प्रविष्टायां तु सीतायां भूतलं सत्यसम्पदा । तस्यावसाने यज्ञस्य रामः परमदुर्मनाः ।। ७.९९.३ ।।
praviṣṭāyāṃ tu sītāyāṃ bhūtalaṃ satyasampadā | tasyāvasāne yajñasya rāmaḥ paramadurmanāḥ || 7.99.3 ||
सत्य की सम्पदा के बल पर सीता के पृथ्वीतल में प्रवेश कर जाने पर, उस यज्ञ की समाप्ति पर, राम अत्यन्त उदास मन वाले हो गए।
श्लोक 4 (uttara.99.4)
अपश्यमानो वैदेहीं मेने शून्यमिदं जगत् । शोकेन परमायस्तो न शान्तिं मनसा ऽगमत् ।। ७.९९.४ ।।
apaśyamāno vaidehīṃ mene śūnyam idaṃ jagat | śokena paramāyasto na śāntiṃ manasāgamat || 7.99.4 ||
वैदेही को न देख पाने के कारण, उन्होंने इस समस्त जगत् को शून्य-सा मान लिया; शोक से अत्यन्त क्लान्त होकर उनके मन को शांति न मिली।
श्लोक 5 (uttara.99.5)
विसृज्य पार्थिवान्सर्वानृक्षवानरराक्षसान् । जनौघं विप्रमुख्यानां वित्तपूर्वं विसृज्य च ।। ७.९९.५ ।।
visṛjya pārthivān sarvān ṛkṣavānararākṣasān | janaughaṃ vipramukhyānāṃ vittapūrvaṃ visṛjya ca || 7.99.5 ||
समस्त राजाओं को, भालुओं, वानरों, और राक्षसों को विदा करके, और श्रेष्ठ ब्राह्मणों के उस जनसमूह को भी धन देकर विदा करके,
श्लोक 6 (uttara.99.6)
एवं समाप्य यज्ञं तु विधिवत्स तु राघवः । ततो विसृज्य तान्सर्वान्रामो राजीवलोचनः ।। ७.९९.६ ।।
evaṃ samāpya yajñaṃ tu vidhivat sa tu rāghavaḥ | tato visṛjya tān sarvān rāmo rājīvalocanaḥ || 7.99.6 ||
इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञ को सम्पन्न करके, उन सबको विदा देकर, वे कमलनयन राम,
श्लोक 7 (uttara.99.7)
हृदि कृत्वा तदा सीतामयोध्यां प्रविवेश ह । इष्टयज्ञो नरपतिः पुत्रद्वयसमन्वितः ।। ७.९९.७ ।।
hṛdi kṛtvā tadā sītām ayodhyāṃ praviveśa ha | iṣṭayajño narapatiḥ putradvayasamanvitaḥ || 7.99.7 ||
सीता को अपने हृदय में धारण करके, अपने दोनों पुत्रों सहित, यज्ञ सम्पन्न कर चुके वे नरपति, अयोध्या में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 8 (uttara.99.8)
न सीतायाः परां भार्यां वव्रे स रघुनन्दनः । यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ।। ७.९९.८ ।।
na sītāyāḥ parāṃ bhāryāṃ vavre sa raghunandanaḥ | yajñe yajñe ca patnyarthaṃ jānakī kāñcanī bhavat || 7.99.8 ||
उस रघुनन्दन ने सीता के अतिरिक्त किसी अन्य को पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया; और प्रत्येक यज्ञ में पत्नी के स्थान पर स्वर्णमयी जानकी की प्रतिमा ही रखी जाती थी।
श्लोक 9 (uttara.99.9)
दशवर्षसहस्राणि वाजिमेघानथाकरोत् । वाजपेयान्दशगुणांस्तथा बहुसुवर्णकान् ।। ७.९९.९ ।।
daśavarṣasahasrāṇi vājimedhān athākarot | vājapeyān daśaguṇāṃs tathā bahusuvarṇakān || 7.99.9 ||
दस सहस्र वर्षों तक उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किए, तथा उनसे दस गुना अधिक वाजपेय यज्ञ, और प्रचुर स्वर्णदान वाले अनेक यज्ञ भी किए।
श्लोक 10 (uttara.99.10)
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां गोसवैश्च महाधनैः । ईजे क्रतुभिरन्यैश्च स श्रीमानाप्तदक्षिणैः ।। ७.९९.१० ।।
agniṣṭomātirātrābhyāṃ gosavaiś ca mahādhanaiḥ | īje kratubhir anyaiś ca sa śrīmān āptadakṣiṇaiḥ || 7.99.10 ||
वे श्रीमान् राम अग्निष्टोम, अतिरात्र, महाधनी गोसव यज्ञों तथा उचित दक्षिणा से युक्त अन्य यज्ञों द्वारा भी यजन करते रहे।
श्लोक 11 (uttara.99.11)
एवं स कालः सुमहान्राज्यस्थस्य महात्मनः । धर्मे प्रयतमानस्य व्यतीयाद्राघवस्य तु ।। ७.९९.११ ।।
evaṃ sa kālaḥ sumahān rājyasthasya mahātmanaḥ | dharme prayatamānasya vyatīyād rāghavasya tu || 7.99.11 ||
इस प्रकार उस महात्मा राघव का, जो राज्य में स्थित रहकर धर्म में सतत प्रयत्नशील थे, वह दीर्घकाल व्यतीत हो गया।
