ॐ क्षराय नमः
क्षरम्
Kṣaram
Root: kṣar
अर्थ
The perishable manifest universe that flows and changes
नश्वर प्रकट सृष्टि, जो बहती और बदलती रहती है
शब्द-दर-शब्द विश्लेषण
क्षर
perishable, changing, flowing
नश्वर, बदलने वाला, बहने वाला
आधुनिक संदर्भ
गीता अध्याय 15 में कृष्ण कहते हैं 'द्वावेमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च,' इस लोक में दो पुरुष हैं: क्षर (नश्वर) और अक्षर (अविनाशी)। क्षर भगवान इस बदलते संसार के रूप में हैं। मौसम बदलते हैं, शरीर बूढ़े होते हैं, सरकारें बदलती हैं, फ़ैशन बदलता है। यह सब 'क्षर' (perishable) है। भगवान इस नश्वरता में भी मौजूद हैं।
कब जपें
ॐChant during Gita Chapter 15 study, when reflecting on impermanence, when autumn leaves fall or seasons change, or when the transient nature of life becomes meditation.
और ब्रह्माण्डीय व्यवस्था नाम
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