श्लोक 12 (uttara.99.12)
अनुरञ्जन्ति राजानमहन्यहनि राघवम् । ऋक्षवानररक्षांसि स्थिता रामस्य शासने ।। ७.९९.१२ ।।
anurañjanti rājānam ahany ahani rāghavam | ṛkṣavānararakṣāṃsi sthitā rāmasya śāsane || 7.99.12 ||
भालू, वानर, और राक्षस -- सब राम के शासन में स्थित रहकर, प्रतिदिन उस राजा राघव के प्रति अनुराग रखते थे।
श्लोक 13 (uttara.99.13)
काले वर्षति पर्जन्यः सुभिक्षं विमला दिशः । हृष्टपुष्टजनाकीर्णं पुरं जनपदास्तथा ।। ७.९९.१३ ।।
kāle varṣati parjanyaḥ subhikṣaṃ vimalā diśaḥ | hṛṣṭapuṣṭajanākīrṇaṃ puraṃ janapadās tathā || 7.99.13 ||
समय पर वर्षा होती थी, दिशाएँ निर्मल रहती थीं, सुभिक्ष था, और नगर तथा जनपद हृष्ट-पुष्ट प्रजा से भरे रहते थे।
श्लोक 14 (uttara.99.14)
नाकाले म्रियते कश्चिन्न व्याधिः प्राणिनां तथा । नानर्थो विद्यते कश्चिद्रामे राज्यं प्रशासति ।। ७.९९.१४ ।।
nākāle mriyate kaś cin na vyādhiḥ prāṇinām tathā | nānartho vidyate kaś cid rāme rājyaṃ praśāsati || 7.99.14 ||
राम के राज्य करते समय, कोई भी असमय नहीं मरता था, प्राणियों को कोई रोग नहीं होता था, और कहीं कोई अनर्थ नहीं था।
श्लोक 15 (uttara.99.15)
अथ दीर्घस्य कालस्य राममाता यशस्विनी । पुत्रपौत्रैः परिवृता कालधर्ममुपागमत् ।। ७.९९.१५ ।।
atha dīrghasya kālasya rāmamātā yaśasvinī | putrapautraiḥ parivṛtā kāladharmam upāgamat || 7.99.15 ||
फिर दीर्घकाल के बाद, राम की यशस्विनी माता, अपने पुत्रों और पौत्रों से घिरी हुई, काल के धर्म को प्राप्त हुईं -- अर्थात् उनका देहावसान हो गया।
श्लोक 16 (uttara.99.16)
अन्वियाय सुमित्रा च कैकेयी च यशस्विनी । धर्मं कृत्वा बहुविधं त्रिदिवे पर्यवस्थिता ।। ७.९९.१६ ।।
anviyāya sumitrā ca kaikeyī ca yaśasvinī | dharmaṃ kṛtvā bahuvidhaṃ tridive paryavasthitā || 7.99.16 ||
सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयी भी उनके पीछे-पीछे चली गईं; अनेक प्रकार के धर्मकार्य करके वे स्वर्ग में जा बसीं।
श्लोक 17 (uttara.99.17)
सर्वाः प्रमुदिताः स्वर्गे राज्ञा दशरथेन च । समागता महाभागाः सर्वधर्मं च लेभिरे ।। ७.९९.१७ ।।
sarvāḥ pramuditāḥ svarge rājñā daśarathena ca | samāgatā mahābhāgāḥ sarvadharmaṃ ca lebhire || 7.99.17 ||
वे सब महाभागा रानियाँ स्वर्ग में राजा दशरथ से मिलकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं, और सम्पूर्ण धर्मफल को प्राप्त हुईं।
श्लोक 18 (uttara.99.18)
तासां रामो महादानं काले काले प्रयच्छति । मातऽणामविशेषेण ब्राह्मणेषु तपस्विषु ।। ७.९९.१८ ।।
tāsāṃ rāmo mahādānaṃ kāle kāle prayacchati | mātṝṇām aviśeṣeṇa brāhmaṇeṣu tapasviṣu || 7.99.18 ||
राम समय-समय पर उन माताओं के निमित्त, बिना किसी भेदभाव के, तपस्वी ब्राह्मणों को महान् दान देते रहे।
श्लोक 19 (uttara.99.19)
पित्र्याणि ब्रह्मरत्नानि यज्ञान्परमदुस्तरान् । चकार रामो धर्मात्मा पितऽन्देवान्विवर्धयन् ।। ७.९९.१९ ।।
pitryāṇi brahmaratnāni yajñān paramadustarān | cakāra rāmo dharmātmā pitṝn devān vivardhayan || 7.99.19 ||
धर्मात्मा राम ने पितरों से सम्बद्ध ब्राह्मरत्न-दान और अत्यन्त दुष्कर यज्ञ किए, और इस प्रकार पितरों तथा देवताओं को तृप्त करते रहे।
श्लोक 20 (uttara.99.20)
एवं वर्षसहस्राणि बहून्यथ ययुः सुखम् । यज्ञैर्बहुविधं धर्मं वर्धयानस्य सर्वदा ।। ७.९९.२० ।।
evaṃ varṣasahasrāṇi bahūny atha yayuḥ sukham | yajñair bahuvidhaṃ dharmaṃ vardhayānasya sarvadā || 7.99.20 ||
इस प्रकार, यज्ञों के द्वारा अनेक प्रकार से सतत धर्म की वृद्धि करते हुए उन राम के अनेक सहस्र वर्ष सुखपूर्वक व्यतीत हो गए।